निरा आदमी या
निरा मूर्ख
कौन हूँ मैं
जो लड़ पड़ता हूँ
हर छोटी -छोटी सच्चाई के लिए
मैं ही क्यों गले में
फन्दा डाल कर लटकूँ
मुझे ही क्यूँ
हमदर्दी से देखे ये सब !
वो सब !
मेरे सब्र का पैमाना
क्यूँ नही झलकता
आग सी सीने में ,
दिल में भी आग सी
वक़्त ने भी मरहम लगाने
से मना कर दिया
जीने की अदा या खुदा तू मुझे भी कुछ बता !
निरा मूर्ख
कौन हूँ मैं
जो लड़ पड़ता हूँ
हर छोटी -छोटी सच्चाई के लिए
मैं ही क्यों गले में
फन्दा डाल कर लटकूँ
मुझे ही क्यूँ
हमदर्दी से देखे ये सब !
वो सब !
मेरे सब्र का पैमाना
क्यूँ नही झलकता
आग सी सीने में ,
दिल में भी आग सी
वक़्त ने भी मरहम लगाने
से मना कर दिया
जीने की अदा या खुदा तू मुझे भी कुछ बता !
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