विश्व स्तर पर भारत की दो बड़ी राजनीतिक चाहते हैं। सुपर पावर और विश्व गुरु बनना।वैसे इस वक्त विश्व गुरु कौन है,कौन संस्था यह सर्टिफिकेट देती है,यह सब ज्ञात नहीं है।विश्व गुरु बनने के बाद की भूमिका का कोई ब्लू प्रिंट या योजना हमारे सामने नहीं है।हम सुपर पावर बनने के लिए अमरीका का हथियार ख़रीद रहे हैं,हथियार बेचकर सुपर पावर बना जाता है या ख़रीदकर,कुछ साफ नहीं है। सुपर पावर बनकर हम भी इराक और सीरिया में जाकर युद्ध करेंगे या युद्ध के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायेंगे। ज़रा गूगल कीजिए,मौजूदा विश्व में चल रहे युद्ध का भारत ने कब कब विरोध किया है। कब नाम लेकर किसी की आलोचना की है।
भारत गांधी और बुद्ध की धरती होने का गौरव भी रखना चाहता है,शांति और अहिंसा का पुजारी भी कहलाना चाहता है लेकिन सुपर पावर भी बन कर रहेगा।विचित्र किस्म की टूटी फूटी राजनीतिक समझ वाले इस मुल्क में ग्लोबल लीडर बनने का ख़्वाब समझ नहीं आता है।क्या विश्व गुरु बनने का इतना ही मतलब है कि हम केवल योग का वीडियो सीडी बनाकर बेचेंगे? आप्रवासियों और शरणार्थियों को लेकर पूरी दुनिया में बहस हो रही है। क्या भारत के पक्ष-विपक्ष के नेता,कंपनी प्रमुख कुछ बोल रहे हैं? कोई ग्लोबल आवाज़ भारत से उठ रही है?
वसुधैव कुटुंबकम का नारा देते देते हम कई मुल्कों के कुटुंब बन गए।क्या आपने सुना है कि भारत का कोई राष्ट्र प्रमुख या विदेश मंत्री शरणार्थियों का स्वागत कर रहा हो?दुनिया भर में आप्रवासियों के ख़िलाफ हो रही राजनीति का विरोध कर रहा हो? आज पूरी दुनिया में दूसरे मुल्कों के लोग काम करने जाते हैं।इसका लाभ भारत को भी मिला है। केरल, पंजाब,गुजरात तो आप्रवासी भारतीयों के उत्पादक राज्य हैं।उन राज्यों इसे लेकर किस तरह की बहस हो रही है। इन राज्यों के लाखों लोगों को उन्मुक्त प्रवासी माहौल से लाभ मिला है।भारत की मीडिया में इसी की वाहवाही है कि ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से बात कर ली।
कनाडा के प्रधानमंत्री ट्वीट कर युद्ध और हिंसा के सताये लोगों का स्वागत करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की ट्रंप की नीतियों पर क्या राय है,कहीं कोई सवाल नहीं है।कम से कम प्रधानमंत्री यही कह दें कि वे ट्रंप के साथ हैं। ग्लोबल लीडरशिप चुप रहकर नहीं मिलती है।
भारत में दुनिया के स्तर पर शांति और अहिंसा का दुकान चलाने वालों की कोई कमी नहीं है। हमारे मुल्क का कोई नेता यह नहीं कहता कि युद्ध और हिंसा से विस्थापितों के लिए भारत के दरवाज़े खुले हैं। सिर्फ भारत के पास है विस्थापितों के दुखों को दूर करने की आध्यात्मिक शक्ति है। जर्मनी, ब्रिटेन और अमरीका में कितनी बहस चल रही है। विरोधी हैं तो समर्थक भी हैं। इन तमाम देशों में भारतीय हैं मगर भारत में इन मसलों पर कोई बहस नहीं है। हम ग्लोबल नागरिक होना चाहते हैं मगर इसके नाम पर नौकरी लेने से अलावा हमारा कोई बड़ा सपना नहीं है। हमारे लिए वसुधैव कुटुंबकम सिर्फ एक दिखावटी नारा है। अगर हमारा इसमें यकीन है तो भारत अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के ख़िलाफ़ बोलता क्यों नहीं है। कम से कम बोलकर समर्थन ही कर दे कि ट्रंप की बात में दम है।
ईरान ने अमरीकी नागरिकों का वीज़ा ही रद्द कर दिया।ऐसा करते वक्त उसने चीन,रूस और पड़ोसी देशों के साथ सामरिक संबंधों का हिसाब किताब नहीं किया।बैन होने वाले बाकी के छह देश चुप हैं।ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मे ने कहा है कि अमरीका का मामला है,वो जानें,हमारा मामला है,हम जान रहे हैं।फ्रांस के राष्ट्रपति ने खुलकर कहा है कि यूरोप को जवाब देने की ज़रूरत है। जर्मनी के विदेश मंत्री ने कहा है कि यह समय शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का है।मुल्कों के बीच दूरियां बनाने का वक्त नहीं है।अपनी ज़िंदगी की पनाह के लिए शरण मांगने वालों की मदद करना एक ऐसा मानवीय मूल्य है जिसे अमरीका और यूरोप दोनों ही साझा करते हैं।क्या ये बातें भारत के नेताओं को नहीं करनी चाहिए?सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ही चुप नहीं हैं,बाकी तमाम नेताओ को भी लगता है बोलना नहीं आता है। क्या प्रवासी बन कर दुनिया भर के अवसरों का लाभ उठा रहे भारतीयों को नहीं बोलना चाहिए?
