Thursday, August 28, 2014

काश ,जो कुछ हमने जिया है ?

चेखव के नाटक ' तीन बहनें '  के बारे में पढ़कर  अच्छा लगा। ऐसा लगा कि मैंने अपनी जिन्दगी के कुछ पलों में पूरी जिन्दगी  का दर्द सिमटा कर उसे खत्म कर दिया है शायद। एक पंक्ति
"व्यर्थता बोध की मारी इरीनी अवसाद के क्षणों में कहती है ,काश ,जो कुछ हमने जिया है , वह जिन्दगी का रफ ड्राफ्ट होता और इसे फेयर करने का एक मौका और हमें मिलता। "
पर रफ हो या फेयर जिन्दगी की घटनाएं जब घटित होती हैं तो उस वक़्त जो निर्णय लिए जाते हैं वही सर्वोत्तम होते हैं।
        वक़्त के सिलसिले में जीना , जिन्दगी को घूट -घूट  कर पीना।
                        जख्म कोई भी मिले दर्द से उसे सी लेना।
       

Tuesday, August 19, 2014

भगवान कृष्ण को समझना जरूरी है।

भगवान  कृष्ण को समझना जरूरी है। हर लीला बालपन से लेकर भगवान के अवसान तक हमें एक रहस्य से पर्दा उठाती हुई नजर आती हैं। भगवान कृष्ण  की लीला  लिखना बहुत आसान है परन्तु समझ पाना लगभग
असम्भव अगर नहीं तो मुश्किल जरूर है क्योंकि लोग हर जगह की तरह यहां भी रस ढूंढ़ते हैं। और फिर रसपान करने में समझ का उपयोग करना कठिन लगता हैं।
भगवान कृष्ण कहते हैं (  गीता शलोक 10 वा अध्याय 6 ):
योगी को चाहिए कि वह एकान्त में अकेला बैठकर अपने -आपको वश में रखते हुए , सब इच्छाओं से मुक्त होकर और किसी भी परिग्रह (धन -सम्पत्ति या साज -सामान ) की कामना न करते हुए अपने मन को (परमात्मा में ) एकाग्र करे।
अब यहां पर रस ढूंढना  और वो भी समझ के साथ , तो जीवन सार्थक हैं। परन्तु धन -सम्पत्ति की लालसा या कामना और उसके व्यय करने की चिन्ता हमारी समझ को विचलित करती हैं और हमें आत्मिक जीवन से दूर ले जाती हैं।
ईसा  ने एक धनी आदमी से , जो कहता था कि  वह सब धार्मिक आदेशों का पालन करता है , कहा था : " फिर भी एक चीज़ तुममें नहीं है : जो कुछ तुम्हारे पास है , उस सबको बेच दो और गरीबों में बांट दो और इससे तुम्हे स्वर्ग में खज़ाना मिल जाएगा। " जब ईसा ने देखा कि यह सुनकर वह धनी आदमी बहुत उदास हो गया , तो उसने कहा :: " जिनके  पास धन है , उनके लिए परमात्मा के राज्य में  प्रवेश पाना बहुत कठिन होगा ;क्योंकि ऊंट के लिए सुई के छेद में से जाना आसान है , किन्तु धनी व्यक्त्ति के लिए परमात्मा के राज्य में प्रवेश कर पाना मुश्किल  हैं। "
गीता बताती है कि  सच्चा आनन्द आन्तरिक आनन्द है। शरीर मर सकता है और संसार नष्ट हो सकता है , परन्तु आत्मिक जीवन चिरस्थायी है। और हमारा खज़ाना संसार की नश्वर वस्तुएं नहीं हैं ,अपितु उस परमात्मा का ज्ञान और उसके प्रति प्रेम है जो अनश्वर हैं।
               मेरे भाग्य में नित्य आंसू और आहें लिख दो।
       और मुझे मेरे आत्म से दूर अपनी राह पर ले चलो ,
             जिससे अपने आत्म को गंवाकर मैं तुम तक पहुंच संकू।




Friday, August 15, 2014

आज १५ अगस्त हैं !

