उस आदिकाल की सूनी दुपहरी में,जब वसंती हवा हमारे पेड़-पौधों में किसी को रत्ती भर खबर दिए बिना अचानक आ पड़ती,तब हम क्या लेख लिखते थे?या देश का उपकार करने निकलते थे तब हम सारे दिन खड़े-खड़े गूंगों की तरह,बौड़मो की तरह कांपते रहते थे,हमारा शरीर झर-झर ,मर-मर कर पागलों की तरह गाता रहता था,हमारी जड़ से लेकर शाखाओं की टहनियां तक रस के प्रवाह से भीतर ही भीतर चंचल हो उठती थी। उस आदिकाल का फागुन-चैत इसी तरह रस भरे आलस्य और अर्थहीन प्रलाप में कट जाता था। उसके लिए किसी के सामने कोई जवाबदेही नहीं करनी पड़ती थी। ...
अभिव्यकित के अंतिम कोष्ठ में आकर मनुष्य के अनेक भाग हो गए। जड़ भाग ,वनस्पति भाग,पशु भाग ,बर्बर भाग ,सभ्य भाग , देव भाग , इत्यादि। इन अलग-अलग भागों की एक-एक विशेष जन्म ऋतु है। किस ऋतु में कौन सा भाग पड़ता है ,इसके निर्णय का भार मैं न लूंगा।
मुनष्य समाज से मेरा सविनय निवेदन है कि यह सिथति ठीक नहीं। इसमें मुनष्य का कोई गौरव नहीं कि वह दुनिया से अलग रहे। मुनष्य इसलिए बड़ा है कि उसमे संसार की सब विविधता , सब वैचित्र्य हैं। मुनष्य जड़ के साथ जड़ ,तरु-लता से तरु-लता ,पशु-पक्षी के साथ पशु-पक्षी बन जाता है। प्रकृति के राजमहल के तमाम दरवाजे उसके लिए खुले हैं ,लेकिन खुले रहने से क्या होगा ?एक-एक ऋतु में जब एक -एक महल से उत्सव का निमंत्रण आता है ,तब मुनष्य उसको स्वीकार न करके अपनी आढ़त की गद्दी पर ही पड़ा रहे ,ऐसा बड़ा अधिकार उसे क्यों मिला ?पूरा मुनष्य बनने के लिए उसे सभी कुछ होना पड़ेगा।
हाय रे समाज-स्तंभ के पक्षी ! आकाश का नीला रंग आज विरहिणी की आंखों जैसा सपनों में डूबा हुआ है ,पत्ते का हरा रंग आज तरुणी के कपोल जैसा ताजा -ताजा है ,वसंत की हवा आज मिलन के आग्रह जैसी चंचल है ,तब भी तेरे डैने आज बंद हैं ,तब भी तेरे पैरों में कर्म की जंजीर है -यही क्या मानव जन्म है !
(बंग-दर्शन से )
अभिव्यकित के अंतिम कोष्ठ में आकर मनुष्य के अनेक भाग हो गए। जड़ भाग ,वनस्पति भाग,पशु भाग ,बर्बर भाग ,सभ्य भाग , देव भाग , इत्यादि। इन अलग-अलग भागों की एक-एक विशेष जन्म ऋतु है। किस ऋतु में कौन सा भाग पड़ता है ,इसके निर्णय का भार मैं न लूंगा।
मुनष्य समाज से मेरा सविनय निवेदन है कि यह सिथति ठीक नहीं। इसमें मुनष्य का कोई गौरव नहीं कि वह दुनिया से अलग रहे। मुनष्य इसलिए बड़ा है कि उसमे संसार की सब विविधता , सब वैचित्र्य हैं। मुनष्य जड़ के साथ जड़ ,तरु-लता से तरु-लता ,पशु-पक्षी के साथ पशु-पक्षी बन जाता है। प्रकृति के राजमहल के तमाम दरवाजे उसके लिए खुले हैं ,लेकिन खुले रहने से क्या होगा ?एक-एक ऋतु में जब एक -एक महल से उत्सव का निमंत्रण आता है ,तब मुनष्य उसको स्वीकार न करके अपनी आढ़त की गद्दी पर ही पड़ा रहे ,ऐसा बड़ा अधिकार उसे क्यों मिला ?पूरा मुनष्य बनने के लिए उसे सभी कुछ होना पड़ेगा।
हाय रे समाज-स्तंभ के पक्षी ! आकाश का नीला रंग आज विरहिणी की आंखों जैसा सपनों में डूबा हुआ है ,पत्ते का हरा रंग आज तरुणी के कपोल जैसा ताजा -ताजा है ,वसंत की हवा आज मिलन के आग्रह जैसी चंचल है ,तब भी तेरे डैने आज बंद हैं ,तब भी तेरे पैरों में कर्म की जंजीर है -यही क्या मानव जन्म है !
(बंग-दर्शन से )