Friday, April 6, 2012

मंजिल

सोचा था मंजिल पास हैं
जल्दी ही पहुँच जायेंगे हम
पहुंचे तो सही मगर
किस कीमत पर पैरों के तले कांटे दबाकर
गले में फूलो के हार पहन कर
पैरों से कांटे दबाए दबतें नहीं
मगर
फूलों की खुशुबू से हँसी रुकती नहीं
(मगर यह क्या )
आपने पैर देख लिए
पैरों के नीचे के कांटे देख लिए
लोगो ने हमारा दर्द जाना तो सही
मगर देर से
तब तक फूल मुरझा चुके थे
इस बार उन्हें मुरझाए हुए फूल न नजर आये ।
आये तो बस अंगड़ाई लेते हुए
कांटे नजर आये
उन्होंने फूलो को रोंद दिया
पर
फूलो के साथ हम भी तो थे
हाय
इन फूलो की रुदन से अच्छी
तो कांटो की चुभन थी
सपनो की लहरों में डूबे थे
जितना हमने समझा
मंजिल पास हैं
मंजिल उतनी ही दूर होती चली गयी

UDDAAN

उड़ान