Wednesday, November 26, 2014

मेरे भगवान , मेरे पिता

I . हे  भगवान , मैं कौन
मेरी अपनी आत्मा तू है ;
मेरी बुद्धि तू है ;
मेरे जीवन के कृत्य  (प्राण ) मेरे साथी है ;
शरीर मेरा घर है ;
इन्द्रियों के विषयों का विविध उपभोग मेरी   पूजा  है ;
निंद्रा  समाधि की दशा है ;
मेरे कदम मंदिर की प्रदक्षिणा है
और
मेरे सब वचन प्रार्थनाए है।
हे  भगवान , मैं
जो कुछ भी कर्म करता हूं ,
उनमें से प्रत्येक तेरी ही पूजा है।

  II   मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो 
 ओ  धैर्यशाली तारो ,
 मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो ,
तुम जो प्रत्येक  रात्रि  में
इस प्राचीन आकाश में चढ़ते हो।
और आकाश पर
 न कोई छाया छोड़ते हो ,
 न कोई निशान ,
न आयु   का कोई चिन्ह
और
 न मृत्यु का कोई भय।


       III 
 भगवान कहते हैं :
"तुम सब हुए हो और तुमने देखा है  किया है और सोचा है ,
तुमने नहीं , लेकिन मैंने देखा है ,
 और मैं  हुआ हूं और मैंने किया है .......
तीर्थ -यात्री , तीर्थ-यात्रा और मार्ग ,
मैं  स्वयं ही था ,जो अपनी ओर जा रहा था ;
 और तुम्हारा
आगमन मेरे अपने द्वार पर  मेरा ही आगमन था ……
आओ ,तुम भटके हुए कणों ,
अपने केन्द्र की ओर खिंच आओ .......
ओ किरणों ,जो सुदूर अन्धकार में भटकती रही हो ,
लौट आओ और वापस अपने सूर्य में विलीन हो जाओ।

IV .दिव्य प्रेम
 एक बार राबिया से पूछा गया :"क्या तुम सर्वशक्तिमान परमात्मा से प्रेम करती हो ?"
"हां। "
"क्या तुम शैतान से घृणा करती हो ?"   उसने उत्तर दिया :"भगवान  के प्रेम के कारण मेरे पास इतनी फुरसत ही नहीं रहती कि  मैं शैतान से घृणा कर संकू।मैंने पैगम्बर को सपने में देखा था। उसने पूछा ," अरी राबिया ,
क्या तू मुझसे प्रेम करती है ?"
मैंने उत्तर दिया," ओ खुदा के पैगम्बर , तुझसे कौन प्रेम नहीं करता ? परन्तु खुदा के प्रेम ने मुझे इतना तल्लीन कर लिया हैं कि मेरे दिल में किसी अन्य वस्तु  के लिए न तो प्रेम और न ही घृणा ही बाकी रही है। "
दिव्य प्रेम का अनुभव करने के लिए अन्य सब प्रेमों को त्याग देना होगा।

V.        "हां पिता , हां , और सर्वदा हां। "

 परमात्मा हमारे सम्मुख शर्ते रख देता है और उन्हें स्वीकार करना हमारा काम है।
हमें बहाव के विरुद्ध संघर्ष करने में  अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहिए।
हममें से अधिकांश लोग स्वाभविक मुनष्य होते है ,जो अपनी छोटी -छोटी योजनाओं
 के विषय में बहुत उत्सुक ,आवेशपूर्ण और सुनिशिचत होते है। परन्तु हमे बदलना होगा।
जिस उपाय द्वारा हम अधिकतम उपयोगी सिद्ध हो सकते है वह परमात्मा की इच्छा के
सम्मुख सिर झुका देने का ही है। संत  फ्रांसिस डि सालेस की एक प्रिय प्रार्थना में
 इस पूर्ण अधीनता की इस भावना को संक्षेप में इस प्रकार प्रकट किया गया है :
                                                   "हां पिता , हां ,और सर्वदा हां। "
 

Sunday, November 23, 2014

समय अभी है खून की पहचान बचाने का

नस -नस  में जहर है  भरा
कहीं गुस्सा है    तो
 कहीं नफरत की मिलावट खून में
कहीं कुंठाएं बन कर मिल गयी खून में तो
 कहीं  अंधविश्वासी धारणाए।
सब झूठ को बेचते हैं क्योंकि
 झूठ मिला है खून में।
सब बेचैन है
पर मैं चैन की नींद क्यों सो रहा हूँ ?
क्योंकि मेरी नस -नस  में भी जहर भरा है
 कुछ अजब सा !
सनक सी सवार है अजब सी ब्यार है
मन उतावला सा है  कुछ बेताब है
आओ जहर की जगह कुछ प्यार की बहार
कुछ कब्ज़ा जमीनों की बजाय दिलो पर करे
लड़े पर बचपन की मासूमीयत से लड़ कर
फिर दोस्त बन जाये
आओ एक नयी सनक से
धरती पर स्कूल या अस्पताल जैसे
नित नए रोज मंदिर  बनाए
आओ हम जहर निकाले  और
खंगाले अपने मन को
और पूछे क्यों तूफ़ान आया केदारनाथ में
क्यों गंगा -यमुना काली हो कर बेचैन है
समय अभी है मानव -सभ्यता को बचाने का
समय अभी है खून की पहचान बचाने का।

