I . हे भगवान , मैं कौन
मेरी अपनी आत्मा तू है ;
मेरी बुद्धि तू है ;
मेरे जीवन के कृत्य (प्राण ) मेरे साथी है ;
शरीर मेरा घर है ;
इन्द्रियों के विषयों का विविध उपभोग मेरी पूजा है ;
निंद्रा समाधि की दशा है ;
मेरे कदम मंदिर की प्रदक्षिणा है
और
मेरे सब वचन प्रार्थनाए है।
हे भगवान , मैं
जो कुछ भी कर्म करता हूं ,
उनमें से प्रत्येक तेरी ही पूजा है।
II मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो
ओ धैर्यशाली तारो ,
मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो ,
तुम जो प्रत्येक रात्रि में
इस प्राचीन आकाश में चढ़ते हो।
और आकाश पर
न कोई छाया छोड़ते हो ,
न कोई निशान ,
न आयु का कोई चिन्ह
और
न मृत्यु का कोई भय।
III
भगवान कहते हैं :
"तुम सब हुए हो और तुमने देखा है किया है और सोचा है ,
तुमने नहीं , लेकिन मैंने देखा है ,
और मैं हुआ हूं और मैंने किया है .......
तीर्थ -यात्री , तीर्थ-यात्रा और मार्ग ,
मैं स्वयं ही था ,जो अपनी ओर जा रहा था ;
और तुम्हारा
आगमन मेरे अपने द्वार पर मेरा ही आगमन था ……
आओ ,तुम भटके हुए कणों ,
अपने केन्द्र की ओर खिंच आओ .......
ओ किरणों ,जो सुदूर अन्धकार में भटकती रही हो ,
लौट आओ और वापस अपने सूर्य में विलीन हो जाओ।
IV .दिव्य प्रेम
एक बार राबिया से पूछा गया :"क्या तुम सर्वशक्तिमान परमात्मा से प्रेम करती हो ?"
"हां। "
"क्या तुम शैतान से घृणा करती हो ?" उसने उत्तर दिया :"भगवान के प्रेम के कारण मेरे पास इतनी फुरसत ही नहीं रहती कि मैं शैतान से घृणा कर संकू।मैंने पैगम्बर को सपने में देखा था। उसने पूछा ," अरी राबिया ,
क्या तू मुझसे प्रेम करती है ?"
मैंने उत्तर दिया," ओ खुदा के पैगम्बर , तुझसे कौन प्रेम नहीं करता ? परन्तु खुदा के प्रेम ने मुझे इतना तल्लीन कर लिया हैं कि मेरे दिल में किसी अन्य वस्तु के लिए न तो प्रेम और न ही घृणा ही बाकी रही है। "
दिव्य प्रेम का अनुभव करने के लिए अन्य सब प्रेमों को त्याग देना होगा।
V. "हां पिता , हां , और सर्वदा हां। "
परमात्मा हमारे सम्मुख शर्ते रख देता है और उन्हें स्वीकार करना हमारा काम है।
हमें बहाव के विरुद्ध संघर्ष करने में अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहिए।
हममें से अधिकांश लोग स्वाभविक मुनष्य होते है ,जो अपनी छोटी -छोटी योजनाओं
के विषय में बहुत उत्सुक ,आवेशपूर्ण और सुनिशिचत होते है। परन्तु हमे बदलना होगा।
जिस उपाय द्वारा हम अधिकतम उपयोगी सिद्ध हो सकते है वह परमात्मा की इच्छा के
सम्मुख सिर झुका देने का ही है। संत फ्रांसिस डि सालेस की एक प्रिय प्रार्थना में
इस पूर्ण अधीनता की इस भावना को संक्षेप में इस प्रकार प्रकट किया गया है :
"हां पिता , हां ,और सर्वदा हां। "
मेरी अपनी आत्मा तू है ;
मेरी बुद्धि तू है ;
मेरे जीवन के कृत्य (प्राण ) मेरे साथी है ;
शरीर मेरा घर है ;
इन्द्रियों के विषयों का विविध उपभोग मेरी पूजा है ;
निंद्रा समाधि की दशा है ;
मेरे कदम मंदिर की प्रदक्षिणा है
और
मेरे सब वचन प्रार्थनाए है।
हे भगवान , मैं
जो कुछ भी कर्म करता हूं ,
उनमें से प्रत्येक तेरी ही पूजा है।
II मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो
ओ धैर्यशाली तारो ,
मुझे भी अपना स्वभाव सीखा दो ,
तुम जो प्रत्येक रात्रि में
इस प्राचीन आकाश में चढ़ते हो।
और आकाश पर
न कोई छाया छोड़ते हो ,
न कोई निशान ,
न आयु का कोई चिन्ह
और
न मृत्यु का कोई भय।
III
भगवान कहते हैं :
"तुम सब हुए हो और तुमने देखा है किया है और सोचा है ,
तुमने नहीं , लेकिन मैंने देखा है ,
और मैं हुआ हूं और मैंने किया है .......
तीर्थ -यात्री , तीर्थ-यात्रा और मार्ग ,
मैं स्वयं ही था ,जो अपनी ओर जा रहा था ;
और तुम्हारा
आगमन मेरे अपने द्वार पर मेरा ही आगमन था ……
आओ ,तुम भटके हुए कणों ,
अपने केन्द्र की ओर खिंच आओ .......
ओ किरणों ,जो सुदूर अन्धकार में भटकती रही हो ,
लौट आओ और वापस अपने सूर्य में विलीन हो जाओ।
IV .दिव्य प्रेम
एक बार राबिया से पूछा गया :"क्या तुम सर्वशक्तिमान परमात्मा से प्रेम करती हो ?"
"हां। "
"क्या तुम शैतान से घृणा करती हो ?" उसने उत्तर दिया :"भगवान के प्रेम के कारण मेरे पास इतनी फुरसत ही नहीं रहती कि मैं शैतान से घृणा कर संकू।मैंने पैगम्बर को सपने में देखा था। उसने पूछा ," अरी राबिया ,
क्या तू मुझसे प्रेम करती है ?"
मैंने उत्तर दिया," ओ खुदा के पैगम्बर , तुझसे कौन प्रेम नहीं करता ? परन्तु खुदा के प्रेम ने मुझे इतना तल्लीन कर लिया हैं कि मेरे दिल में किसी अन्य वस्तु के लिए न तो प्रेम और न ही घृणा ही बाकी रही है। "
दिव्य प्रेम का अनुभव करने के लिए अन्य सब प्रेमों को त्याग देना होगा।
V. "हां पिता , हां , और सर्वदा हां। "
परमात्मा हमारे सम्मुख शर्ते रख देता है और उन्हें स्वीकार करना हमारा काम है।
हमें बहाव के विरुद्ध संघर्ष करने में अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहिए।
हममें से अधिकांश लोग स्वाभविक मुनष्य होते है ,जो अपनी छोटी -छोटी योजनाओं
के विषय में बहुत उत्सुक ,आवेशपूर्ण और सुनिशिचत होते है। परन्तु हमे बदलना होगा।
जिस उपाय द्वारा हम अधिकतम उपयोगी सिद्ध हो सकते है वह परमात्मा की इच्छा के
सम्मुख सिर झुका देने का ही है। संत फ्रांसिस डि सालेस की एक प्रिय प्रार्थना में
इस पूर्ण अधीनता की इस भावना को संक्षेप में इस प्रकार प्रकट किया गया है :
"हां पिता , हां ,और सर्वदा हां। "