प्रिय नरेश ,
आज १५ अगस्त हैं सुबह सात बजे टीवी पर लालकिले का  कार्यक्रम   चल रहा था।
पहले झंडा फहराने के वक़्त जनगण मन हुआ।   कुछ याद आया ,
फिर मन हुआ कि साथ-साथ गाऊँ। पर वक़्त गुजर गया और फिर एक बहुत ही कमजोर भाषण हुआ।
 पर अंत में फिर जनगण मन शुरू हुआ, इस बार मेरी  आँखों में आसूँ भर आये   और
मैं जनगण मन गाने लगा।
फिर मैंने 'हकीकत' मूवी देखी। उसके बाद
जाने 'मैं ' कहाँ  खो गया।
 सिर्फ १५ अगस्त की ही बात नहीं हैं,
 वो आदर्शवाद की बाते।
वो सपने।
शायद मैं अब जहाँ हूँ   वहाँ से मुड़कर कुछ कर पाना  शायद बहुत कठिन हैं
समाज को बदलना , नयी सोच लाना शायद सड़े गले शब्द हैं
क्योंकि
हम इस समाज के हिस्से- कायर हैं , डरपोक हैं।
गाँधी का नाम लेकर  प्रसन्न होते हैं।
और
भगवान् से डरते हैं
 प्यार करना शायद हमें  आता नहीं।
बाकी फिर लिखूँगा ।

 वैसे सच बात ये हैं कि
अब मौत बेवफा लगती हैं            और
जिंदगी का मत पूछ मेरे यार क्योंकि
संगदिल बातों पे यकीं मुझे कम हो चला हैं

कुछ तुम कहो।  एक बात रह गयी शायद --ये  गाना सुनना --मुकेश का (फिर सुबह होगी )
"आसमान पे है खुदा और ज़मीन पे हम
आजकल वो इस तरफ देखता है कम
आजकल किसी को वो रोकता नहीं
चाहे कुछ भी कीजये टोकता नहीं     -----                      EARLIER PUBLISHED ON 15/8/2013.

यह है हिन्दुस्तान मेरी जान !

बिलकुल ठीक पड़ा आपने  
जान सस्ती ईमान सस्ता बिकता है
  पूरा हिन्दुस्तान
  हो यकीं  
तो पड़ लो  
आज का पेपर मेरी जान
लड़ते- झगड़ते यहां के लोग 
  सड़के टूट  रही हैं   
पानी-बिजली  नहीं है दिल्ली जैसे शहरों में
पता नहीं मैं कहा रह रहा हूँ
 सब कुछ भगवान भरोसे हैं
और मोदीजी के अच्छे दिन तो दूर की 
कोड़ी है 
बुरे दिनों की बरसात हो रही है  
15 अगस्त 2014  आज़ादी की  68 वीं  वर्षगांठ 
बातें अच्छी हैं : जब मैं देखता हूं इराक 
जब मैं देखता हूं पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को 
बातें अच्छी हैं  :जब मैं देखता हूं सीरिया या यूक्रेन  को 
तो बस एक खबर अच्छी है: कि मैं अपने हिन्दुस्तान को 
मिलाऊँ तो इन्हीं देशों से। 
और अमेरिका या चीन  और जापान या ऑस्ट्रेलिया 
से मिलाना एक जुर्म हो गया।
 
 

Wednesday, August 13, 2014

मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो

ओ  धैर्यशाली तारो ,
 मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो ,
तुम जो प्रत्येक  रात्रि  में
इस प्राचीन आकाश में चढ़ते हो।
और आकाश पर
 न कोई छाया छोड़ते हो ,
 न कोई निशान ,
न आयु   का कोई चिन्ह
और
 न मृत्यु का कोई भय।

Monday, August 11, 2014

भगवान कहते हैं

भगवान कहते हैं :
"तुम सब हुए हो और तुमने देखा है  किया है और सोचा है ,
तुमने नहीं , लेकिन मैंने देखा है ,
 और मैं  हुआ हूं और मैंने किया है .......
तीर्थ -यात्री , तीर्थ-यात्रा और मार्ग ,
मैं  स्वयं ही था ,जो अपनी ओर जा रहा था ;
 और तुम्हारा
आगमन मेरे अपने द्वार पर  मेरा ही आगमन था ……
आओ ,तुम भटके हुए कणों ,
अपने केन्द्र की ओर खिंच आओ .......
ओ किरणों ,जो सुदूर अन्धकार में भटकती रही हो ,
लौट आओ और वापस अपने सूर्य में विलीन हो जाओ। "