Sunday, November 2, 2014

झूठ की जमीन

हमारी जमीन , हमारे जमीर की पहचान है। अब हम सच की जमीन पर खड़े होकर कभी झूठ बोलते हैं तो कभी झूठ की जमीन पर खड़े होकर सच बोलते हैं। मुद्दा दरसल ये है कि सूर्य की रोशनी या हवा पर किसी का एकाधिकार नहीं है। उसी तरह भूमि पर भी अधिकार की बातें कुछ समझ पाना कठिन हैं। गांधीजी ने लिखा है कि  सम्पति के व्यकितगत स्वामित्व का कोई अधिकार स्वीकार नहीं जा सकता। और साफ -साफ लिखा था , देश में उपस्थित सट्टेबाज , भूस्वामी , कारखानेदार आदि हमारे देश की सफलता के सबसे बड़े बाधक हैं। वे सब शायद नहीं समझते है कि वे जनता के खून को चूसकर ही जी रहे हैं।इस तरह प्रकृति मानव की कृति नहीं हैं , उसकी सम्पदा भी मानव कृत नहीं है।
ईश्वर ही सबका मालिक है , संसार का सृजन किसी एक मानव के लिए नहीं किया है ,अपितु समस्त प्राणियों के लिए किया है। वक़्त ने इस समाज का मानवीकरण देखा है। और जैसे कि हवा,पानी और आकाश या सूर्य के प्रकाश का उपयोग सभी जीव रूप से करते हैं। इसी तरह पृथ्वी के उपभोग का भी सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।
परन्तु  एक समाज के निर्माण बनिस्पत हम लोग छोटे -छोटे घरों के निर्माण में व्यस्त हैं। चीन कहता है तिब्बत उसका है ,सागर उसका है। पाकिस्तान के मुताबिक कश्मीर उसका है। और ISIS के अनुसार शायद भारत सहित कई  इस्लमिक मुल्क उसके नक़्शे में हैं। तो मानव समाज का क्या ??
क्या हम अभी भी सभ्यता की क , ख  सीख  रहे है? ये मंगलयान की बातें या अर्थवव्यस्था का भूमंडलीकरण सब कोरी बकवास है। क्योंकि एक बात तो स्पष्ट है कि समाज का एक हिस्सा आगे बड़ जाये और बहुत बड़ा भाग पीछे छूट जाए ऐसा सम्भव नहीं।

Sunday, October 19, 2014

और मैं हँस देता हूँ।

मेरी यादें ,
मेरे अकेलेपन को खाली कर देती हैं
 वक़्त ने एक दिन अहसास दिलाया
 और
 फिर मुझे बताया
और
भी कुछ है
जो मुझे रोकता है टोकता है
मसलन मेरा साया।
मेरी यादें ,
मेरे अकेलेपन को खाली कर देती हैं
जानें कितने बरस हुए मुझे के मैं न बरसा।
उस सावन भादों को तरसा।
वो अकेलापन बस अहसास उसका मुझे रुला जाता हैं
और मैं हँस  देता हूँ।

Wednesday, October 1, 2014

MY INDIA IS GREAT ! AFTER 67 YEARS NOTHING HAS CHANGED

. .GANDHI JI  IN 2-11-1919   COMPARE THIS WITH TODAY' POSITION
 . No one should spit or clean his nose on the streets. In some cases the sputum is so harmful that the germs are carried from it and they infect others with tuberculosis. In some places spitting on the road is a criminal offence. Those who spit after chewing betel leaves and tobacco have no consideration for the feelings of others. Spittle, mucus from the nose, etc, should also be covered with earth.
"Near the village or dwellings, there should be no ditches in which water can collect. Mosquitoes do not breed where water does not stagnate. Where there are no mosquitoes, the incidence of malaria is low. At one time, water used to collect around Delhi. After the hollows were filled, mosquitoes were greatly reduced and so also was malaria."

Gandhiji wrote on 17-12-1942, how simplicity helped healthy living:
". . . Many households are so packed with all sorts of unnecessary decorations and furniture which one can very well do without, that a simple living man will feel suffocated in those surroundings. They are nothing but means of harbouring dust, bacteria and insects. . . I meant to say is that my desire to be in tune with the infinite has saved me from many complications in life. It led not merely to simplicity of household and dress but all round simplicity in the mode of my life. In a nutshell, and in the language of the subject under discussion, I have gone on creating more and more contact with akash. With the increase in the contact went improvement in health. I had more contentment and piece of mind and the desire for belongings almost disappeared. He who will establish contact with the infinite possesses nothing and yet possesses everything. In the ultimate analysis, man owns that of which he can make legitimate use and which he can assimilate. If everybody followed this rule, there would be room enough for all and there would be neither want nor overcrowding."
 कल  NDTV की एक रिपोर्ट  के मुताबिक दिल्ली में 10000 सफाई कर्मचारी होने चाहिये और  हैं सिर्फ 2600 ??? मुझे आश्चर्य होता है और दुखी तो खैर सभी हैं !! कि  . पता सब को सब कुछ है पर कोई कुछ करता नहीं सिवाय बातें करने के। सबको पता है कि गंगा ही नहीं बाकि नदिया भी गन्दी हो चुकी है।  प्रकृति हमे चेतवानी पिछले कई  सालों से दे रही है पहले लद्दाख में , फिर उत्तराखंड में  और इस साल जम्मू और कश्मीर में।   सब जगह हम गन्दगी के ढेर फेकते जा रहे हैं। और बाते सफाई की करते हैं।

Sunday, September 28, 2014

मेरा भारत देश गन्दगी से भरपूर !

 मेरा भारत देश गन्दगी से भरपूर !
2 अक्टूबर को नरेंदर मोदी साहब स्वछ भारत प्रोग्राम का उदघाटन करेंगे। उस भारत का जिसके  बारे में अंतरराष्ट्रीय संगठन 'हाइजीन काउंसिल '  की रिपोर्ट कहती है :हमारे रसोईघरों में 92 %चाकू खतरनाक हद तक गंदे   होते हैं। 51 % सब्जियां बिना धोए पका दी जाती हैं और 45 % फल खाए जाने से पहले धोए नहीं जाते। 60 करोड़ से ज्यादा भारतीय खुले में शौच करते हैं वगरैह -वगरैह।
एक बार मैं  एक अच्छे खासे रईस आदमी के घर पार्टी में गया। खाना तो बहुत लजीज लग रहा था परन्तु उसके आस-पास मक्खियों का आना जाना भी लगा हुआ था मैंने जैसे ही इस बारे में कुछ कहा तो  उन्होंने खाने के आस -पास धूप जला दी। सब लोग मजे से खाने लगे। मुझे बहुत बुरा लगा। वो साहब आज तक नाराज हैं।
मथुरा में यमुना का पानी नहाने लायक भी नहीं पर लोग उसे पीते है नहाना तो आम बात है।
कहीं भी किसी भी शहर में किसी भी सरकारी अस्पताल के बाथरूम को देख लो शायद आप को बीमार होने  से कोई न रोक पायेगा। अब इससे से ज्यादा क्या लिखूं।
प्रधानमंत्रीजी , आप अपने बनारस की गलियों  देखिये तो नजर आएगा खुली हुई नालियों में बहती गंदगी खुले पड़े पुराने शौचलय जो मन को घिन से भर देंगे। बाते करने से काम नहीं होता।
अगर आप इस काम में कुछ कदम भी आगे बड़ा पाये तो शायद आप की गणना भारत के महान नेताओं में होगी। ये काम MOM  से भी बड़ा है।


Thursday, September 18, 2014

खून -खराबे से कैसे आदमी......

