Thursday, January 21, 2016

एक समाज के निर्माण बनिस्पत

हमारी जमीन , हमारे जमीर की पहचान है। अब हम सच की जमीन पर खड़े होकर कभी झूठ बोलते हैं तो कभी झूठ की जमीन पर खड़े होकर सच बोलते हैं। मुद्दा दरसल ये है कि सूर्य की रोशनी या हवा पर किसी का एकाधिकार नहीं है। उसी तरह भूमि पर भी अधिकार की बातें कुछ समझ पाना कठिन हैं। गांधीजी ने लिखा है कि  सम्पति के व्यकितगत स्वामित्व का कोई अधिकार स्वीकार नहीं जा सकता। और साफ -साफ लिखा था , देश में उपस्थित सट्टेबाज , भूस्वामी , कारखानेदार आदि हमारे देश की सफलता के सबसे बड़े बाधक हैं। वे सब शायद नहीं समझते है कि वे जनता के खून को चूसकर ही जी रहे हैं।इस तरह प्रकृति मानव की कृति नहीं हैं , उसकी सम्पदा भी मानव कृत नहीं है।
ईश्वर ही सबका मालिक है , संसार का सृजन किसी एक मानव के लिए नहीं किया है ,अपितु समस्त प्राणियों के लिए किया है। वक़्त ने इस समाज का मानवीकरण देखा है। और जैसे कि हवा,पानी और आकाश या सूर्य के प्रकाश का उपयोग सभी जीव रूप से करते हैं। इसी तरह पृथ्वी के उपभोग का भी सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।
परन्तु  एक समाज के निर्माण बनिस्पत  हम लोग छोटे -छोटे घरों के निर्माण में व्यस्त हैं। चीन कहता है तिब्बत उसका है ,सागर उसका है। पाकिस्तान के मुताबिक कश्मीर उसका है। और ISIS के अनुसार शायद भारत सहित कई  इस्लमिक मुल्क उसके नक़्शे में हैं। तो मानव समाज का क्या ??
क्या हम अभी भी सभ्यता की क , ख  सीख  रहे है? ये मंगलयान की बातें या अर्थवव्यस्था का भूमंडलीकरण सब कोरी बकवास है। क्योंकि एक बात तो स्पष्ट है कि समाज का एक हिस्सा आगे बड़ जाये और बहुत बड़ा भाग पीछे छूट जाए ऐसा सम्भव नहीं।

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