समय तेजी से बीत रहा है या फिर कुछ ऐसे कि जब हम एक ट्रेन में बैठे हुए है और वो बहुत तेजी से एक तरफ चल रही है उसकी खिड़की में से बाहर देखने पर कुछ ऐसा लगता है कि सब पेड़ या फिर बाहर जो सड़क है वो तेजी से उलटी दिशा में भाग रही है कुछ ऐसा ही मैं समय के बारे में महसूस करता हूँ। समय तो वही खड़ा है हम भागते जा रहे है। यानि कि बचपन , यौवन ,बुढ़ापा। पर यहाँ कुछ और है मेरा मकसद।
अल्बर्ट आइंस्टाइन के सिद्वांतों के मुताबिक हमारी दुनिया का चौथा आयाम समय है। और उन्होंने ये भी बताया कि समय स्थिर और अपरिवर्तनीय नहीं है। जैसे -जैसे किसी कण या पिंड की गति बढ़ती जाएगी ,उसके लिए समय धीमा पड़ता जाएगा। अगर कोई वस्तु प्रकाश की गति तक पंहुच जाएगी तो उसके लिए समय रुक जाएगा। प्रकाश की गति से जयादा अगर किसी वस्तु की हो जाएगी ,तो समय उसके लिए उल्टा यानी वर्तमान से अतीत की और चलने लगेगा। ये सब मैं इसलिए लिख रहा हूँ कयोंकि मैंने क्वांटम फिजिक्स के रिसर्च पेपर्स में फिजिकल रिव्यू लेटर्स जोकि मैंने कहीं पढ़े जिसमे लिखा था कि जब ब्रह्मांड की रचना हुई,तो न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के आधार पर गुरुत्वाकर्षण ने किसी एक छण पर सारे कणों के बीच फर्क को न्यूनतम पर ला दिया ,उसके बाद कण दो अलग -अलग दिशा में मुड गए। इस तरह दो एक जैसे ,लेकिन विपरीत ब्रह्माण्ड बने ,जिनमे समय भी दो विपरीत दिशाओं में चलता है। इसका मतलब कोई हमारा जुड़वां ब्रह्माण्ड है।
क्वांटम फिजिक्स के मुताबिक सृष्टि के आरंभ के समय हर कण का एक प्रतिकण बना। यह प्रतिकण या एंटी पार्टिकल कुछ ऐसा जैसे कि आइने में उसके उलटे प्रतिबिंब जैसा था,ज्यादातर एंटी मैटर सृष्टि के आरंभ में ही नष्ट हो गया ,लेकिन अब भी कुछ एंटी मैटर ब्रह्मण्ड में मौजूद है।
सामन्य स्थिति में सोचें ,तो हम जो दुनिया देख रहे हैं ,वह दरअसल अतीत की है। आकाश में जो तमाम तारे जो हम देखते है ,उनसे आने वाली रोशनी सैकड़ों -हजारों साल में हम तक पहुंचती है ,इसलिए कोई तारा हजार ,कोई पांच हजार साल पुराना देखते है। कई तारे हमें ऐसे दिखते हैं ,जो हज़ारों साल पहले खत्म हो गए हैं। इसी तरह पृथ्वी से पांच हजार प्रकाश वर्ष दूर किसी सभ्यता के लोग पृथ्वी को देख पाएं ,तो उन्हें हड़प्पा ,मोहनजोदड़ो की सभ्यताओं में रहने वाले लोग दिखेंगे। और कुछ भी असंभव नहीं आज के संदर्भ में।
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