Sunday, December 4, 2016

Modi Vs. India

We don't learn from history as this is evident from demonetization scheme
launched by Modi govt/ Modi. Most of the times we know that if we don't
know how to swim then we don't jump into deep water or else if we are
curious to test water we always take help of life jacket.Or in general if
you jump from high altitude result everyone knows.But if you consider

 all decisions taken by Modi Group All these types of decisions either
formation of govt. in J& K , Creating hurdles in the working of Delhi govt.,
Handling border situation with Pakistan,or Madhesi issue of Nepal or
foreign /international relations on individual basis .On each step
Indian Govt. has failed ,but  Modi has succeeded .Whenever
 personal ambitions of any King( in a democratic country India
Modi's behavior is like a King  ) goes beyond a limit that particular
Country has
 has to face challenges  which can in-turn change the future of the country .
THough   I'm dead sure in this digital age our country men are intelligent
enough to throw these types of King or King changes his stand very fast.
See, major portion of population of India dependent on Agriculture & this is high
time to sow  the crop & any one can think farmers need manure /seeds etc & farmers don't
have money to buy seeds etc infect they are standing in ques /lines in front of the bank
to exchange their rupees .I think either we are much stupid that we are not understanding
Modi's point of view .IF major chunk of the population is dependent on monsoon & agriculture
why this step has been taken in haste.what was pressure
Major chunk of the population is Hindu where it is the best Season & crores of people are
dependent on this marriage business then why? why? demonetization at this time
why  livelihood of  an average Indian thrown into danger ?? 
&
for Kashmir I can say only this that 2 years back Kashmir used to be peaceful loving place
                                                                                                   Contd.------

Thursday, November 3, 2016

माँ ,कभी नहीं भूला तुझे

 माँ ,कभी नहीं भूला तुझे
इसीलिए
माँ ! तेरी याद बहुत आती है
 कभी -कभी
अकेले में जब बैचेन होता हूँ तो
तू आकर मेरा माथा चूमती है और
 बाल सहलाती है। 
जख्म दिये है
घाव  भी दिये  है इस दुनिया ने
पर एक तू है जो
 इन सब पर मरहम लगाती है और
 मेरी पीठ थपथपाती है। 
माँ तेरी याद बहुत आती है
कभी -कभी
जब हताश सा परेशान सा
बिस्तर पर सोने की कोशिश
में
पलको को बंद कर लेता हूँ तो
सपनो में आकर मुझे समझाती है
और मुझे लोरी गाकर सुलाती है। 
ओ माँ!  तू कहाँ चली गयी है
 मुरझा
 मेरे मन की कली गयी है
बहुत अकेले में , मैं रोता

अपने सपने में खोता
बच्चों से तेरी यादों को संजोता
बालों को उनके सहलाता ,
पीठ उनकी थपथपाता
कभी माँ तेरी याद में हँसता कभी रोता।


Monday, August 1, 2016

आत्महत्या या आत्मज्ञान ?

आत्महत्या या आत्मज्ञान ?बहुत लोगों को देखा था
सुना था , पड़ा था सब कुछ गलत लगता था
कोई कैसे मरा ,ये कोई मतलब नहीं
मर गया बस इतना भी पता होना बहुत था
कोई हार्ट अटैक से मरा
याकोई दिमाग की नस फटने से
इससे मुझे पता चला
कि वो घुट -घुट के मरा
यानि उसे पता नहीं था
 और वो आत्महत्या कर रहा था
पर वो जो गले में फंदा डाल कर या 
जहर खा  कर मर गया था 
उसे आत्म ज्ञान था !

Tuesday, July 26, 2016

माँ ,कभी नहीं भूला तुझे

 माँ ,कभी नहीं भूला तुझे
इसीलिए
माँ ! तेरी याद बहुत आती है
 कभी -कभी
अकेले में जब बैचेन होता हूँ तो
तू आकर मेरा माथा चूमती है और
 बाल सहलाती है। 
जख्म दिये है
घाव  भी दिये  है इस दुनिया ने
पर एक तू है जो
 इन सब पर मरहम लगाती है और
 मेरी पीठ थपथपाती है। 
माँ तेरी याद बहुत आती है
कभी -कभी
जब हताश सा परेशान सा
बिस्तर पर सोने की कोशिश
में
पलको को बंद कर लेता हूँ तो
सपनो में आकर मुझे समझाती है
और मुझे लोरी गाकर सुलाती है। 
ओ माँ!  तू कहाँ चली गयी है
 मुरझा
 मेरे मन की कली गयी है
बहुत अकेले में , मैं रोता

