Sunday, December 22, 2013

सूरज रे जलते रहना

जगत भर की रोशनी  के लिए
करोडो  की जिन्दगी  के लिए
सूरज रे जलते रहना
भले ही अंग तेरा भस्म हो जाये
तू जल जल के यहाँ किरणे लूटा रे
ये एक लीला हे भगवन की                           फ़िल्म राजा हरिशचन्द्र

 उसने मुझे अधिक से अधिक अंधकारपूर्ण घड़ी में  भी नहीं छोड़ा हैं। कई बार तो उसने मुझे खुद मेरे ही
खिलाफ बचाया हैं और मुझे जरा सी भी स्वाधीनता नहीं दी हैं।
बात १३ अगस्त २००८ रात के ३ बज़े की हैं। स्थान -एक्शन बालाजी हॉस्पिटल , पश्चिम विहार ,न्यू दिल्ली
जिस समय मैने इसे सुना, मैं कोई सपना नहीं देख रहा था। मैं बिलकुल जागृत था।
आवाज सुनने के पहले मेरे ह्रदय में  भारी मंथन  चल रहा था।          
                                                                                                     .....................शेष बाकी    
दिसंबर 25 ,2013
MARRY CHRISTMAS 
भगवान के बेटे के जन्मदिन पर ये लिखना कि मेरे अनुभव ने जो मुझे दिया हैं --सत्य की जो जुड़ती हुयी छोटी-२  झांकियां मुझे हो पायी हैं , उनसे सत्य के उस अवर्णीय तेज की कल्पना नहीं हो सकती , जो हमारी आँखों से रोज दिखायी देने वाले सूरज के तेज से करोड़ गुना अधिक हैं। सच तो यह हैं कि जो मैंने देखा हैं वह उस अतुलनयी महान प्रकाश की हल्की सी झलकमात्र हैं।
जो अभेद्य अंधकार मेरे चोरो और छाया हुआ था, वह शाप नहीं वरदान निकला और देवीय प्रकाश मुझे कुछ समझा पाया और दिखा पाया और फिर मैं उस प्रकाश की  और बड़  चला।
उस प्रकाश की शक्ति ने मुझे शक्ति दी और
मैं 14 अगस्त 2008  को दोपहर बाद अपने घर में था। ये जानना नितांत आवशयक हैं कि 13 अगस्त रात्रि से पूर्व मैं बिस्तर से उठ पाने में  असमर्थ था। हालाँकि
कुछ ऐसा जादू नहीं हुआ था कि मैं बिलकुल ठीक हो गया था। मेरा पुनर्जन्म हुआ था। मैने धीरे-२ परिस्थिति का मूल्यांकन  करना शुरू किया।
इस भूमि पर मैंने ईश्वर जैसा कठोर मालिक नहीं देखा। वह आपकी परीक्षा बार -बार लेता ही रहता हैं। और
जब आपको ऐसा लगता हैं कि आपकी श्रद्धा या आपका शरीर आपका साथ नहीं दे रहा हैं और आपकी नॉव  डूब रही हैं , तब वह आपकी मदद को किसी न किसी तरह पुहंच जाता हैं और आपको विश्वास करा देता और आपका संकेत पाते ही आने को तैयार हैं , परन्तु आपकी शर्त पर नहीं , अपनी शर्त पर। और
ये सब मुझे इतना आसान नहीं लगता।  मुझे कई  ऐसे उदहारण स्वयं से खोजने पड़े ऐसा कहना शायद अतिश्योक्ति होगा।                                  
                                                                                                ..............शेष बाकी

तुझसे बड़ा निर्देशक कौन हैं

सारे सँसार का मालिक एक हैं
जीवन की  नाव हिचकोले खा रही हैं।
नाव की पतवार मेरे हाथ में हैं
ऐसा लगता हैं।
परन्तु तू इस सँसार का तारणहार हैं
और
तुझसे बड़ा निर्देशक कौन हैं जो
कभी खलनायक तो कभी नायक बना कर
मुझे नचाता हैं।

Saturday, December 7, 2013

तू क्या चाहता हैं !

मेरे परमेश्वर  तू क्या चाहता हैं ?
पहले  तू स्वयंवर रचाता हैं
मौत ,जो कि तेरी बेटी हैं
उससे मेरा  शादी करना चाहता हैं
हे मेरे परमेश्वर तू मेरा अन्त क्यूॊ
चाहता हैं। 
अपने नाटक में  हीरो के रोल का
वायदा करके
मुझे खलनायक बनाता हैं और फिर
मुझे अपना दामाद बनाता हैं
हे मेरे परमेश्वर तू क्या चाहता हैं।
अँधेरी गलियन में , मैं भटकता हूँ
सच-झूठ के नातॊ में  अटकता हूँ।
जाने -अन्जाने मैं क्या करता हूँ ,
मुझे है सब पता
कि
तुझे है सब पता



NELSON MANDELA - A STRENGTH

OUR 'COMMON MAN' DON'T EVEN GIVE A SECOND TO THIS THOUGHT THAT

 WHY OUR CIVILIZED  WORLD IS SO CIVILIZED & WHOSE EFFORTS AFTERALL

HAS GIVEN US SO MUCH FREEDOM.

