Wednesday, April 29, 2015

निरा आदमी ?

निरा आदमी  या
 निरा मूर्ख
कौन हूँ  मैं
 जो लड़ पड़ता हूँ
 हर छोटी -छोटी सच्चाई के लिए
मैं ही क्यों गले में
 फन्दा डाल कर लटकूँ
मुझे ही क्यूँ
 हमदर्दी से देखे ये सब !
वो सब !
मेरे सब्र का पैमाना
 क्यूँ नही झलकता
आग सी सीने में ,
दिल में भी आग सी
वक़्त ने भी मरहम लगाने
से मना कर दिया
जीने की अदा या खुदा तू मुझे भी कुछ बता !




Tuesday, April 7, 2015

बरबस निहारता सा !

वक़्त की नज़ाकत को समझकर
मैं भूल गया सब बातें
गैरों की हुकूमत ,
और अपनों की गुलामी
सब कुछ बेमानी है
कुछ उसूल ,कुछ सच्ची बातें
सब कुछ बेमानी है
मेरी यादें अब कुछ
धुंधली सी हो गयी हैं
नजर कुछ पथरा  सी गयी हैं
ज़माने की हवा ही कुछ ऐसी निकली
के आदमी बुत सा खड़ा
शैतान की हरकतों को बरबस  निहारता सा

अकेलापन

उदास दर्पण में थी कुछ जिंदगी ठहरी हुई
झांककर देखा तो कुछ उम्मीद
 और
नाउम्मीदगी के पलों की छाया
डर गया था में हैरान सा होकर
दबे पाँव पीछे हटा
मेरा साया भी मेरे साथ खड़ा था कुछ परेशान
 जो अब तक
नहीं नजर आ रहा था वो अब