अपने सपने में खोता
बच्चों से तेरी यादों को संजोता
बालों को उनके सहलाता ,
पीठ उनकी थपथपाता
कभी माँ तेरी याद में हँसता कभी रोता।


Tuesday, July 5, 2016

हे ! मेघ मल्हार


हे ! मेघ मल्हार

तूने यह कौन से गीत गाए?


माँगी थी पानी की चँद बूँदे ,


तन को शीतल करने के लिए,


सोचा था तू आएगा खुशियाँ लाएगा ,हरियाली छाएगी।


तन मन की ऊष्मता भगाएगा


पर हे !
मेघ मल्हार तूने यह कौन से गीत गाए ?


सोचा था , पढ़ा था ,


शुक -शुकी के गीतों के बारे में ,


राधा -कृष्ण की लीला के बारे में ,

सुना भी था -कोयल की कूकू के बारे में ,
सुना भी था ,पढ़ा भी था ,और भी बहुत कुछ अच्छा-अच्छा


पर हे ! मेघ मल्हार तूने यह कैसे गीत सुनाये


मैं सह भी जाता , मैं रह भी जाता ,


अगर इसमें होती किसी राधा की व्याकुलता ,


अपनें कृष्ण से मिलने की ,


पर अब मैं अपने मन की वेदना को ,


कैसे छुपाऊँ , हे !मेघ मल्हार तेरे


गीतों की त्रासदी मैं किस निर्ममता


से किस -किस को बताऊँ ,


हे !मेघ मल्हार तू ही मेरा दर्द जान ले ,


मुझमें छिपे एक इंसान को तू पहचान ले ,

हे! मेघ मल्हार ,

हे!मेघ मल्हार ,

हे! मेघ मल्हार । ।

Sunday, May 8, 2016

माँ ! तेरी याद बहुत आती है कभी -कभी

माँ ! तेरी याद बहुत आती है
 कभी -कभी
अकेले में जब बैचेन होता हूँ तो
तू आकर मेरा माथा चूमती है और
 बाल सहलाती है। 
जख्म दिये है
घाव  भी दिये  है इस दुनिया ने
पर एक तू है जो
 इन सब पर मरहम लगाती है और
 मेरी पीठ थपथपाती है। 
माँ तेरी याद बहुत आती है
कभी -कभी
जब हताश सा परेशान सा
बिस्तर पर सोने की कोशिश
में
पलको को बंद कर लेता हूँ तो
सपनो में आकर मुझे समझाती है
और मुझे लोरी गाकर सुलाती है। 
ओ माँ!  तू कहाँ चली गयी है
 मुरझा
 मेरे मन की कली गयी है
बहुत अकेले में , मैं रोता
अपने सपने में खोता
बच्चों से तेरी यादों को संजोता
बालों को उनके सहलाता ,
पीठ उनकी थपथपाता
कभी माँ तेरी याद में हँसता कभी रोता।






