Sunday, February 14, 2016

रवींद्रनाथ टैगोर और वसंत --1


वसंत के दिन विरहिणी का मन हाहाकार करता है ,यह बात हमने प्राचीन काव्यों में पढ़ी है। प्रकृति के साथ अपने मन का संपर्क हमने ऐसा तोड़ लिया है। मुनष्य क्या बस इस अजस्रता के स्त्रोत को रुंधता रहेगा ?अपने को खिलाएगा नहीं ,फलाएगा नहीं ,दान करना न चाहेगा ?क्या हम ऐसे निरे मुनष्य हैं ?क्या हम वसंत के रहस्यमय रस-संचार विकलित तरु-लता-पल्लव कोई नहीं ? वे जो हमारे घर के आंगन को छाया से ढककर,गंध से भरकर,बांहों से घेरकर खड़े हों ,वे क्या हमारे इतने बेगाने हैं कि जब वे फूल बनकर खिल उठेंगे,तब हम अचकन पहनकर दफ्तर जाएंगे ?
मैं आज पेड़-पौधों के साथ अपनी पुरानी आत्मीयता स्वीकार करूंगा। आज मैं किसी तरह न मानूंगा कि व्यस्त होकर काम करते घूमना ही जीवन की अद्वितीय सार्थकता है। आज हमारी युग-युगांतर की बड़ी दीदी वनलक्ष्मी के घर भैया दूज का निमंत्रण है। वहां पर आज तरु-लता से बिल्कुल घर के आदमी की तरह मिलना होगा। आज छाया में लेटकर सारा दिन कटेगा,मिट्टी को दोनों हाथों से बिखेरूंगा,समेटूंगा,वसंती हवा जब बहेगी,तब उसके आनंद को मैं ह्रदय की पसलियों में बहने दूंगा,ताकि वहां पर ऐसी कोई आवाज न हो,जिसकी भाषा पेड़-पौधे नहीं समझते हों। इसी तरह चैत्र के अंत तक मिट्टी ,हवा और आकाश के बीच जीवन को नरम करके,हरा करके बिखेर दूंगा,प्रकाश में ,छाया में चुपचाप पड़ा रहूंगा। लेकिन हाय,कोई काम बंद नहीं होता,हिसाब की काँपी खुली रहती है। मैं नियम की मशीन में,कर्म के फंदे में पड़ गया हूं। अब वसंत के आने से क्या,जाने से ही क्या ?            
  अभिव्यकित के इतिहास में मनुष्य का एक अंश तो पेड़-पौधों के साथ जुड़ा हुआ है। हम लोग किसी समय शाखामृग थे,इसका परिचय हमारे स्वभाव में मिलता है। लेकिन उसके भी बहुत समय पहले किसी आदि-युग में हम निश्चय ही वृक्ष थे,यह क्या हम भूल सकते हैं ?    ----------                                                                                                           
                           
                                                                                                         (    बंग-दर्शन से )

No comments:

Post a Comment