Thursday, August 31, 2017

हे ! मेघ मल्हार

तूने यह कौन से गीत गाए?


माँगी थी पानी की चँद बूँदे ,


तन को शीतल करने के लिए,


सोचा था तू आएगा खुशियाँ लाएगा ,हरियाली छाएगी।


तन मन की ऊष्मता भगाएगा


पर हे !
मेघ मल्हार तूने यह कौन से गीत गाए ?


सोचा था , पढ़ा था ,


शुक -शुकी के गीतों के बारे में ,


राधा -कृष्ण की लीला के बारे में ,

सुना भी था -कोयल की कूकू के बारे में ,
सुना भी था ,पढ़ा भी था ,और भी बहुत कुछ अच्छा-अच्छा


पर हे ! मेघ मल्हार तूने यह कैसे गीत सुनाये


मैं सह भी जाता , मैं रह भी जाता ,


अगर इसमें होती किसी राधा की व्याकुलता ,


अपनें कृष्ण से मिलने की ,


पर अब मैं अपने मन की वेदना को ,


कैसे छुपाऊँ , हे !मेघ मल्हार तेरे


गीतों की त्रासदी मैं किस निर्ममता


से किस -किस को बताऊँ ,


हे !मेघ मल्हार तू ही मेरा दर्द जान ले ,


मुझमें छिपे एक इंसान को तू पहचान ले ,

हे! मेघ मल्हार ,

हे!मेघ मल्हार ,

हे! मेघ मल्हार । 

Tuesday, August 29, 2017

तू पास हो इस दिल को गवारा नहीं

मुझे तुमसे मोहब्बत है ये मेरी दीवानगी है
हर लम्हा तन्हाई हो बस हर लम्हे में तेरी  याद
तू पास हो  इस दिल को गवारा नहीं
ख्याल हो खयालात हो
बात हो बात में फिर कोई बात हो
सूना दिन हो या  रात हो और रात में चाँद सितारों से बात हो
बस ये दीवानगी मेरे पास हो
तू पास हो इस दिल को गवारा नहीं
समंदर की लहरों में
          न ढूंढा करूँ
नदी के भंवर में
         न  तलाश करूँ
पर्वतों की चोटियों से
        न  पुकारा करूँ
 दीवानगी से अपनी मोहब्बत को
             न  निहारा करूँ
बस यादों में समेट कर तेरी यादें
मुझे ये ख्याल आये   कि तू  आयी
कयोंकि
 तू पास हो इस दिल को गवारा नहीं

Tuesday, August 15, 2017

मेरा भारत महान!

बिलकुल ठीक पड़ा आपने   
जान सस्ती ईमान सस्ता बिकता है
  पूरा हिन्दुस्तान
  हो यकीं  
तो पड़ लो  
आज का पेपर मेरी जान 
लड़ते- झगड़ते यहां के लोग 
  सड़के टूट  रही हैं   
पानी-बिजली  नहीं है दिल्ली जैसे शहरों में
पता नहीं मैं कहा रह रहा हूँ
 सब कुछ भगवान भरोसे हैं
और मोदीजी के अच्छे दिन तो दूर की 
कोड़ी है 
बुरे दिनों की बरसात हो रही है  
15 अगस्त 2017   आज़ादी की  71 वीं  वर्षगांठ 
बातें अच्छी हैं : जब मैं देखता हूं इराक 
जब मैं देखता हूं पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को 
बातें अच्छी हैं  :जब मैं देखता हूं सीरिया या यूक्रेन  को 
तो बस एक खबर अच्छी है: कि मैं अपने हिन्दुस्तान को 
मिलाऊँ तो इन्हीं देशों से। 
और अमेरिका या चीन  और जापान या ऑस्ट्रेलिया 
से मिलाना एक जुर्म हो गया।
प्रिय नरेश ,
आज १५ अगस्त हैं सुबह सात बजे टीवी पर लालकिले का  कार्यक्रम   चल रहा था।
पहले झंडा फहराने के वक़्त जनगण मन हुआ।   कुछ याद आया ,
फिर मन हुआ कि साथ-साथ गाऊँ। पर वक़्त गुजर गया और फिर एक बहुत ही कमजोर भाषण हुआ।
 पर अंत में फिर जनगण मन शुरू हुआ, इस बार मेरी  आँखों में आसूँ भर आये   और
मैं जनगण मन गाने लगा।
फिर मैंने 'हकीकत' मूवी देखी। उसके बाद
जाने 'मैं ' कहाँ  खो गया।
 सिर्फ १५ अगस्त की ही बात नहीं हैं,
 वो आदर्शवाद की बाते।
वो सपने।
शायद मैं अब जहाँ हूँ   वहाँ से मुड़कर कुछ कर पाना  शायद बहुत कठिन हैं
समाज को बदलना , नयी सोच लाना शायद सड़े गले शब्द हैं
क्योंकि
हम इस समाज के हिस्से- कायर हैं , डरपोक हैं।
गाँधी का नाम लेकर  प्रसन्न होते हैं।
और
भगवान् से डरते हैं
 प्यार करना शायद हमें  आता नहीं।
बाकी फिर लिखूँगा ।

 वैसे सच बात ये हैं कि
अब मौत बेवफा लगती हैं            और
जिंदगी का मत पूछ मेरे यार क्योंकि
संगदिल बातों पे यकीं मुझे कम हो चला हैं

कुछ तुम कहो।  एक बात रह गयी शायद --ये  गाना सुनना --मुकेश का (फिर सुबह होगी )
"आसमान पे है खुदा और ज़मीन पे हम
आजकल वो इस तरफ देखता है कम