Monday, February 15, 2016

रवींद्रनाथ टैगोर और वसंत --2

उस आदिकाल की सूनी दुपहरी में,जब वसंती हवा हमारे पेड़-पौधों में किसी को रत्ती भर खबर दिए बिना अचानक आ पड़ती,तब हम क्या लेख लिखते थे?या देश का उपकार करने निकलते थे तब हम सारे दिन खड़े-खड़े गूंगों की तरह,बौड़मो की तरह कांपते रहते थे,हमारा शरीर झर-झर ,मर-मर कर पागलों की तरह गाता रहता था,हमारी जड़ से लेकर शाखाओं की टहनियां तक रस के प्रवाह से भीतर ही भीतर चंचल हो उठती थी। उस आदिकाल का फागुन-चैत इसी तरह रस भरे आलस्य और अर्थहीन प्रलाप में कट जाता था। उसके लिए किसी के सामने कोई जवाबदेही नहीं करनी पड़ती थी। ...
अभिव्यकित के अंतिम कोष्ठ में आकर मनुष्य के अनेक भाग हो गए। जड़ भाग ,वनस्पति भाग,पशु भाग ,बर्बर भाग ,सभ्य भाग , देव भाग , इत्यादि। इन अलग-अलग भागों की एक-एक विशेष जन्म ऋतु है। किस ऋतु में कौन सा भाग पड़ता है ,इसके निर्णय का भार  मैं न लूंगा।
मुनष्य समाज से मेरा सविनय निवेदन है कि यह सिथति ठीक नहीं। इसमें मुनष्य का कोई गौरव नहीं कि वह दुनिया  से अलग रहे। मुनष्य इसलिए बड़ा है कि उसमे संसार की सब विविधता , सब वैचित्र्य हैं। मुनष्य जड़ के साथ जड़ ,तरु-लता से तरु-लता ,पशु-पक्षी के साथ पशु-पक्षी बन जाता है। प्रकृति के राजमहल के तमाम दरवाजे उसके लिए खुले हैं ,लेकिन खुले रहने से क्या होगा ?एक-एक ऋतु में जब एक -एक महल से उत्सव का निमंत्रण आता है ,तब मुनष्य उसको स्वीकार न करके अपनी आढ़त की गद्दी पर ही पड़ा रहे ,ऐसा बड़ा अधिकार उसे क्यों मिला ?पूरा मुनष्य बनने के लिए उसे सभी कुछ होना पड़ेगा।
हाय रे समाज-स्तंभ के पक्षी ! आकाश का नीला रंग आज विरहिणी की आंखों जैसा सपनों में डूबा हुआ है ,पत्ते का हरा रंग आज तरुणी के कपोल जैसा ताजा -ताजा है ,वसंत की हवा आज मिलन के आग्रह जैसी चंचल है ,तब भी तेरे डैने आज बंद हैं ,तब भी तेरे पैरों में कर्म की जंजीर है -यही क्या मानव जन्म है !
                                                                                                    (बंग-दर्शन से )



Sunday, February 14, 2016

रवींद्रनाथ टैगोर और वसंत --1


वसंत के दिन विरहिणी का मन हाहाकार करता है ,यह बात हमने प्राचीन काव्यों में पढ़ी है। प्रकृति के साथ अपने मन का संपर्क हमने ऐसा तोड़ लिया है। मुनष्य क्या बस इस अजस्रता के स्त्रोत को रुंधता रहेगा ?अपने को खिलाएगा नहीं ,फलाएगा नहीं ,दान करना न चाहेगा ?क्या हम ऐसे निरे मुनष्य हैं ?क्या हम वसंत के रहस्यमय रस-संचार विकलित तरु-लता-पल्लव कोई नहीं ? वे जो हमारे घर के आंगन को छाया से ढककर,गंध से भरकर,बांहों से घेरकर खड़े हों ,वे क्या हमारे इतने बेगाने हैं कि जब वे फूल बनकर खिल उठेंगे,तब हम अचकन पहनकर दफ्तर जाएंगे ?
मैं आज पेड़-पौधों के साथ अपनी पुरानी आत्मीयता स्वीकार करूंगा। आज मैं किसी तरह न मानूंगा कि व्यस्त होकर काम करते घूमना ही जीवन की अद्वितीय सार्थकता है। आज हमारी युग-युगांतर की बड़ी दीदी वनलक्ष्मी के घर भैया दूज का निमंत्रण है। वहां पर आज तरु-लता से बिल्कुल घर के आदमी की तरह मिलना होगा। आज छाया में लेटकर सारा दिन कटेगा,मिट्टी को दोनों हाथों से बिखेरूंगा,समेटूंगा,वसंती हवा जब बहेगी,तब उसके आनंद को मैं ह्रदय की पसलियों में बहने दूंगा,ताकि वहां पर ऐसी कोई आवाज न हो,जिसकी भाषा पेड़-पौधे नहीं समझते हों। इसी तरह चैत्र के अंत तक मिट्टी ,हवा और आकाश के बीच जीवन को नरम करके,हरा करके बिखेर दूंगा,प्रकाश में ,छाया में चुपचाप पड़ा रहूंगा। लेकिन हाय,कोई काम बंद नहीं होता,हिसाब की काँपी खुली रहती है। मैं नियम की मशीन में,कर्म के फंदे में पड़ गया हूं। अब वसंत के आने से क्या,जाने से ही क्या ?            
  अभिव्यकित के इतिहास में मनुष्य का एक अंश तो पेड़-पौधों के साथ जुड़ा हुआ है। हम लोग किसी समय शाखामृग थे,इसका परिचय हमारे स्वभाव में मिलता है। लेकिन उसके भी बहुत समय पहले किसी आदि-युग में हम निश्चय ही वृक्ष थे,यह क्या हम भूल सकते हैं ?    ----------                                                                                                           
                           