खून -खराबे से कैसे आदमी / समाज /देश पिछड़ जाते हैं इसकी मिसाल मैंने अखबार में  पढ़ी। सीरिया में तीन साल से जारी खूनी लड़ाई के कारण यह देश कम से कम तीस साल पीछे चला गया हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार सिरिया की करीब 45 %आबादी गरीबी की रेखा के नीचे   तुलना में   सिर्फ 12 % आबादी  मार्च 2011  गरीबी की रेखा के नीचे थी। गृहयुद्ध शुरू होने से पहले करीब 8 % आबादी बेरोजगार थी और अब है : लगभग  आधी आबादी। लड़ाई शुरू होने से पहले सीरिया उन गिने -चुने अरब देशों में एक था जो विकास के लक्ष्यों को पीछे छोड़ देते थे। मगर तीन साल बाद सिर्फ सोमालिया से बेहतर ?
यह तो एक बानगी है अभी तस्वीर बाकी है इराक , तुर्की आदि की।  

Thursday, September 4, 2014

हे भगवान, मैं कौन ?

मेरी अपनी आत्मा तू है ;
मेरी बुद्धि तू है ;
मेरे जीवन के कृत्य  (प्राण ) मेरे साथी है ;
शरीर मेरा घर है ;
इन्द्रियों के विषयों का विविध उपभोग मेरी   पूजा  है ;
निंद्रा  समाधि की दशा है ;
मेरे कदम मंदिर की प्रदक्षिणा है  
और
मेरे सब वचन प्रार्थनाए है।
हे  भगवान , मैं
जो कुछ भी कर्म करता हूं ,
उनमें से प्रत्येक तेरी ही पूजा है।

 

Thursday, August 28, 2014

काश ,जो कुछ हमने जिया है ?

चेखव के नाटक ' तीन बहनें '  के बारे में पढ़कर  अच्छा लगा। ऐसा लगा कि मैंने अपनी जिन्दगी के कुछ पलों में पूरी जिन्दगी  का दर्द सिमटा कर उसे खत्म कर दिया है शायद। एक पंक्ति
"व्यर्थता बोध की मारी इरीनी अवसाद के क्षणों में कहती है ,काश ,जो कुछ हमने जिया है , वह जिन्दगी का रफ ड्राफ्ट होता और इसे फेयर करने का एक मौका और हमें मिलता। "
पर रफ हो या फेयर जिन्दगी की घटनाएं जब घटित होती हैं तो उस वक़्त जो निर्णय लिए जाते हैं वही सर्वोत्तम होते हैं।
        वक़्त के सिलसिले में जीना , जिन्दगी को घूट -घूट  कर पीना।
                        जख्म कोई भी मिले दर्द से उसे सी लेना।
       

Tuesday, August 19, 2014

भगवान कृष्ण को समझना जरूरी है।

भगवान  कृष्ण को समझना जरूरी है। हर लीला बालपन से लेकर भगवान के अवसान तक हमें एक रहस्य से पर्दा उठाती हुई नजर आती हैं। भगवान कृष्ण  की लीला  लिखना बहुत आसान है परन्तु समझ पाना लगभग
असम्भव अगर नहीं तो मुश्किल जरूर है क्योंकि लोग हर जगह की तरह यहां भी रस ढूंढ़ते हैं। और फिर रसपान करने में समझ का उपयोग करना कठिन लगता हैं।
भगवान कृष्ण कहते हैं (  गीता शलोक 10 वा अध्याय 6 ):
योगी को चाहिए कि वह एकान्त में अकेला बैठकर अपने -आपको वश में रखते हुए , सब इच्छाओं से मुक्त होकर और किसी भी परिग्रह (धन -सम्पत्ति या साज -सामान ) की कामना न करते हुए अपने मन को (परमात्मा में ) एकाग्र करे।
अब यहां पर रस ढूंढना  और वो भी समझ के साथ , तो जीवन सार्थक हैं। परन्तु धन -सम्पत्ति की लालसा या कामना और उसके व्यय करने की चिन्ता हमारी समझ को विचलित करती हैं और हमें आत्मिक जीवन से दूर ले जाती हैं।
ईसा  ने एक धनी आदमी से , जो कहता था कि  वह सब धार्मिक आदेशों का पालन करता है , कहा था : " फिर भी एक चीज़ तुममें नहीं है : जो कुछ तुम्हारे पास है , उस सबको बेच दो और गरीबों में बांट दो और इससे तुम्हे स्वर्ग में खज़ाना मिल जाएगा। " जब ईसा ने देखा कि यह सुनकर वह धनी आदमी बहुत उदास हो गया , तो उसने कहा :: " जिनके  पास धन है , उनके लिए परमात्मा के राज्य में  प्रवेश पाना बहुत कठिन होगा ;क्योंकि ऊंट के लिए सुई के छेद में से जाना आसान है , किन्तु धनी व्यक्त्ति के लिए परमात्मा के राज्य में प्रवेश कर पाना मुश्किल  हैं। "
गीता बताती है कि  सच्चा आनन्द आन्तरिक आनन्द है। शरीर मर सकता है और संसार नष्ट हो सकता है , परन्तु आत्मिक जीवन चिरस्थायी है। और हमारा खज़ाना संसार की नश्वर वस्तुएं नहीं हैं ,अपितु उस परमात्मा का ज्ञान और उसके प्रति प्रेम है जो अनश्वर हैं।
               मेरे भाग्य में नित्य आंसू और आहें लिख दो।
       और मुझे मेरे आत्म से दूर अपनी राह पर ले चलो ,
             जिससे अपने आत्म को गंवाकर मैं तुम तक पहुंच संकू।




Friday, August 15, 2014

आज १५ अगस्त हैं !

