Wednesday, November 26, 2014

मेरे भगवान , मेरे पिता

I . हे  भगवान , मैं कौन
मेरी अपनी आत्मा तू है ;
मेरी बुद्धि तू है ;
मेरे जीवन के कृत्य  (प्राण ) मेरे साथी है ;
शरीर मेरा घर है ;
इन्द्रियों के विषयों का विविध उपभोग मेरी   पूजा  है ;
निंद्रा  समाधि की दशा है ;
मेरे कदम मंदिर की प्रदक्षिणा है
और
मेरे सब वचन प्रार्थनाए है।
हे  भगवान , मैं
जो कुछ भी कर्म करता हूं ,
उनमें से प्रत्येक तेरी ही पूजा है।

  II   मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो 
 ओ  धैर्यशाली तारो ,
 मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो ,
तुम जो प्रत्येक  रात्रि  में
इस प्राचीन आकाश में चढ़ते हो।
और आकाश पर
 न कोई छाया छोड़ते हो ,
 न कोई निशान ,
न आयु   का कोई चिन्ह
और
 न मृत्यु का कोई भय।


       III 
 भगवान कहते हैं :
"तुम सब हुए हो और तुमने देखा है  किया है और सोचा है ,
तुमने नहीं , लेकिन मैंने देखा है ,
 और मैं  हुआ हूं और मैंने किया है .......
तीर्थ -यात्री , तीर्थ-यात्रा और मार्ग ,
मैं  स्वयं ही था ,जो अपनी ओर जा रहा था ;
 और तुम्हारा
आगमन मेरे अपने द्वार पर  मेरा ही आगमन था ……
आओ ,तुम भटके हुए कणों ,
अपने केन्द्र की ओर खिंच आओ .......
ओ किरणों ,जो सुदूर अन्धकार में भटकती रही हो ,
लौट आओ और वापस अपने सूर्य में विलीन हो जाओ।

IV .दिव्य प्रेम
 एक बार राबिया से पूछा गया :"क्या तुम सर्वशक्तिमान परमात्मा से प्रेम करती हो ?"
"हां। "
"क्या तुम शैतान से घृणा करती हो ?"   उसने उत्तर दिया :"भगवान  के प्रेम के कारण मेरे पास इतनी फुरसत ही नहीं रहती कि  मैं शैतान से घृणा कर संकू।मैंने पैगम्बर को सपने में देखा था। उसने पूछा ," अरी राबिया ,
क्या तू मुझसे प्रेम करती है ?"
मैंने उत्तर दिया," ओ खुदा के पैगम्बर , तुझसे कौन प्रेम नहीं करता ? परन्तु खुदा के प्रेम ने मुझे इतना तल्लीन कर लिया हैं कि मेरे दिल में किसी अन्य वस्तु  के लिए न तो प्रेम और न ही घृणा ही बाकी रही है। "
दिव्य प्रेम का अनुभव करने के लिए अन्य सब प्रेमों को त्याग देना होगा।

V.        "हां पिता , हां , और सर्वदा हां। "

 परमात्मा हमारे सम्मुख शर्ते रख देता है और उन्हें स्वीकार करना हमारा काम है।
हमें बहाव के विरुद्ध संघर्ष करने में  अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहिए।
हममें से अधिकांश लोग स्वाभविक मुनष्य होते है ,जो अपनी छोटी -छोटी योजनाओं
 के विषय में बहुत उत्सुक ,आवेशपूर्ण और सुनिशिचत होते है। परन्तु हमे बदलना होगा।
जिस उपाय द्वारा हम अधिकतम उपयोगी सिद्ध हो सकते है वह परमात्मा की इच्छा के
सम्मुख सिर झुका देने का ही है। संत  फ्रांसिस डि सालेस की एक प्रिय प्रार्थना में
 इस पूर्ण अधीनता की इस भावना को संक्षेप में इस प्रकार प्रकट किया गया है :
                                                   "हां पिता , हां ,और सर्वदा हां। "
 

