Monday, February 15, 2016

रवींद्रनाथ टैगोर और वसंत --2

उस आदिकाल की सूनी दुपहरी में,जब वसंती हवा हमारे पेड़-पौधों में किसी को रत्ती भर खबर दिए बिना अचानक आ पड़ती,तब हम क्या लेख लिखते थे?या देश का उपकार करने निकलते थे तब हम सारे दिन खड़े-खड़े गूंगों की तरह,बौड़मो की तरह कांपते रहते थे,हमारा शरीर झर-झर ,मर-मर कर पागलों की तरह गाता रहता था,हमारी जड़ से लेकर शाखाओं की टहनियां तक रस के प्रवाह से भीतर ही भीतर चंचल हो उठती थी। उस आदिकाल का फागुन-चैत इसी तरह रस भरे आलस्य और अर्थहीन प्रलाप में कट जाता था। उसके लिए किसी के सामने कोई जवाबदेही नहीं करनी पड़ती थी। ...
अभिव्यकित के अंतिम कोष्ठ में आकर मनुष्य के अनेक भाग हो गए। जड़ भाग ,वनस्पति भाग,पशु भाग ,बर्बर भाग ,सभ्य भाग , देव भाग , इत्यादि। इन अलग-अलग भागों की एक-एक विशेष जन्म ऋतु है। किस ऋतु में कौन सा भाग पड़ता है ,इसके निर्णय का भार  मैं न लूंगा।
मुनष्य समाज से मेरा सविनय निवेदन है कि यह सिथति ठीक नहीं। इसमें मुनष्य का कोई गौरव नहीं कि वह दुनिया  से अलग रहे। मुनष्य इसलिए बड़ा है कि उसमे संसार की सब विविधता , सब वैचित्र्य हैं। मुनष्य जड़ के साथ जड़ ,तरु-लता से तरु-लता ,पशु-पक्षी के साथ पशु-पक्षी बन जाता है। प्रकृति के राजमहल के तमाम दरवाजे उसके लिए खुले हैं ,लेकिन खुले रहने से क्या होगा ?एक-एक ऋतु में जब एक -एक महल से उत्सव का निमंत्रण आता है ,तब मुनष्य उसको स्वीकार न करके अपनी आढ़त की गद्दी पर ही पड़ा रहे ,ऐसा बड़ा अधिकार उसे क्यों मिला ?पूरा मुनष्य बनने के लिए उसे सभी कुछ होना पड़ेगा।
हाय रे समाज-स्तंभ के पक्षी ! आकाश का नीला रंग आज विरहिणी की आंखों जैसा सपनों में डूबा हुआ है ,पत्ते का हरा रंग आज तरुणी के कपोल जैसा ताजा -ताजा है ,वसंत की हवा आज मिलन के आग्रह जैसी चंचल है ,तब भी तेरे डैने आज बंद हैं ,तब भी तेरे पैरों में कर्म की जंजीर है -यही क्या मानव जन्म है !
                                                                                                    (बंग-दर्शन से )



Sunday, February 14, 2016

रवींद्रनाथ टैगोर और वसंत --1


वसंत के दिन विरहिणी का मन हाहाकार करता है ,यह बात हमने प्राचीन काव्यों में पढ़ी है। प्रकृति के साथ अपने मन का संपर्क हमने ऐसा तोड़ लिया है। मुनष्य क्या बस इस अजस्रता के स्त्रोत को रुंधता रहेगा ?अपने को खिलाएगा नहीं ,फलाएगा नहीं ,दान करना न चाहेगा ?क्या हम ऐसे निरे मुनष्य हैं ?क्या हम वसंत के रहस्यमय रस-संचार विकलित तरु-लता-पल्लव कोई नहीं ? वे जो हमारे घर के आंगन को छाया से ढककर,गंध से भरकर,बांहों से घेरकर खड़े हों ,वे क्या हमारे इतने बेगाने हैं कि जब वे फूल बनकर खिल उठेंगे,तब हम अचकन पहनकर दफ्तर जाएंगे ?
मैं आज पेड़-पौधों के साथ अपनी पुरानी आत्मीयता स्वीकार करूंगा। आज मैं किसी तरह न मानूंगा कि व्यस्त होकर काम करते घूमना ही जीवन की अद्वितीय सार्थकता है। आज हमारी युग-युगांतर की बड़ी दीदी वनलक्ष्मी के घर भैया दूज का निमंत्रण है। वहां पर आज तरु-लता से बिल्कुल घर के आदमी की तरह मिलना होगा। आज छाया में लेटकर सारा दिन कटेगा,मिट्टी को दोनों हाथों से बिखेरूंगा,समेटूंगा,वसंती हवा जब बहेगी,तब उसके आनंद को मैं ह्रदय की पसलियों में बहने दूंगा,ताकि वहां पर ऐसी कोई आवाज न हो,जिसकी भाषा पेड़-पौधे नहीं समझते हों। इसी तरह चैत्र के अंत तक मिट्टी ,हवा और आकाश के बीच जीवन को नरम करके,हरा करके बिखेर दूंगा,प्रकाश में ,छाया में चुपचाप पड़ा रहूंगा। लेकिन हाय,कोई काम बंद नहीं होता,हिसाब की काँपी खुली रहती है। मैं नियम की मशीन में,कर्म के फंदे में पड़ गया हूं। अब वसंत के आने से क्या,जाने से ही क्या ?            
  अभिव्यकित के इतिहास में मनुष्य का एक अंश तो पेड़-पौधों के साथ जुड़ा हुआ है। हम लोग किसी समय शाखामृग थे,इसका परिचय हमारे स्वभाव में मिलता है। लेकिन उसके भी बहुत समय पहले किसी आदि-युग में हम निश्चय ही वृक्ष थे,यह क्या हम भूल सकते हैं ?    ----------                                                                                                           
                           
                                                                                                         (    बंग-दर्शन से )