प्रिय नरेश ,
आज १५ अगस्त हैं सुबह सात बजे टीवी पर लालकिले का  कार्यक्रम   चल रहा था।
पहले झंडा फहराने के वक़्त जनगण मन हुआ।   कुछ याद आया ,
फिर मन हुआ कि साथ-साथ गाऊँ। पर वक़्त गुजर गया और फिर एक बहुत ही कमजोर भाषण हुआ।
 पर अंत में फिर जनगण मन शुरू हुआ, इस बार मेरी  आँखों में आसूँ भर आये   और
मैं जनगण मन गाने लगा।
फिर मैंने 'हकीकत' मूवी देखी। उसके बाद
जाने 'मैं ' कहाँ  खो गया।
 सिर्फ १५ अगस्त की ही बात नहीं हैं,
 वो आदर्शवाद की बाते।
वो सपने।
शायद मैं अब जहाँ हूँ   वहाँ से मुड़कर कुछ कर पाना  शायद बहुत कठिन हैं
समाज को बदलना , नयी सोच लाना शायद सड़े गले शब्द हैं
क्योंकि
हम इस समाज के हिस्से- कायर हैं , डरपोक हैं।
गाँधी का नाम लेकर  प्रसन्न होते हैं।
और
भगवान् से डरते हैं
 प्यार करना शायद हमें  आता नहीं।
बाकी फिर लिखूँगा ।

 वैसे सच बात ये हैं कि
अब मौत बेवफा लगती हैं            और
जिंदगी का मत पूछ मेरे यार क्योंकि
संगदिल बातों पे यकीं मुझे कम हो चला हैं

कुछ तुम कहो।  एक बात रह गयी शायद --ये  गाना सुनना --मुकेश का (फिर सुबह होगी )
"आसमान पे है खुदा और ज़मीन पे हम
आजकल वो इस तरफ देखता है कम
आजकल किसी को वो रोकता नहीं
चाहे कुछ भी कीजये टोकता नहीं     -----                      EARLIER PUBLISHED ON 15/8/2013.

यह है हिन्दुस्तान मेरी जान !

बिलकुल ठीक पड़ा आपने  
जान सस्ती ईमान सस्ता बिकता है
  पूरा हिन्दुस्तान
  हो यकीं  
तो पड़ लो  
आज का पेपर मेरी जान
लड़ते- झगड़ते यहां के लोग 
  सड़के टूट  रही हैं   
पानी-बिजली  नहीं है दिल्ली जैसे शहरों में
पता नहीं मैं कहा रह रहा हूँ
 सब कुछ भगवान भरोसे हैं
और मोदीजी के अच्छे दिन तो दूर की 
कोड़ी है 
बुरे दिनों की बरसात हो रही है  
15 अगस्त 2014  आज़ादी की  68 वीं  वर्षगांठ 
बातें अच्छी हैं : जब मैं देखता हूं इराक 
जब मैं देखता हूं पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को 
बातें अच्छी हैं  :जब मैं देखता हूं सीरिया या यूक्रेन  को 
तो बस एक खबर अच्छी है: कि मैं अपने हिन्दुस्तान को 
मिलाऊँ तो इन्हीं देशों से। 
और अमेरिका या चीन  और जापान या ऑस्ट्रेलिया 
से मिलाना एक जुर्म हो गया।
 
 

Wednesday, August 13, 2014

मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो

ओ  धैर्यशाली तारो ,
 मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो ,
तुम जो प्रत्येक  रात्रि  में
इस प्राचीन आकाश में चढ़ते हो।
और आकाश पर
 न कोई छाया छोड़ते हो ,
 न कोई निशान ,
न आयु   का कोई चिन्ह
और
 न मृत्यु का कोई भय।

Monday, August 11, 2014

भगवान कहते हैं

भगवान कहते हैं :
"तुम सब हुए हो और तुमने देखा है  किया है और सोचा है ,
तुमने नहीं , लेकिन मैंने देखा है ,
 और मैं  हुआ हूं और मैंने किया है .......
तीर्थ -यात्री , तीर्थ-यात्रा और मार्ग ,
मैं  स्वयं ही था ,जो अपनी ओर जा रहा था ;
 और तुम्हारा
आगमन मेरे अपने द्वार पर  मेरा ही आगमन था ……
आओ ,तुम भटके हुए कणों ,
अपने केन्द्र की ओर खिंच आओ .......
ओ किरणों ,जो सुदूर अन्धकार में भटकती रही हो ,
लौट आओ और वापस अपने सूर्य में विलीन हो जाओ। "

Thursday, August 7, 2014

लोकसंग्रह :संसार को बनाए रखना।

लोकसंग्रह :संसार को बनाए  रखना।
लोकसंग्रह का अभिप्राय संसार की एकता या समाज की परस्पर -संबद्धता से है। यदि संसार को भौतिक कष्ट और नैतिक अध:पतन की दशा में  नहीं गिरना है ,यदि सामान्य जीवन को सुचारू और सगौरव होना है ,तो सामाजिक कर्म  का नियंत्रण धार्मिक नीति से होना चाहिए। धर्म का उद्देश्य समाज का आध्यातिमकरण करना है ,पृथ्वी पर भ्रातृभाव की स्थापना करना। हमे पार्थिव संस्थाओ में आदर्शो को साकार करने की आशा से प्रेरणा मिलनी चाहिए।
जब भारतीय जगत की जवानी समाप्त हो चली , तब इसका झुकाव परलोक की ओर हो चला। श्रांत वयस में हम  त्याग और सहिष्णुता के संदेशो को अपना लेते है। आशा और ऊर्जा की वयस में हम
संसार में  सक्रिय सेवा और सभ्यता की रक्षा करने पर जोर देते हैं।
बोइथियस ने जोर देकर कहा है कि  " जो अकेला स्वर्ग जाने को तैयार है ,वह कभी स्वर्ग नहीं जाएगा। "

Saturday, August 2, 2014

भगवान का प्रकट होना !


दिव्य शक्ति का महान आत्मप्रकाशन उस अर्जुन के सम्मुख प्रकट होता है ,जो विश्व की प्रक्रिया और भक्ति के सच्चे अर्थ को समझता है। भगवान कृष्ण अपने विश्वरूप में दुर्योधन के सम्मुख तब प्रकट हुए थे ,जब कि सन्धि का अन्तिम प्रयत्न करने के लिए आए हुए भगवान कृष्ण को दुर्योधन ने बन्दी बना लेने का प्रयत्न किया था।
यह दिव्य रूपदर्शन कोई किंवदन्ती या पौराणिक कथा नहीं है ,अपितु एक आध्यातिम्क अनुभव है। धार्मिक अनुभव के इतिहास में इस प्रकार के अनेक दर्शनों का उल्लेख प्राप्त होता है। ईसा का रूपान्तर , दमिश्क की सड़क पर साऊल का दर्शन ,कॉन्स्टैन्टाइन द्वारा एक क्रॉस का दर्शन ,जिस पर ये शब्द अंकित थे "इस चिन्ह को लेकर विजय करो " तथा जॉन ऑफ़ आर्क के इसी प्रकार के दर्शन अर्जुन के दिव्य रूप दर्शन की कोटि के ही अनुभव हैं।
यह दर्शन कोई मानसिक कल्पना नहीं है ,अपितु सीमित मन से परे एक सत्य का उदघाटन है। यहां अनुभव की स्वतःस्फूर्तता और प्रत्यक्षता स्पष्ट है।

