माँ ! तेरी याद बहुत आती है
कभी -कभी
अकेले में जब बैचेन होता हूँ तो
तू आकर मेरा माथा चूमती है और
बाल सहलाती है।
जख्म दिये है
घाव भी दिये है इस दुनिया ने
पर एक तू है जो
इन सब पर मरहम लगाती है और
मेरी पीठ थपथपाती है।
माँ तेरी याद बहुत आती है
कभी -कभी
जब हताश सा परेशान सा
बिस्तर पर सोने की कोशिश
में
पलको को बंद कर लेता हूँ तो
सपनो में आकर मुझे समझाती है
और मुझे लोरी गाकर सुलाती है।
ओ माँ! तू कहाँ चली गयी है
मुरझा
मेरे मन की कली गयी है
बहुत अकेले में , मैं रोता
अपने सपने में खोता
बच्चों से तेरी यादों को संजोता
बालों को उनके सहलाता ,
पीठ उनकी थपथपाता
कभी माँ तेरी याद में हँसता कभी रोता।
कभी -कभी
अकेले में जब बैचेन होता हूँ तो
तू आकर मेरा माथा चूमती है और
बाल सहलाती है।
जख्म दिये है
घाव भी दिये है इस दुनिया ने
पर एक तू है जो
इन सब पर मरहम लगाती है और
मेरी पीठ थपथपाती है।
माँ तेरी याद बहुत आती है
कभी -कभी
जब हताश सा परेशान सा
बिस्तर पर सोने की कोशिश
में
पलको को बंद कर लेता हूँ तो
सपनो में आकर मुझे समझाती है
और मुझे लोरी गाकर सुलाती है।
ओ माँ! तू कहाँ चली गयी है
मुरझा
मेरे मन की कली गयी है
बहुत अकेले में , मैं रोता
अपने सपने में खोता
बच्चों से तेरी यादों को संजोता
बालों को उनके सहलाता ,
पीठ उनकी थपथपाता
कभी माँ तेरी याद में हँसता कभी रोता।