Thursday, August 7, 2014

लोकसंग्रह :संसार को बनाए रखना।

लोकसंग्रह :संसार को बनाए  रखना।
लोकसंग्रह का अभिप्राय संसार की एकता या समाज की परस्पर -संबद्धता से है। यदि संसार को भौतिक कष्ट और नैतिक अध:पतन की दशा में  नहीं गिरना है ,यदि सामान्य जीवन को सुचारू और सगौरव होना है ,तो सामाजिक कर्म  का नियंत्रण धार्मिक नीति से होना चाहिए। धर्म का उद्देश्य समाज का आध्यातिमकरण करना है ,पृथ्वी पर भ्रातृभाव की स्थापना करना। हमे पार्थिव संस्थाओ में आदर्शो को साकार करने की आशा से प्रेरणा मिलनी चाहिए।
जब भारतीय जगत की जवानी समाप्त हो चली , तब इसका झुकाव परलोक की ओर हो चला। श्रांत वयस में हम  त्याग और सहिष्णुता के संदेशो को अपना लेते है। आशा और ऊर्जा की वयस में हम
संसार में  सक्रिय सेवा और सभ्यता की रक्षा करने पर जोर देते हैं।
बोइथियस ने जोर देकर कहा है कि  " जो अकेला स्वर्ग जाने को तैयार है ,वह कभी स्वर्ग नहीं जाएगा। "

Saturday, August 2, 2014

भगवान का प्रकट होना !


दिव्य शक्ति का महान आत्मप्रकाशन उस अर्जुन के सम्मुख प्रकट होता है ,जो विश्व की प्रक्रिया और भक्ति के सच्चे अर्थ को समझता है। भगवान कृष्ण अपने विश्वरूप में दुर्योधन के सम्मुख तब प्रकट हुए थे ,जब कि सन्धि का अन्तिम प्रयत्न करने के लिए आए हुए भगवान कृष्ण को दुर्योधन ने बन्दी बना लेने का प्रयत्न किया था।
यह दिव्य रूपदर्शन कोई किंवदन्ती या पौराणिक कथा नहीं है ,अपितु एक आध्यातिम्क अनुभव है। धार्मिक अनुभव के इतिहास में इस प्रकार के अनेक दर्शनों का उल्लेख प्राप्त होता है। ईसा का रूपान्तर , दमिश्क की सड़क पर साऊल का दर्शन ,कॉन्स्टैन्टाइन द्वारा एक क्रॉस का दर्शन ,जिस पर ये शब्द अंकित थे "इस चिन्ह को लेकर विजय करो " तथा जॉन ऑफ़ आर्क के इसी प्रकार के दर्शन अर्जुन के दिव्य रूप दर्शन की कोटि के ही अनुभव हैं।
यह दर्शन कोई मानसिक कल्पना नहीं है ,अपितु सीमित मन से परे एक सत्य का उदघाटन है। यहां अनुभव की स्वतःस्फूर्तता और प्रत्यक्षता स्पष्ट है।

Friday, August 1, 2014

रूस और अमेरिका

अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर जो पांबदिया थोपी हैं। इससे शत्रुता की खाई गहरी  होगी और फिर दुनिया के कदम शीत युद्ध की तरफ बढ़ेंगे। अमेरिका अपने को दूध का धुला और दूसरों को अपराधी क्यों मानता हैं। पहले भी इराक पर हमला करके अमेरिका ने सबका सुख चैन छीना। सद्दाम हुसैन के समय इराक एक ठीक -ठाक देश था। पर अब तो कुछ भी नहीं बचा इराक में।
इधर गजा में  इज़रायल ने घमासान मचा रखा हैं। और लीबिया में गृहयुद्ध यानी अराजकता का माहौल।
अफगानिस्तान में रूस को हटाते -हटाते तालिबान जैसा जिन्न , जिसने अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बर्बाद करने में कोई कसर  नहीं छोड़ी ,पैदा किया।
अमेरिका को बिन मांगे एक सलाह रूस और यूक्रेन की चिंता छोड़ कर अपने गिरबान में  झांके। तो अमेरिका को समझ आएगा कि रूस और अमेरिका बहुत अच्छे मित्र देश हैं।