                                                                                                         (    बंग-दर्शन से )

Saturday, January 30, 2016

महात्मा गांधी के लिए -एक श्रद्धांजलि "सत्यमेव जयते "।

सत्य की जीत का हम कैसे वर्णन कर सकते हैं?

सच और केवल एकदम सच
सच और सुन्दरता
सच और निडरता

सच और प्यार
सच और अहिंसा
सच और सहनशीलता

सच और चरित्र
सच और किसी वस्तु की इच्छा न होना
और सच ही इश्वर है

सच के लिए मरना
सच और जीवन
सच और तपस्या

सच की कीमत
सच को महसूस करना

तो यह थे सच्चाई के इतने विभिन्न रूप
परन्तु
लोग कहते हैं की :-
"मृत्यु ही सच है,यह जीवन झूठ है "
परन्तु मेरे विचार से जीवन ही सत्य है और शुरू से अंत तक हम अपनी-अपनी सच्चाईयों की लड़ाई लड़ते रहते हैं और अंत मे सच ही रहता है ,सच ही जीता है और अंततः सच जीतता है
इसीलिए कहा गया है:-
"सत्यमेव जयते "।   

Tuesday, January 26, 2016

लिखना समय के बारे में कुछ ऐसा !



समय तेजी से बीत रहा है या फिर कुछ ऐसे कि जब हम एक ट्रेन में बैठे हुए है और वो बहुत तेजी से एक तरफ चल रही है उसकी खिड़की में से बाहर देखने पर कुछ ऐसा लगता है कि सब पेड़ या फिर बाहर जो सड़क है वो तेजी से उलटी दिशा में भाग रही है कुछ ऐसा ही मैं  समय के बारे में महसूस करता हूँ। समय तो वही खड़ा है हम भागते जा रहे है। यानि कि बचपन , यौवन ,बुढ़ापा। पर यहाँ कुछ और है मेरा मकसद।
 अल्बर्ट आइंस्टाइन के सिद्वांतों के मुताबिक हमारी दुनिया का चौथा आयाम समय है।  और उन्होंने ये भी बताया कि समय स्थिर और अपरिवर्तनीय नहीं है। जैसे -जैसे किसी कण या पिंड की गति बढ़ती जाएगी ,उसके लिए समय धीमा पड़ता जाएगा। अगर कोई वस्तु प्रकाश की गति तक पंहुच जाएगी तो उसके लिए समय रुक जाएगा। प्रकाश की गति से जयादा अगर किसी वस्तु की हो जाएगी ,तो समय उसके लिए उल्टा यानी वर्तमान से अतीत की और चलने लगेगा। ये सब मैं इसलिए लिख रहा हूँ कयोंकि मैंने क्वांटम फिजिक्स के रिसर्च पेपर्स में फिजिकल रिव्यू लेटर्स जोकि मैंने कहीं पढ़े जिसमे लिखा था कि जब ब्रह्मांड की रचना हुई,तो न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण  के सिद्धांत के आधार पर गुरुत्वाकर्षण  ने किसी एक छण पर सारे कणों के बीच फर्क को न्यूनतम पर ला  दिया ,उसके बाद कण दो अलग -अलग दिशा में मुड  गए। इस तरह दो एक जैसे ,लेकिन विपरीत ब्रह्माण्ड बने ,जिनमे समय भी दो विपरीत दिशाओं में चलता है। इसका मतलब कोई हमारा जुड़वां ब्रह्माण्ड है।
क्वांटम फिजिक्स के मुताबिक सृष्टि के आरंभ के समय हर कण का एक प्रतिकण बना। यह प्रतिकण या एंटी पार्टिकल कुछ ऐसा जैसे कि आइने में उसके उलटे प्रतिबिंब जैसा था,ज्यादातर एंटी मैटर  सृष्टि के आरंभ में ही नष्ट हो गया ,लेकिन अब भी कुछ एंटी मैटर  ब्रह्मण्ड में मौजूद है।
सामन्य स्थिति में सोचें ,तो हम जो दुनिया देख रहे हैं ,वह दरअसल अतीत की है। आकाश में जो तमाम तारे जो हम देखते है ,उनसे आने वाली रोशनी सैकड़ों -हजारों साल में हम तक पहुंचती है ,इसलिए कोई तारा हजार ,कोई पांच हजार साल पुराना देखते है। कई तारे हमें ऐसे दिखते हैं ,जो हज़ारों साल पहले खत्म हो गए हैं। इसी तरह पृथ्वी से पांच हजार प्रकाश वर्ष दूर किसी सभ्यता के लोग पृथ्वी को देख पाएं ,तो उन्हें हड़प्पा ,मोहनजोदड़ो की सभ्यताओं में रहने वाले लोग दिखेंगे। और कुछ भी असंभव नहीं आज के संदर्भ में।

