Tuesday, April 7, 2015

बरबस निहारता सा !

वक़्त की नज़ाकत को समझकर
मैं भूल गया सब बातें
गैरों की हुकूमत ,
और अपनों की गुलामी
सब कुछ बेमानी है
कुछ उसूल ,कुछ सच्ची बातें
सब कुछ बेमानी है
मेरी यादें अब कुछ
धुंधली सी हो गयी हैं
नजर कुछ पथरा  सी गयी हैं
ज़माने की हवा ही कुछ ऐसी निकली
के आदमी बुत सा खड़ा
शैतान की हरकतों को बरबस  निहारता सा

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