Thursday, February 23, 2017

पराकाष्ठा! समाज में



निरंतर चलते रहना, बिना रुके या थके,
यही संसार की प्रकृति या स्वभाव है.
यहाँ दुखसुख लाभहानि जयपराजय सब
साथसाथ गंधे से कंधा मिला चलते हैं.
अभी अलसुबह जहाँ किसी की अर्थी उठी,
वहीं शाम को पूरे जश्न के साथ शादी की शहनाई
भी बज सकती है, बिना किसी संवेदना के.
कई मर्तबा तो ऐसा भी घट जाता है कि
एक ही घर में किसी आप्त की मृत्यु घट जाने पर
उसके शव को कमरे में बंद कर
पहले पूर्वनियोजित मांगलिक कार्य निपटा लिया
जाता है, फिर मरणहार का दाहसंस्कार
श्मशान ले जाकर यंत्रवत् कर लिया जाता है.
संवेदना की कहीं छुअन महसूस नहीं होती.

यह किस तरह के संवेदनशून्य माहौल में
हम जीने के लिये अभिशप्त होते जा रहे हैं?
जहाँ मानवीय भावनाएँ निरंतर क्षरित होती
चली जा रही हैं.

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