Saturday, January 30, 2016

महात्मा गांधी के लिए -एक श्रद्धांजलि "सत्यमेव जयते "।

सत्य की जीत का हम कैसे वर्णन कर सकते हैं?

सच और केवल एकदम सच
सच और सुन्दरता
सच और निडरता

सच और प्यार
सच और अहिंसा
सच और सहनशीलता

सच और चरित्र
सच और किसी वस्तु की इच्छा न होना
और सच ही इश्वर है

सच के लिए मरना
सच और जीवन
सच और तपस्या

सच की कीमत
सच को महसूस करना

तो यह थे सच्चाई के इतने विभिन्न रूप
परन्तु
लोग कहते हैं की :-
"मृत्यु ही सच है,यह जीवन झूठ है "
परन्तु मेरे विचार से जीवन ही सत्य है और शुरू से अंत तक हम अपनी-अपनी सच्चाईयों की लड़ाई लड़ते रहते हैं और अंत मे सच ही रहता है ,सच ही जीता है और अंततः सच जीतता है
इसीलिए कहा गया है:-
"सत्यमेव जयते "।   

Tuesday, January 26, 2016

लिखना समय के बारे में कुछ ऐसा !



समय तेजी से बीत रहा है या फिर कुछ ऐसे कि जब हम एक ट्रेन में बैठे हुए है और वो बहुत तेजी से एक तरफ चल रही है उसकी खिड़की में से बाहर देखने पर कुछ ऐसा लगता है कि सब पेड़ या फिर बाहर जो सड़क है वो तेजी से उलटी दिशा में भाग रही है कुछ ऐसा ही मैं  समय के बारे में महसूस करता हूँ। समय तो वही खड़ा है हम भागते जा रहे है। यानि कि बचपन , यौवन ,बुढ़ापा। पर यहाँ कुछ और है मेरा मकसद।
 अल्बर्ट आइंस्टाइन के सिद्वांतों के मुताबिक हमारी दुनिया का चौथा आयाम समय है।  और उन्होंने ये भी बताया कि समय स्थिर और अपरिवर्तनीय नहीं है। जैसे -जैसे किसी कण या पिंड की गति बढ़ती जाएगी ,उसके लिए समय धीमा पड़ता जाएगा। अगर कोई वस्तु प्रकाश की गति तक पंहुच जाएगी तो उसके लिए समय रुक जाएगा। प्रकाश की गति से जयादा अगर किसी वस्तु की हो जाएगी ,तो समय उसके लिए उल्टा यानी वर्तमान से अतीत की और चलने लगेगा। ये सब मैं इसलिए लिख रहा हूँ कयोंकि मैंने क्वांटम फिजिक्स के रिसर्च पेपर्स में फिजिकल रिव्यू लेटर्स जोकि मैंने कहीं पढ़े जिसमे लिखा था कि जब ब्रह्मांड की रचना हुई,तो न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण  के सिद्धांत के आधार पर गुरुत्वाकर्षण  ने किसी एक छण पर सारे कणों के बीच फर्क को न्यूनतम पर ला  दिया ,उसके बाद कण दो अलग -अलग दिशा में मुड  गए। इस तरह दो एक जैसे ,लेकिन विपरीत ब्रह्माण्ड बने ,जिनमे समय भी दो विपरीत दिशाओं में चलता है। इसका मतलब कोई हमारा जुड़वां ब्रह्माण्ड है।
क्वांटम फिजिक्स के मुताबिक सृष्टि के आरंभ के समय हर कण का एक प्रतिकण बना। यह प्रतिकण या एंटी पार्टिकल कुछ ऐसा जैसे कि आइने में उसके उलटे प्रतिबिंब जैसा था,ज्यादातर एंटी मैटर  सृष्टि के आरंभ में ही नष्ट हो गया ,लेकिन अब भी कुछ एंटी मैटर  ब्रह्मण्ड में मौजूद है।
सामन्य स्थिति में सोचें ,तो हम जो दुनिया देख रहे हैं ,वह दरअसल अतीत की है। आकाश में जो तमाम तारे जो हम देखते है ,उनसे आने वाली रोशनी सैकड़ों -हजारों साल में हम तक पहुंचती है ,इसलिए कोई तारा हजार ,कोई पांच हजार साल पुराना देखते है। कई तारे हमें ऐसे दिखते हैं ,जो हज़ारों साल पहले खत्म हो गए हैं। इसी तरह पृथ्वी से पांच हजार प्रकाश वर्ष दूर किसी सभ्यता के लोग पृथ्वी को देख पाएं ,तो उन्हें हड़प्पा ,मोहनजोदड़ो की सभ्यताओं में रहने वाले लोग दिखेंगे। और कुछ भी असंभव नहीं आज के संदर्भ में।