Friday, August 1, 2014

रूस और अमेरिका

अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर जो पांबदिया थोपी हैं। इससे शत्रुता की खाई गहरी  होगी और फिर दुनिया के कदम शीत युद्ध की तरफ बढ़ेंगे। अमेरिका अपने को दूध का धुला और दूसरों को अपराधी क्यों मानता हैं। पहले भी इराक पर हमला करके अमेरिका ने सबका सुख चैन छीना। सद्दाम हुसैन के समय इराक एक ठीक -ठाक देश था। पर अब तो कुछ भी नहीं बचा इराक में।
इधर गजा में  इज़रायल ने घमासान मचा रखा हैं। और लीबिया में गृहयुद्ध यानी अराजकता का माहौल।
अफगानिस्तान में रूस को हटाते -हटाते तालिबान जैसा जिन्न , जिसने अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बर्बाद करने में कोई कसर  नहीं छोड़ी ,पैदा किया।
अमेरिका को बिन मांगे एक सलाह रूस और यूक्रेन की चिंता छोड़ कर अपने गिरबान में  झांके। तो अमेरिका को समझ आएगा कि रूस और अमेरिका बहुत अच्छे मित्र देश हैं।

Monday, July 28, 2014

"दिव्य प्रेम"

एक बार राबिया से पूछा गया :"क्या तुम सर्वशक्तिमान परमात्मा से प्रेम करती हो ?"
"हां। "
"क्या तुम शैतान से घृणा करती हो ?"   उसने उत्तर दिया :"भगवान  के प्रेम के कारण मेरे पास इतनी फुरसत ही नहीं रहती कि  मैं शैतान से घृणा कर संकू।मैंने पैगम्बर को सपने में देखा था। उसने पूछा ," अरी राबिया ,
क्या तू मुझसे प्रेम करती है ?"
मैंने उत्तर दिया," ओ खुदा के पैगम्बर , तुझसे कौन प्रेम नहीं करता ? परन्तु खुदा के प्रेम ने मुझे इतना तल्लीन कर लिया हैं कि मेरे दिल में किसी अन्य वस्तु  के लिए न तो प्रेम और न ही घृणा ही बाकी रही है। "
दिव्य प्रेम का अनुभव करने के लिए अन्य सब प्रेमों को त्याग देना होगा।

Tuesday, July 22, 2014

जागो दुनिया वालो , जागो

1.यूक्रेन के विद्रोहियों ने मलयेशियाई एयरलाइन्स के विमान को मार गिराया।
2.इराक और सीरिया के कुछ हिस्सों पर आई एस आई एस ने कब्ज़ा कर एक नए इस्लामी राष्ट्र की घोषणा कर दी है।
3.अफ़्रीकी देश नाईजीरिया में  बोको हरम का मामला :बड़ी संख्या में स्कूली लड़कियों को अगवा कर के अपने मुजाहिदीनों से जबरन शादी कराई गई।
4.सोमालिया के समुद्री लुटेरे दुनिया भर के व्यापारी जहाजों को लूटते जा रहे है।
5.अफगानिस्तान में  नाम के लिए हामिद करजई की सरकार है कब्ज़ा तालिबान का है।
6.गाज़ा पट्टी के बारे में  सबको पता है कि वहाँ क्या हो रहा है।
और क्या लिखने की जररूत है????
जागो दुनिया वालो , जागो  वरना ये नेता लोग हमे कहीं का नहीं छोड़ेंगे।

Sunday, July 13, 2014

"हां पिता , हां ,और सर्वदा हां। "

परमात्मा हमारे सम्मुख शर्ते रख देता है और उन्हें स्वीकार करना हमारा काम है।
हमें बहाव के विरुद्ध संघर्ष करने में  अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहिए।
हममें से अधिकांश लोग स्वाभविक मुनष्य होते है ,जो अपनी छोटी -छोटी योजनाओं
 के विषय में बहुत उत्सुक ,आवेशपूर्ण और सुनिशिचत होते है। परन्तु हमे बदलना होगा।
जिस उपाय द्वारा हम अधिकतम उपयोगी सिद्ध हो सकते है वह परमात्मा की इच्छा के
सम्मुख सिर झुका देने का ही है। संत  फ्रांसिस डि सालेस की एक प्रिय प्रार्थना में
 इस पूर्ण अधीनता की इस भावना को संक्षेप में इस प्रकार प्रकट किया गया है :
                                                   "हां पिता , हां ,और सर्वदा हां। "

Saturday, July 12, 2014

मंजिल !


सोचा था मंजिल पास है
 जल्द ही पहुँच जायेंगे हम
पहुँचे तो सही
मगर
किस कीमत पर
पैरों के तले काँटे दबाकर
गले में फूलों के हार पहनकर
पैरों से काँटे  दबाए दबते नहीं
  मगर
फूलो की खुशबू से हँसी  रूकती नहीं
मगर
ये क्या उन्होंने पैर देख लिए
पैरों  के नीचे दबे काँटे देख लिए।
लोगो ने हमारा दर्द जाना तो सही
मगर
 देर से

तब तक फूल मुरझा चुके थे
इस बार उन्हें मुरझाये हुए
 फूल न नजर आए
आए तो बस अँगडाई 
लेते हुए काँटे
 नजर आए
उन्होंने फूलो को रौंद दिया
पर फूलो के साथ
हम भी तो थे
हाय
इन फूलो की रूदन से
अच्छी तो
 काँटो  की चुभन थी।
सपनो की लहरों में
 डूबे थे हम
 जितना हमने समझा
 मंजिल पास है
मंजिल उतनी ही हमसे दूर होती चली गई।






 





मेरा दिल भी ?

