Wednesday, September 30, 2015

"हां पिता , हां , और सर्वदा हां। "

  

 परमात्मा हमारे सम्मुख शर्ते रख देता है 
और उन्हें स्वीकार करना हमारा काम है।
हमें बहाव के विरुद्ध संघर्ष करने में  
अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहिए।
हममें से अधिकांश लोग स्वाभविक मुनष्य होते है ,
जो अपनी छोटी -छोटी योजनाओं
 के विषय में बहुत उत्सुक ,आवेशपूर्ण 
और सुनिशिचत होते है। 
परन्तु हमे बदलना होगा।
जिस उपाय द्वारा
 हम अधिकतम उपयोगी सिद्ध हो सकते है
 वह परमात्मा की इच्छा के
सम्मुख सिर झुका देने का ही है। 
संत  फ्रांसिस डि सालेस की
 एक प्रिय प्रार्थना में
 इस पूर्ण अधीनता की इस भावना को
 संक्षेप में इस प्रकार प्रकट किया गया है :
                                                   "हां पिता , हां ,और सर्वदा हां। "

लौट आओ और वापस अपने सूर्य में विलीन हो जाओ।

भगवान कहते हैं : 
"तुम सब हुए हो
 और 
तुमने देखा है  किया है और सोचा है ,
तुमने नहीं ,
 लेकिन मैंने देखा है ,
 और मैं  हुआ हूं 
और मैंने किया है .......
तीर्थ -यात्री , तीर्थ-यात्रा और मार्ग ,
मैं  स्वयं ही था ,
जो अपनी ओर जा रहा था ;
 और तुम्हारा
आगमन मेरे अपने द्वार पर 
 मेरा ही आगमन था ……
आओ ,
तुम भटके हुए कणों ,
अपने केन्द्र की ओर खिंच आओ ....... 
ओ किरणों ,
जो सुदूर अन्धकार में भटकती रही हो ,
लौट आओ
 और वापस अपने सूर्य में विलीन हो जाओ।