Sunday, November 23, 2014

समय अभी है खून की पहचान बचाने का

नस -नस  में जहर है  भरा
कहीं गुस्सा है    तो
 कहीं नफरत की मिलावट खून में
कहीं कुंठाएं बन कर मिल गयी खून में तो
 कहीं  अंधविश्वासी धारणाए।
सब झूठ को बेचते हैं क्योंकि
 झूठ मिला है खून में।
सब बेचैन है
पर मैं चैन की नींद क्यों सो रहा हूँ ?
क्योंकि मेरी नस -नस  में भी जहर भरा है
 कुछ अजब सा !
सनक सी सवार है अजब सी ब्यार है
मन उतावला सा है  कुछ बेताब है
आओ जहर की जगह कुछ प्यार की बहार
कुछ कब्ज़ा जमीनों की बजाय दिलो पर करे
लड़े पर बचपन की मासूमीयत से लड़ कर
फिर दोस्त बन जाये
आओ एक नयी सनक से
धरती पर स्कूल या अस्पताल जैसे
नित नए रोज मंदिर  बनाए
आओ हम जहर निकाले  और
खंगाले अपने मन को
और पूछे क्यों तूफ़ान आया केदारनाथ में
क्यों गंगा -यमुना काली हो कर बेचैन है
समय अभी है मानव -सभ्यता को बचाने का
समय अभी है खून की पहचान बचाने का।

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