जले-जले हैं
यहाँ के लोग क्यों
जले-जले से हैं
इनके दिल क्यों
मुझे डर है
कि
मेरा दिल भी  इनकी तरह
जलजला न हो जाये।
आबादी की 'मनहूसीयत ' में
छविगृहो की 'खुबसूरती ' में
 डूबा है ये समाज
दिल पुकार-पुकार कर
 कह रहा है ले चल इन
ईंटो की चारदीवारी से ,
पंखो की किलकारियों से
ले चल -ले चल  कहीं दूर
 कहीं मेरा दिल भी जलजला न हो जाये।

Monday, June 2, 2014

'अवसान गाथा भगवन कृष्ण की '

वे घूमते -घूमते भालका  तीर्थ पहुंचे। वे उस जगह की तलाश में थे , जहां बैठकर चैन की सांस ले सकें और ध्यानयोग करने के बाद गहरी नींद ले सकें।
वे ध्यान करने के लिए कुछ देर तक बैठे रहे , लेकिन कर नहीं सके। चित्त चंचल ही बना रहा। वे एक पैर पर दूसरा पैर चढ़ाकर लेट गए। पलकें नींद से बोझिल हो रही थी।
इसी वक्त उनके मुंह से एक 'आह ' निकली।
यह 'आह' किसी स्मृति की नहीं , उस तीर की थी , जो उनके तलवों  को भेदता हुआ उस पार चला गया था।
'प्रणाम द्वारकाधीश ! क्षमा करें , अनजाने में ही अपराध कर बैठा मैं। मैं आपके पांव को उस हिरन का कान समझ बैठा ,जिसका शिकार  कर रहा था। '

'कौन हो तुम ?' कृष्ण पीड़ा से लेट गए।
'यह तो मैं भी नहीं जानता। हां , मां यह जरूर बताती है कि  पिता कोई वसुदेव  हैं ,जो मथुरा नरेश कंस के कारागार में बंद थे। '
कृष्ण  उसे देखते ही रहे और उसके चेहरे में स्वयं को ढूंढ़ते रहे। इतना देख लिया कि उसकी आंखो में उनकी आंखो  जैसा तेज है।
रक्तस्त्राव तेज था। खून तलवे से भी बह रहा था और पांव के ऊपर से भी। उनकी लंगोटी खून से भीग गई थी। जांघों के दोनों ओर से खून टपकने लगा था , लेकिन बेकार।
'द्वारकाधीश ! एक विचित्र  बात मैंने देखी। मैं हिरन को घायल करना चाहता था , मारना नहीं। और देखिए , तीर यही था , ऐसा ही सरपत  का , सरकंडे का ,लेकिन जैसे ही इस धनुष की डोर पर चढ़ाया , वह वज्र जैसा भारी हो गया और इसकी नोक देखिए ,जहर बुझी जैसी। कैसे हो गया ऐसा ,मेरी समझ में नहीं आ रहा हैं। '
कृष्ण जैसे नशे में  थे --कुछ चेतन , कुछ अवचेतन। बुदबुदाए --' जब मैं ही नहीं समझ सका इस जीवन और जगत के रहस्य को ,तो दूसरा कोई क्या समझेगा ?… क्या नाम बताया तुमने अपना ?'
'जरा , निषादों में सर्वश्रेष्ठ धनुधर्र  जरा। '
कृष्ण के चेहरे पर हलकी मुसकान आई --' बुढ़ापे को भी जरा कहते हैं। '
'द्वारकाधीश , घातक तीर नहीं है ,घातक वह विष है जो उसकी नोक पर था। क्या करूं ?मेरी समझ में नहीं आ रहा है। '

कृष्ण का शरीर धीरे -धीरे बैंगनी पड़ता जा रहा था। सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। गोमती और कपिला के संगम में हलकोरो की 'चप -चप 'सुनाई  पड़ रही थी। जैसे ही उधर से ठंडी हवा का झोंका आया , कृष्ण ने आंखें खोली --'मैंने तो यदुवंशियो का नाश ही कर दिया था जरा ,लेकिन अब संतोष और ख़ुशी है कि तुम बचे रह गए। '
कृष्ण का कष्ट जरा से छिपा नहीं रहा। उनकी देह अकड़ती जा रही थी। आंखें खोलना चाहते थे ,लेकिन खोल नहीं पा रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाएं फैलाई , जैसे उड़ना चाहते हों। जरा पैरों की तरफ से उठा और उनका सिर अपनी गोद  में लेकर बैठ गया।
कृष्ण ने अंतिम बार आंखें खोल कर देखा। वे भावुक और द्रवित हो उठे। उनकी आंखों के कोर में आंसू छलक  आये। उनके होठ काँप रहे थे ,वे कुछ कहना चाहते थे ,लेकिन आवाज बाहर नहीं आ रही थी। जरा ने झुक कर अपना कान उनके होठो के पास किया। वे कह रहे थे --'जरा मेरे भाई , द्वारका जाकर वसुदेव महाराज से कह दो मेरी प्रतीक्षा न करे। '
 'अरे ,कैसी बात कर रहे हैं आप ? कहीं नहीं जाऊंगा इस हाल में आपको छोड़कर !' जरा बिगड़ कर बोला।
पता नहीं कृष्ण ने उसे सुना या नहीं सुना। उनकी आंखें  बंद हुई  और सिर  उसकी गोद में लुढ़क गया। उसने आहिस्ता से सिर को उठाया और नीचे  रख दिया। चांदनी छिटकी हुई थी और पीपल के पत्तों से छानकर उनके चेहरे पर आ रही थी। उसने उनकी भुजायें ठीक की ,पांव सीधे किये , और देर तक उस शांत ,प्रसंन और पूर्णकाम मुखमंडल को निहारता रहा ,जिसके बारे में बचपन से सुनता आया था।
जाने कहां से एक स्वर बराबर उसके कानों में गूंज रहा था ---' शव को बचाए रखो ,सुबहः तक के लिए। '

  

Thursday, May 29, 2014

जाने भी दो यारो !

जाने भी दो यारो यहाँ सब चलता हैं
कोई फर्क नहीं पड़ता हैं।
यहाँ सब चलता हैं।

वक़्त ने हमे सिखाया हैं कि भारत की जनता न केवल अनपढ़ हैं अपने अधिकारो को लेकर बल्कि आलस की मारी भी हैं ऐसा कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

सचाई का ये रोना रोते हैं
झूठ के दर्शन पल -पल होते हैं।
बेचारा शब्द यहाँ बेमानी हैं
बईमानी में छुपी सारी कहानी हैं।
अरे नई खोजे अमेरीका ,जापान खोजे
हम करेंगे नक़ल करके मौजे।
जीवन -मरण ,सुख -दुःख
सब ऊपर वाले के हाथ हैं
अपने हाथ में बस आये माया
या
सुकोमल काया
मैं उसी में भरपाया।


Saturday, May 17, 2014

वक़्त ठहरा हैं ?