Sunday, November 23, 2014

समय अभी है खून की पहचान बचाने का

नस -नस  में जहर है  भरा
कहीं गुस्सा है    तो
 कहीं नफरत की मिलावट खून में
कहीं कुंठाएं बन कर मिल गयी खून में तो
 कहीं  अंधविश्वासी धारणाए।
सब झूठ को बेचते हैं क्योंकि
 झूठ मिला है खून में।
सब बेचैन है
पर मैं चैन की नींद क्यों सो रहा हूँ ?
क्योंकि मेरी नस -नस  में भी जहर भरा है
 कुछ अजब सा !
सनक सी सवार है अजब सी ब्यार है
मन उतावला सा है  कुछ बेताब है
आओ जहर की जगह कुछ प्यार की बहार
कुछ कब्ज़ा जमीनों की बजाय दिलो पर करे
लड़े पर बचपन की मासूमीयत से लड़ कर
फिर दोस्त बन जाये
आओ एक नयी सनक से
धरती पर स्कूल या अस्पताल जैसे
नित नए रोज मंदिर  बनाए
आओ हम जहर निकाले  और
खंगाले अपने मन को
और पूछे क्यों तूफ़ान आया केदारनाथ में
क्यों गंगा -यमुना काली हो कर बेचैन है
समय अभी है मानव -सभ्यता को बचाने का
समय अभी है खून की पहचान बचाने का।

Sunday, November 2, 2014

झूठ की जमीन

हमारी जमीन , हमारे जमीर की पहचान है। अब हम सच की जमीन पर खड़े होकर कभी झूठ बोलते हैं तो कभी झूठ की जमीन पर खड़े होकर सच बोलते हैं। मुद्दा दरसल ये है कि सूर्य की रोशनी या हवा पर किसी का एकाधिकार नहीं है। उसी तरह भूमि पर भी अधिकार की बातें कुछ समझ पाना कठिन हैं। गांधीजी ने लिखा है कि  सम्पति के व्यकितगत स्वामित्व का कोई अधिकार स्वीकार नहीं जा सकता। और साफ -साफ लिखा था , देश में उपस्थित सट्टेबाज , भूस्वामी , कारखानेदार आदि हमारे देश की सफलता के सबसे बड़े बाधक हैं। वे सब शायद नहीं समझते है कि वे जनता के खून को चूसकर ही जी रहे हैं।इस तरह प्रकृति मानव की कृति नहीं हैं , उसकी सम्पदा भी मानव कृत नहीं है।
ईश्वर ही सबका मालिक है , संसार का सृजन किसी एक मानव के लिए नहीं किया है ,अपितु समस्त प्राणियों के लिए किया है। वक़्त ने इस समाज का मानवीकरण देखा है। और जैसे कि हवा,पानी और आकाश या सूर्य के प्रकाश का उपयोग सभी जीव रूप से करते हैं। इसी तरह पृथ्वी के उपभोग का भी सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।
परन्तु  एक समाज के निर्माण बनिस्पत हम लोग छोटे -छोटे घरों के निर्माण में व्यस्त हैं। चीन कहता है तिब्बत उसका है ,सागर उसका है। पाकिस्तान के मुताबिक कश्मीर उसका है। और ISIS के अनुसार शायद भारत सहित कई  इस्लमिक मुल्क उसके नक़्शे में हैं। तो मानव समाज का क्या ??
क्या हम अभी भी सभ्यता की क , ख  सीख  रहे है? ये मंगलयान की बातें या अर्थवव्यस्था का भूमंडलीकरण सब कोरी बकवास है। क्योंकि एक बात तो स्पष्ट है कि समाज का एक हिस्सा आगे बड़ जाये और बहुत बड़ा भाग पीछे छूट जाए ऐसा सम्भव नहीं।