ONCE EINSTEIN ON MAHATMA GANDHI, "COMING GENERATION WON'T BELIEVE

THERE WAS A  HUMAN BEING LIKE US ."

BUT MY CIVILIZATION IS BLESSED WITH MARTIN LUTHER KING, MAHATMA GANDHI,

NELSON MANDELA,MOTHER TERESA, ALBERT EINSTEIN ETC.

NOT ONLY YESTERDAY , MY PRESENT IS ALSO BLESSED WITH AUNG SAN SUU KI  ,

DALAI LAMA, LIU XIAOBO LIKE LEADERS WHO ARE FIGHTING FOR HUMAN FREEDOM

& RIGHTS .

TODAY NELSON MANDELA ESTABLISHED THIS TRUTH THAT HATRED CAN BE

COUNTRED

BY ONLY LOVE BY ACCEPTING WHITE &

 FORGETTING PAST IN SOUTH AFRICA.

SINCE I'VE SEEN HIM DURING MY LIFE CYCLE SO THIS STRENGTHEN MY BELIEF THAT

GREAT HUMAN BEINGS ARE POSSIBLE IN THIS WORLD.

SOMETIME, IT IS NOT POSSIBLE FOR ME TO BELIEVE THIS FACT MANDELA HAD SPENT

27 YEARS IN JAIL.

 KNOWING  NELSON MANDELA GIVES ME A STRENGTH  &

 COMPLETE RESPECT FOR

HIS HOLY SOUL.

Wednesday, December 4, 2013

आग और बर्फ

आग और बर्फ  में  फर्क
कुछ भी नहीं हैं
जिंदगी  और मौत में  फर्क
 कुछ भी नहीं हैं
जीत और हार में  फर्क
कुछ भी नही  हैं
नज़रिया   बदले
यानि
 चश्मा पहने आँखों पर
फिर नजर आयेगा  सच
कि
जीत जाना यानि सब कुछ पा लेना
हार कर जीना यानि जीते जी मर जाना
तो मैं उठा हर बार जीतने को
इस जिंदगी को देखा कुछ ऐसे
नंगी आँखों पर चश्मा ? नहीं सब गलत है
फिर सोचा और पाया
कि हार और जीत से परे  है कुछ   आकार
जिसे मैं  समझ न पाया  बारम्बार
चश्मा जरूरी है
मगर नजर का नहीं।
मैंने पुछा किसी से न कुछ
मैंने कहा न किसी से कुछ। 
यानि
आग और बर्फ

आग और बर्फ  में  फर्क
कुछ भी नहीं हैं?

Sunday, December 1, 2013

आत्मसमर्पण

तुम प्रकृति हो , सूक्ष्म आत्मा हो ,
असली निवासी तुम हो ,
मैं तो मात्र गेह हूँ।
प्रभो , मैं तुम्हारा साधन और यन्त्र हूँ।
ऐसा करो कि मेरा मत्र्य अस्तित्व
तुम्हारी महिमा से मिलकर एकाकार हो जाए।

मैंने अपना मन तुम्हें दे दिया हैं
जिससे तुम्हारा मन इसमें नहर खोदे।
मैंने अपनी ईच्छा तुम्हारे चरणो पर धर दी हैं,
जिससे वह तुम्हारी ईच्छा बन जाए।
मेरे किसी भी अंश को पीछे मत छोड़ो ,
रहस्यपूर्ण  और अनिवर्चनीय ढंग से
अपने साथ मुझे एक होने दो।

तम्हारा प्रेम , जो निखिल विश्व के प्राणों में
स्पन्दन भरता हैं,
उसके साथ मेरे हृदय को  स्पन्दित होने दो।
पृथ्वी के उपयोग के लिए
तुम मेरे शरीर को इंजिन बनाना।

मेरी धमनियों और शिराअों में
तुम्हारे आनन्द की धारा बहेगी।
तुम्हारी शक्ति जब छूटेगी ,
मेरे विचार प्रकाश की सीमा बनेंगे।
ऐसा करो कि मेरी आत्मा
निरन्तर तुम्हारी पूजा में लीन रहे।
और प्रत्येक आकार
तथा प्रत्येक आत्मा में
तुम्हारा दर्शन करे।                                                         लिखित     श्री अरविन्द

आकार

ओ निराकार और असीम की पूजा करने
 वाले ?
आकार की अवज्ञा मत करो।
आकार में जो बसता हैं,
वह ईश्वर हैं।
प्रत्येक ससीम के भीतर
गम्भीर असीम का वास हैं।
अपनी विशुद्ध आनन्दमय आत्मा को
आवरण में डाले हुए
ससीम के भीतर असीम छिपा हैं।
अपनी दुरूह अशब्दता के ह्रदय में
आकार परमेश्वर के रहस्य की
महिमा को छिपाय हुए हैं।
आकार  निस्सीमता का चमत्कार - कुटीर हैं।
आकार मृत्यंजय वैखानस की गुफा हैं।
भगवान की गहराइयों में  भी सौंदर्य हैं।
जो स्वयं महाशचर्य हैं ,
उसी का चमत्कार अपने वास के लिए
सृष्टि की  रचना करता हैं।
                                                             लिखित                    श्री अरविन्द