दर्द का ही सफर हैं
बिना दर्द कहाँ कुछ
 मुझे पता हैं
बस जीना हैं
मुझे
 कुछ दर्द साथ में
जीवन भर साथ लिए
वक़्त गुजरने का
 पता ही न चला
जब तक
मैंने दामन न थामा दर्द का
अब अहसास हैं
मुझे पल पल गुजरने का।
पागलों की दुनिया में
 एक पागल की तरह
जीने का कोई मतलब नहीं यारों
दामन थाम लो
साथी बना लो
इस दर्द को
वर्ना गुजर जायेगी जिंदगी    और
अहसास न कर पाओगे के
हम ठहरे हे यहां पर और     वक़्त गुजरता जा रहा हैं
या
वक़्त ठहरा हैं संदियों से
और हम गुजरते जा रहे हैं

Monday, April 14, 2014

बहुत चले

 बहुत चले फिर बहुत देर तक रुके
फिर चले कभी-कभी
 ऐसा लगताहै
थकान  होने को  है।
पर मन अभी भरा नहीं है  
दिल तो करता है  चलूँ
 चल कर यूहीं  गुज़ार  दूँ  पूरी उम्र को
तमन्ना कोई बाकि नहीं
सिवाय इसके
कि बहुत चलूँ पर थकान कभी न हो मुझे
रब की तलाश है  मुझे
ये कहने से मुझे लगता है  डर
कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं
ये कहने से मुझे लगता है  डर।
अलबत्ता हर शख्स मुझे डराता है
इस सहमी हुई दुनिया में।
चल-चल कर मैं उतारूंगा अपने अन्दर के
बोझ को
करूँगा अपने जिस्म को हल्का  और
फिर मैं शायद पा लूँगा अपने रब को।
शायद मुझे फिर होगा इस दुनिया के हर
शख्स से प्यार।
तम्मनाए फिर शायद जाग कर पूछेंगी सवाल
कहाँ चले।


Sunday, March 16, 2014

MAHATMA GANDHI & MEDIA

 जिन लोगों को लगता है कि मीडिया को लेकर आजकल गाली दी जा रही है उनके लिए अख़बारों के बारे में गांधी जी की राय  दे रहा हूँ । 


"कोई कितना भी चिल्लाता रहे अख़बार वाले सुधरते नहीं । लोगों को भड़काकर इस प्रकार अख़बार की बिक्री बढ़ाकर कमाई करना, यह पापी तरीक़ा अख़बार वालों का है । ऐसी झूठी बातों से पन्ना भरने की अपेक्षा अख़बार बंद हो जायें या संपादक ऐसे काम करने के बजाय पेट भरने का कोई और धंधा खोज लें तो अच्छा है । "
12.2.1947- महात्मा गांधी                                 
THE SOLE AIM OF JOURNALISM SHOULD BE SERVICE.

ONE OF THE OBJECTS OF A NEWSPAPER IS TO UNDERSTAND THE POPULAR FEELING &
GIVE EXPRESSION TO IT ; ANOTHER IS TO AROUSE AMONG THE PEOPLE CERTAIN 
DESIRABLE SENTIMENTS ; AND THE THIRD IS FEARLESSLY TO EXPOSE POPULAR DEFECTS.
REFERENCE TO ABUSES IN THE STATES IS UNDOUBTEDLY A NECESSARY PART OF 
JOURNALISM  & IT IS A MEANS OF CREATING PUBLIC OPINION.
                                                                            YOUNG INDIA   2.7.1925
UNFORTUNATELY, THE NEWSPAPERS HAD BECOME MORE IMPORTANT TO THE AVERAGE
MAN THAN THE SCRIPTURES.HE WOULD FAIN ADVICE THEM TO GIVE UP READING 
NEWSPAPERS.THEY WOULD LOSE NOTHING BY SO DOING WHERE AS REAL FOOD FOR 
THEIR MINDS AND SPIRITS LAY IN THE SCRIPTURES & OTHER GOOD LITERATURE.

               THE PRESS WAS CALLED THE FOURTH ESTATE.IT WAS DEFINITELY A POWER BUT TO 
MISUSE THAT POWER WAS CRIMINAL.HE WAS A JOURNALIST HIMSELF & WOULD 
APPEAL TO FELLOW JOURNALISTS TO REALIZE THEIR RESPOSIBILITY AND TO CARRY 
ON THIER WORK WITH NO IDEA OTHER THAT OF UPHOLDING THE TRUTH.
                                                                             HARIJAN ,  27.4.47

Thursday, February 20, 2014

यहाँ सुख से सौ गुनी पीर देखी

हमने जग की अजब तस्वीर देखी                              रचित ----      कवि प्रदीप
एक हँसता हैं दस रोते हैं
 ये प्रभु की अजब जागीर देखी
हमे हँसते मुखड़े  चार मिले
 दुखिया चेहरे हजार मिले
 यहाँ सुख से सौ गुनी पीर देखी 
एक हँसता हैं दस रोते हैं
ये इसलिए सच हैं कयोंकि इस दुनिया में जानवर जायदा रहते हैं वो भी इंसानो का वेश बना कर। कुछ लोग हैं मेरे भाई दीपक जैसे इंसानियत को शर्मिन्दा करने पर तुले हुए हैं। मैं सोचता हूँ अगर वो मुझसे ऐसा सलूक कर सकते हैं तो फिर किसी और से ---
फिर मैं चारो तरफ नजर दौड़ाता हूँ तो देखता हूँ ये दुनिया रहने लायक भी बची हैं या नहीं।
झूठ , बेशर्मी  और न जाने कैसी सोच। जिस यमुना को लोग गन्दा करते हैं वही सीवर युक्त पानी का वो मथुरा
में  आचमन करते हैं।
                                                                                  -----शेष फिर !     