Thursday, January 21, 2016

शैतान की हरकतों को

वक़्त की नज़ाकत को समझकर
मैं भूल गया सब बातें
गैरों की हुकूमत ,
और अपनों की गुलामी
सब कुछ बेमानी है
कुछ उसूल ,कुछ सच्ची बातें
सब कुछ बेमानी है
मेरी यादें अब कुछ
धुंधली सी हो गयी हैं
नजर कुछ पथरा  सी गयी हैं
ज़माने की हवा ही कुछ ऐसी निकली
के आदमी बुत सा खड़ा
शैतान की हरकतों को
 बरबस  निहारता सा

एक समाज के निर्माण बनिस्पत

हमारी जमीन , हमारे जमीर की पहचान है। अब हम सच की जमीन पर खड़े होकर कभी झूठ बोलते हैं तो कभी झूठ की जमीन पर खड़े होकर सच बोलते हैं। मुद्दा दरसल ये है कि सूर्य की रोशनी या हवा पर किसी का एकाधिकार नहीं है। उसी तरह भूमि पर भी अधिकार की बातें कुछ समझ पाना कठिन हैं। गांधीजी ने लिखा है कि  सम्पति के व्यकितगत स्वामित्व का कोई अधिकार स्वीकार नहीं जा सकता। और साफ -साफ लिखा था , देश में उपस्थित सट्टेबाज , भूस्वामी , कारखानेदार आदि हमारे देश की सफलता के सबसे बड़े बाधक हैं। वे सब शायद नहीं समझते है कि वे जनता के खून को चूसकर ही जी रहे हैं।इस तरह प्रकृति मानव की कृति नहीं हैं , उसकी सम्पदा भी मानव कृत नहीं है।
ईश्वर ही सबका मालिक है , संसार का सृजन किसी एक मानव के लिए नहीं किया है ,अपितु समस्त प्राणियों के लिए किया है। वक़्त ने इस समाज का मानवीकरण देखा है। और जैसे कि हवा,पानी और आकाश या सूर्य के प्रकाश का उपयोग सभी जीव रूप से करते हैं। इसी तरह पृथ्वी के उपभोग का भी सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।
परन्तु  एक समाज के निर्माण बनिस्पत  हम लोग छोटे -छोटे घरों के निर्माण में व्यस्त हैं। चीन कहता है तिब्बत उसका है ,सागर उसका है। पाकिस्तान के मुताबिक कश्मीर उसका है। और ISIS के अनुसार शायद भारत सहित कई  इस्लमिक मुल्क उसके नक़्शे में हैं। तो मानव समाज का क्या ??
क्या हम अभी भी सभ्यता की क , ख  सीख  रहे है? ये मंगलयान की बातें या अर्थवव्यस्था का भूमंडलीकरण सब कोरी बकवास है। क्योंकि एक बात तो स्पष्ट है कि समाज का एक हिस्सा आगे बड़ जाये और बहुत बड़ा भाग पीछे छूट जाए ऐसा सम्भव नहीं।