Thursday, January 21, 2016

शैतान की हरकतों को

वक़्त की नज़ाकत को समझकर
मैं भूल गया सब बातें
गैरों की हुकूमत ,
और अपनों की गुलामी
सब कुछ बेमानी है
कुछ उसूल ,कुछ सच्ची बातें
सब कुछ बेमानी है
मेरी यादें अब कुछ
धुंधली सी हो गयी हैं
नजर कुछ पथरा  सी गयी हैं
ज़माने की हवा ही कुछ ऐसी निकली
के आदमी बुत सा खड़ा
शैतान की हरकतों को
 बरबस  निहारता सा

एक समाज के निर्माण बनिस्पत

हमारी जमीन , हमारे जमीर की पहचान है। अब हम सच की जमीन पर खड़े होकर कभी झूठ बोलते हैं तो कभी झूठ की जमीन पर खड़े होकर सच बोलते हैं। मुद्दा दरसल ये है कि सूर्य की रोशनी या हवा पर किसी का एकाधिकार नहीं है। उसी तरह भूमि पर भी अधिकार की बातें कुछ समझ पाना कठिन हैं। गांधीजी ने लिखा है कि  सम्पति के व्यकितगत स्वामित्व का कोई अधिकार स्वीकार नहीं जा सकता। और साफ -साफ लिखा था , देश में उपस्थित सट्टेबाज , भूस्वामी , कारखानेदार आदि हमारे देश की सफलता के सबसे बड़े बाधक हैं। वे सब शायद नहीं समझते है कि वे जनता के खून को चूसकर ही जी रहे हैं।इस तरह प्रकृति मानव की कृति नहीं हैं , उसकी सम्पदा भी मानव कृत नहीं है।
ईश्वर ही सबका मालिक है , संसार का सृजन किसी एक मानव के लिए नहीं किया है ,अपितु समस्त प्राणियों के लिए किया है। वक़्त ने इस समाज का मानवीकरण देखा है। और जैसे कि हवा,पानी और आकाश या सूर्य के प्रकाश का उपयोग सभी जीव रूप से करते हैं। इसी तरह पृथ्वी के उपभोग का भी सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।
परन्तु  एक समाज के निर्माण बनिस्पत  हम लोग छोटे -छोटे घरों के निर्माण में व्यस्त हैं। चीन कहता है तिब्बत उसका है ,सागर उसका है। पाकिस्तान के मुताबिक कश्मीर उसका है। और ISIS के अनुसार शायद भारत सहित कई  इस्लमिक मुल्क उसके नक़्शे में हैं। तो मानव समाज का क्या ??
क्या हम अभी भी सभ्यता की क , ख  सीख  रहे है? ये मंगलयान की बातें या अर्थवव्यस्था का भूमंडलीकरण सब कोरी बकवास है। क्योंकि एक बात तो स्पष्ट है कि समाज का एक हिस्सा आगे बड़ जाये और बहुत बड़ा भाग पीछे छूट जाए ऐसा सम्भव नहीं।