Saturday, February 15, 2014

एक श्रद्धांजलि अरविन्द केजरीवाल के इस्तीफ़े पर।

आज की ताजा खबर : देखिये दिल्ली विधानसभा में  बीजेपी MLA S  की अराजकता   और फिर कोसिए ,
कैसी व्वयस्था में - हमने किनको चुना था, जो लड़ते हैं  सच के खिलाफ। और जो झूठ हैं उसके साथ चुप-चाप बैठ  जाते हैं। और फिर बड़ी बेशर्मी से हँसते - हँसते टीवी के चैनल्स पर सच्चे बनने का ढोंग करते हैं। देशभक्ति के नारे लगाते हुए भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं। चाहे वो युददुरप्पा (बीजेपी) हो या राजा  हो या वीरप्पा मोइली हो
या कोई और।
आज अरविन्द केजरीवाल ने इस्तीफ़ा देकर सच की लड़ाई आगे बड़ाई हैं। बिना किसी डर के या बिना सत्ता के
लालच के  कुछ करना ये सब तो कुछ अजीब सा लगता हैं या स्वप्न लगता हैं। पर इस स्वप्न को सच कर दिखाया था अरविन्द ने।
हमे शायद आदत हो गयी हैं गन्दी व टूटी सड़को के बीच में  रहने की। रोज-रोज जाम सहने की। पुलिस की लाठी खाने की। गंदा पानी पीकर बीमार होने की। और तो और हम ये भी नहीं जानते कि जिस भ्रष्टाचार के फ्लाईओवर से रोज हम गुजरते हैं किसी दिन वो गिर जायेगा चाहे हम जितने मर्जी अमीर क्यों न हो।
जिस भ्रष्टाचार की A.C. रेल में  हम सफ़र करते हैं वो आये दिन आग में जल रही होती हैं।
इन हाई क्लास लोगो के ये नहीं मालूम कि यमुना को गन्दा रखकर वो कैंसर जैसी लाइलाज़ बिमारियों से आज घिरा हुआ हैं। और यमुना पर तो हजारों करोड़ रुपए खर्च करके भी  वो साफ़ न हो पायी। और बहुत कुछ हैं लिखने को
 पर आज इतना ही।
ये थी एक श्रद्धांजलि अरविन्द केजरीवाल के इस्तीफ़े पर।
 


Wednesday, February 12, 2014

' नायक ' अरविन्द केजरीवाल

' नायक ' अरविन्द केजरीवाल  ने आज   फ़िल्मी हीरो वाला काम किया हैं।  मुकेश अंबानी , मुरली देवड़ा और वीरपा मोइली
के खिलाफ FIR  करना एक बहुत ही साहस  वाला कार्य हैं जो एक साधारण मानव के वश का नहीं हैं।  मैं चकित हूँ कि इस इंसान को किसी का डर नहीं हैं। यहाँ भारत में ये नेता बिजनेसमैन गठजोड़ देश को बेच रहा हैं।
महंगाई बेलगाम हो कर नाक में दम कर चुकी हैं।
बात बहुत साधारण हैं जिस गैस के लिए रिलायंस ने 2 . 5 $ का एग्रीमेंट 2004 में 17 साल  के लिए किया था। वो पहले 4 . 5  $ हुई।  अब 8  $ होगी जिसका कोई सपष्टीकरण नहीं हैं। और तो और बांग्लादेश को वही गैस 2 $ पर एक्सपोर्ट होगी।  
  जाने कब अच्छे लोग हमारी राजनीति में चुने जायेंगे और मेरे भारत का भविष्य सुरक्षित होगा। मैंने पहले अपने ब्लॉग में  लिखा हैं
सच के ठेकेदार नाम से  में ---
- कि   "विचार शून्य लोग मिलकर इस धरती का भविष्य तय कर रहे हैं और यह लोग चीख रहे हैं कि यह धरती खतरे में हैं सच खतरे में हैं 'सच' खतरे में हैं ? तो पढे कुछ जीवन के कडवे सच जो हम सब की जिंदगी में रोज होते हैं पर हम उन्हे नजरअंदाज कर देते हैं यह वो सच हैं जो किसकी भी जिंदगी से जुड़े हो सकते हैं "

Sunday, February 9, 2014

माँ ओ माँ तू किथे गयी !

किसी   दी रबा माँ न मरे।
किसी  दी रबा माँ न मरे।
माँ मरे ते रिश्ते मुक जांदे ने।
माँ मरे ते सब पीछे छूट जाणदे  ने।
माँ  ओ माँ तू किथे गयी     
ओ माँ तू किथे गयी।
मैंने माँ के दिल को दुखाया
  राज ये जाना जब
अपनी माँ की अर्थी को कांधा  लगाया।
किसी दी रबा माँ न मरे।
ओ वी दिन मैं देख्या सी    जद
माँ खुद भूखी रहन्दी सी  ते
मैनु अपणे हथां नल खावन्दी सी।
बेशक मंदिर मस्जिद छोडो       ओ मैं वे  ऐ  केहना
कदी  माँ दा दिल न तोड़ो -कदी  माँ दा  दिल न तोड़ो।
इस माँ दिल विच रब रहन्दा।

Friday, January 31, 2014

AAP ---आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी  एक ऐसी पार्टी हैं जो हिंदुस्तान के  इतिहास में पहली बार बगैर  जातिवाद,बिना  ऊंचनीच  या बगैर  धर्मवाद की बाते करके सत्ता में आयी हैं।
इसमें शामिल लोग , मेधापाटेकर (नर्मदा आंदोलन ), कैप्टैन गोपीनाथ (एयर डेक्कन ), मीरा नायर (R.B.S.)
पत्रकार आशुतोष , JNU  के प्रोफेसर जैसे आनंदकुमार और चिनॉय आदि।
अरविन्द केजरीवाल ( IIT  खडगपुर ) से हैं।  और  इनकम टैक्स कमिशनर  रह चुके हैं। सूचना  के अधिकार के लिए (RTI ) MAGSAYSAY अवार्ड मिला हैं।
प्रशांत भूषण  सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं। इनके  पिताजी श्री शांति भूषण लॉ मिनिस्टर रह चुके हैं।

हिस्ट्री पड़ने से बहुत कुछ पता चलता हैं जैसे कि फ्रैंच की   क्रान्ति के  स्वरुप , पोलैंड की क्रान्ति के स्वरुप कैसे
पुनर्जन्म हुआ एक नयी पार्टी और एक नए लीडर का।

तो क्या हिंदुस्तान बदलने वाला हैं.…………… देखते हैं  या देखते रहे।
न  धर्म की  बाते होंगी ,  न  जातिवाद की।
यानि कुछ नया ?????

Wednesday, January 8, 2014

' मो सम कौन कुटिल खल कामी। '

मुझे यह वर्णन करना कुछ अजीब सा लगता हैं इन सब बातों से गुजर कर भी मैं क्योंकर विनम्र न हो पाया
ऐसा इसलिये मुझे महसूस हुआ क्योंकि आज मैं बिलकुल अकेला हूँ।  मैंने कहीं पड़ा हैं कि मनुष्य परीक्षाओं से
गुजरकर शुद्ध और नम्र बन जाता हैं। काफी कुछ गुजर चुका।  हम नफरत की ज्वाला में फंसे हुए असहाय प्राणी हैं।   यहाँ पर मुझे सूरदास की पंक्ति याद आ रही हैं -
       
                        '   मो सम कौन कुटिल खल कामी। '   ये आत्मग्लानि और निराशा के स्वर में उनकी पीड़ा थी जिसमे  हम  सबकी हामी हैं।