Saturday, July 6, 2013

यहाँ की ज़मीन !

जहाँ बैठौ वहाँ की जमीन चुभती हैं
कहीं गर्म हैं तो कहीं सर्द हैं
कहीं काँटे हैं तो कहीं पथरीली
नरम घास का अहसास शायद ग़ुम हैं
सर्द हैं या गर्म हैं हवाएँ
मौसम के खुशगवार होने का
मुझे हैं बेसब्री से इंतज़ार
इक पल को मैं क्या मानू
साल या महीना,
कुछ फर्क नहीं पड़ता
लगता हैं शायद अब बीता ये पल
देख कर कोहराम चारों तरफ का
मुझे लगता हैं इस पल को बीतने में
सदिया गुजर गई
मेरे सब्र की छोड़ो
अब   कुदरत  भी बेसब्र हो चली
जिस दुनिया को हमने संवारा सदियों में
उसे वो पल भर में तोड़ने चली
बेखबर सा फिर भी हूँ मैं
फिर भी ये सोचकर शर्मिंदा नहीं
खुश हूँ फिर भी कि
मेरे घर कभी ना आएगी ,मुझे तोडने .
सफ़ेद चादर सच की ओढ़ी हैं मैने
यकीन हैं मुझे कि
कफ़न में तब्दील न होगी ये
या
फिर इसके होते कफ़न की जरूरत नहीं मुझे  

No comments:

Post a Comment