Tuesday, July 30, 2013

मेरे विकास की यात्रा पूरी है

मोबाइल है , इन्टरनेट है .
टीवी के अन्ग्नीत चैनल है ,
मकान है कार है
बच्चे पब्लिक स्कूल में हैं
ब्रांडेड कपडे हैं
पूरी अलमारी भरी हैं एक घर में
एक घर में चार कमरे , चार टॉयलेट  है
ऐसा लगता है
सुविधाओं का बाज़ार बिछा है
एयर-कंडीशनर हर कमरे में लगा है ?
अगर नहीं
तो विकास अधूरा है
बच्चे TUTION क्लास में जाते है ?
अगर नहीं
तो विकास अधूरा है
हर आदमी का अलग बेडरूम है ?
अगर नहीं
तो प्राइवेसी अधूरी है
मन छटपटाता तो नहीं है ?
अगर है
तो कामनाऐ अधूरी है
मुझे कुछ  साफ़-साफ़
नहीं नज़र आता
इस विकास के जाल में खो
तो  नहीं गया ?
अगर खो गया
तो मेरे विकास की यात्रा पूरी है

Sunday, July 28, 2013

कतरा -कतरा दर्द का

कतरा -कतरा  दर्द का
लम्हा -लम्हा दर्द का
हर साँस में भर कर
जिया तो जाना
अहसास जुदा है
वक़्त ने मुझे दिया है
मेरे करम के मैंने उसे
बड़ी शिदत से जिया है
कोई ये न कहे ये कि   मैंने
हँसी से दर्द भरा निवाला
लिया है
आँसू है के
थमते नहीं
दर्द के सिलसिले  है  के
थमते नहीं
बस एक वक़्त है कि थम गया
कतरा -कतरा दर्द का , लम्हा -लम्हा दर्द का
जिया तो जाना
गुज़ारिश है कि उपरवाले           तेरी जमीन पर
सर रख के                                तू  क्यों न
मेरे दुश्मनों को                     ये दर्द के सिलसिले  दे
कतरा-कतरा दर्द का           लम्हा -लम्हा दर्द का 

Thursday, July 25, 2013

जीवन की किलकारिया या

जीवन की किलकारिया  या
मौत की घड़ी
सब कुछ मैं खड़ा -खड़ा देखता हूँ
घड़ी वो गुजर गयी कब मुझे याद नहीं
हर घड़ी पल - पल तडपता हुआ देखता हूँ
मेरे खुश हो जाने पे तू जलता हैं
तो मौत की घड़ी पर तू मुस्कराता है
ये सब मैं खड़ा - खड़ा देखता हूँ
अजब बेबसी हैं मेरी    कि
ये सब मैं खड़ा -खड़ा देखता हूँ
      जीवन की किलकारिया     या
मौत की

Saturday, July 6, 2013

यहाँ की ज़मीन !

जहाँ बैठौ वहाँ की जमीन चुभती हैं
कहीं गर्म हैं तो कहीं सर्द हैं
कहीं काँटे हैं तो कहीं पथरीली
नरम घास का अहसास शायद ग़ुम हैं
सर्द हैं या गर्म हैं हवाएँ
मौसम के खुशगवार होने का
मुझे हैं बेसब्री से इंतज़ार
इक पल को मैं क्या मानू
साल या महीना,
कुछ फर्क नहीं पड़ता
लगता हैं शायद अब बीता ये पल
देख कर कोहराम चारों तरफ का
मुझे लगता हैं इस पल को बीतने में
सदिया गुजर गई
मेरे सब्र की छोड़ो
अब   कुदरत  भी बेसब्र हो चली
जिस दुनिया को हमने संवारा सदियों में
उसे वो पल भर में तोड़ने चली
बेखबर सा फिर भी हूँ मैं
फिर भी ये सोचकर शर्मिंदा नहीं
खुश हूँ फिर भी कि
मेरे घर कभी ना आएगी ,मुझे तोडने .
सफ़ेद चादर सच की ओढ़ी हैं मैने
यकीन हैं मुझे कि
कफ़न में तब्दील न होगी ये
या
फिर इसके होते कफ़न की जरूरत नहीं मुझे