MONDAY, APRIL 14, 2014
बहुत चले
बहुत चले फिर बहुत देर तक रुके
फिर चले कभी-कभी
ऐसा लगताहै
थकान होने को है।
पर मन अभी भरा नहीं है
दिल तो करता है चलूँ
चल कर यूहीं गुज़ार दूँ पूरी उम्र को
तमन्ना कोई बाकि नहीं
सिवाय इसके
कि बहुत चलूँ पर थकान कभी न हो मुझे
रब की तलाश है मुझे
ये कहने से मुझे लगता है डर
कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं
ये कहने से मुझे लगता है डर।
अलबत्ता हर शख्स मुझे डराता है
इस सहमी हुई दुनिया में।
चल-चल कर मैं उतारूंगा अपने अन्दर के
बोझ को
करूँगा अपने जिस्म को हल्का और
फिर मैं शायद पा लूँगा अपने रब को।
शायद मुझे फिर होगा इस दुनिया के हर
शख्स से प्यार।
तम्मनाए फिर शायद जाग कर पूछेंगी सवाल
कहाँ चले।
फिर चले कभी-कभी
ऐसा लगताहै
थकान होने को है।
पर मन अभी भरा नहीं है
दिल तो करता है चलूँ
चल कर यूहीं गुज़ार दूँ पूरी उम्र को
तमन्ना कोई बाकि नहीं
सिवाय इसके
कि बहुत चलूँ पर थकान कभी न हो मुझे
रब की तलाश है मुझे
ये कहने से मुझे लगता है डर
कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं
ये कहने से मुझे लगता है डर।
अलबत्ता हर शख्स मुझे डराता है
इस सहमी हुई दुनिया में।
चल-चल कर मैं उतारूंगा अपने अन्दर के
बोझ को
करूँगा अपने जिस्म को हल्का और
फिर मैं शायद पा लूँगा अपने रब को।
शायद मुझे फिर होगा इस दुनिया के हर
शख्स से प्यार।
तम्मनाए फिर शायद जाग कर पूछेंगी सवाल
कहाँ चले।