Saturday, August 2, 2014

भगवान का प्रकट होना !


दिव्य शक्ति का महान आत्मप्रकाशन उस अर्जुन के सम्मुख प्रकट होता है ,जो विश्व की प्रक्रिया और भक्ति के सच्चे अर्थ को समझता है। भगवान कृष्ण अपने विश्वरूप में दुर्योधन के सम्मुख तब प्रकट हुए थे ,जब कि सन्धि का अन्तिम प्रयत्न करने के लिए आए हुए भगवान कृष्ण को दुर्योधन ने बन्दी बना लेने का प्रयत्न किया था।
यह दिव्य रूपदर्शन कोई किंवदन्ती या पौराणिक कथा नहीं है ,अपितु एक आध्यातिम्क अनुभव है। धार्मिक अनुभव के इतिहास में इस प्रकार के अनेक दर्शनों का उल्लेख प्राप्त होता है। ईसा का रूपान्तर , दमिश्क की सड़क पर साऊल का दर्शन ,कॉन्स्टैन्टाइन द्वारा एक क्रॉस का दर्शन ,जिस पर ये शब्द अंकित थे "इस चिन्ह को लेकर विजय करो " तथा जॉन ऑफ़ आर्क के इसी प्रकार के दर्शन अर्जुन के दिव्य रूप दर्शन की कोटि के ही अनुभव हैं।
यह दर्शन कोई मानसिक कल्पना नहीं है ,अपितु सीमित मन से परे एक सत्य का उदघाटन है। यहां अनुभव की स्वतःस्फूर्तता और प्रत्यक्षता स्पष्ट है।

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