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने एक्ज़िक्यटिव आर्डर से इराक़, ईरान,सूडान,सोमालिया,सीरिया,यमन और लिबिया से आने वालों पर रोक लगा दी है। फेसबुक के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग ने कहा है कि जिनसे वाक़ई ख़तरा है उनसे चौकस रहने की ज़रूरत है मगर हमें अपने दरवाज़े शरणार्थियों के लिए खुले रखने चाहिए। बिजनेस स्टैंडर्ड ने ज़ुकरबर्ग और सुंदर पिचाई के बयान को पहले पन्ने पर विस्तार से छापा है। ख़बर पढ़कर लगा कि गूगल के कोई सौ कर्मचारी प्रभावित हुए हैं, जो उन सात देशों से आते हैं जहां से शरणार्थियों के आने पर अस्थायी रोक लगाई गई है। इसके बाद भी भारतीय मूल के सुंदर पिचाई ने प्रवासियों और शरणार्थियों के आगमन पर रोक की नीति की आलोचना की है। ट्वीटर ने कहा है कि ट्वीटर को सभी धर्मों के इमिग्रेंट यानी प्रवासियों ने बनाया है। हम उनके साथ है। अगर भारत में ही कोई कंपनी ऐसी बात कह दे तो उसके उत्पादों के न ख़रीदने का अभियान चल पड़ेगा।
ये भी अमरीका की खूबी है। भारत में गूगल प्रमुख सुंदर पिचाई होते तो शरणार्थियों को बाहर निकालने की राजनीति का समर्थन कर रहे होते। वर्ना लफंगों की टोली उनके उत्पाद का बहिष्कार करने का एलान करने लगती। हम दबी ज़ुबान में चर्चा कर रहे हैं कि ट्रंप के संरक्षणवाद के कारण भारत के आईटी उद्योग पर क्या असर पड़ेगा। ख़तरे की आहट है मगर कहीं कोई बयान नहीं है। कोई प्रदर्शन नहीं है।
भारत की किसी साफ्टवेयर कंपनी या उसके सीईओ की आवाज़ मुखर नहीं है। क्या यही है उस भारत का आत्मविश्वास जो विश्व गुरु और सुपर पारव बनने के ज्वाइंट एंट्रेंस एग्ज़ाम की कोचिंग कर रहा है? हर चुनाव में कोई न कोई एलान कर देता है कि भारत को विश्व गुरु बनाना है। हमारी तैयारी पूरी हो गई है। पता चलता है कि भारत अभी तक वेटिंग लिस्ट में ही अपना नाम खोज रहा है। अमरीका के तमाम एयरपोर्ट पर इस ठंड में प्रदर्शन करने निकले हैं। अपना अपना बैनर पोस्टर लेकर गए हैं।
क्या आपने दुनिया भर के देशों में जाकर अपने सपनों को साकार करने वाले युवाओं को फेसबुक पर ही तिब्बती शरणार्थियों के समर्थन में लिखते बोलते देखा है? मुझे शरणार्थी नीति की कोई जानकारी नहीं है,मगर जब भी तिब्बती शरणार्थी प्रदर्शन करते है, उनका कोई साथ नहीं देता। कई बार लगता है कि स्वेटर और मोमो बेचना ही उनका एकमात्र ज़रिया है। हमें जानना चाहिए कि यहां की नौकरियों में उनकी क्या जगह है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचार पर तमाम तरह की सांप्रदायिक राजनीति होती है मगर संवैधानिक पद पर बैठा नेता न तो कल बोलता था न आज बोलता है। ऐसे मुद्दे सभी के लिए दुर्भावना फैलाने के काम आते हैं।
हम पूरी दुनिया में शरणार्थियों और आप्रवासियों को लेकर हो रही बहस से दूर हैं। चुप हैं।
आतंकवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में अमरीका की क्या भूमिका रही है? उसकी या तमाम मुल्कों की नीतियों और चुप्पियों ने आतंकवाद को पैदा किया या वाकई हम इतने मासूम हैं कि यही मानते चलेंगे कि आतंकवाद मज़हब की किताब से पैदा होता है। इराक में अमरीका और ब्रिटेन का क्या भूमिका थी? यह जानना हो तो ब्रिटेन की चिल्कॉट कमेटी की रिपोर्ट पढ़िये। यह रिपोर्ट बताती है कि सद्दाम के पास कुछ नहीं था,मगर मीडिया के ज़रिये एक प्रोपेगैंडा तैयार किया गया और एक मुल्क को झूठ की बुनियाद पर तबाह कर दिया गया। चिल्कॉट रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार की रिपोर्ट थी जो कई साल की जांच के बाद तैयार किया था।ब्रिटेन के दो तीन सौ सैनिक इराक युद्ध में मारे गए थे। इसी को लेकर जांच हुई थी। जब यह रिपोर्ट पेश हो रही थी तो शहीद सैनिकों के परिजन तब के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को आतंकवादी कह रहे थे।ब्रिटेन के अखबारों ने हेडलाइन छापा था कि ब्लेयर आतंकवादी है।
रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी आरोप लगाया था कि कई देश आईसीस के साथ तेल का धंधा कर रहे हैं।ईरान के लोग पूछ रहे हैं कि 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले में शामिल 19 आतंकवादी लेबनॉन,ईजिप्ट, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से आए थे।इन देशों पर तो कोई बैन नहीं लगा है।क्या आपको यह बात विचित्र नहीं लगती,दुनिया के मसले पर बिना कुछ बोले ही भारत विश्व गुरु बन जाना चाहता है? क्या गुरु की यही भूमिका होनी चाहिए? क्या भारत ट्रंप की तरह इन सात देशों को आतंकवादी मानता है? अगर मानता है तो वो क्यों चुप है? क्यों नहीं कहता है कि हम इन मुल्कों के साथ कोई संबंध नहीं रखेंगे?