Thursday, August 28, 2014

काश ,जो कुछ हमने जिया है ?

चेखव के नाटक ' तीन बहनें '  के बारे में पढ़कर  अच्छा लगा। ऐसा लगा कि मैंने अपनी जिन्दगी के कुछ पलों में पूरी जिन्दगी  का दर्द सिमटा कर उसे खत्म कर दिया है शायद। एक पंक्ति
"व्यर्थता बोध की मारी इरीनी अवसाद के क्षणों में कहती है ,काश ,जो कुछ हमने जिया है , वह जिन्दगी का रफ ड्राफ्ट होता और इसे फेयर करने का एक मौका और हमें मिलता। "
पर रफ हो या फेयर जिन्दगी की घटनाएं जब घटित होती हैं तो उस वक़्त जो निर्णय लिए जाते हैं वही सर्वोत्तम होते हैं।
        वक़्त के सिलसिले में जीना , जिन्दगी को घूट -घूट  कर पीना।
                        जख्म कोई भी मिले दर्द से उसे सी लेना।
       

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