तुम प्रकृति हो , सूक्ष्म आत्मा हो ,
असली निवासी तुम हो ,
मैं तो मात्र गेह हूँ।
प्रभो , मैं तुम्हारा साधन और यन्त्र हूँ।
ऐसा करो कि मेरा मत्र्य अस्तित्व
तुम्हारी महिमा से मिलकर एकाकार हो जाए।
मैंने अपना मन तुम्हें दे दिया हैं
जिससे तुम्हारा मन इसमें नहर खोदे।
मैंने अपनी ईच्छा तुम्हारे चरणो पर धर दी हैं,
जिससे वह तुम्हारी ईच्छा बन जाए।
मेरे किसी भी अंश को पीछे मत छोड़ो ,
रहस्यपूर्ण और अनिवर्चनीय ढंग से
अपने साथ मुझे एक होने दो।
तम्हारा प्रेम , जो निखिल विश्व के प्राणों में
स्पन्दन भरता हैं,
उसके साथ मेरे हृदय को स्पन्दित होने दो।
पृथ्वी के उपयोग के लिए
तुम मेरे शरीर को इंजिन बनाना।
मेरी धमनियों और शिराअों में
तुम्हारे आनन्द की धारा बहेगी।
तुम्हारी शक्ति जब छूटेगी ,
मेरे विचार प्रकाश की सीमा बनेंगे।
ऐसा करो कि मेरी आत्मा
निरन्तर तुम्हारी पूजा में लीन रहे।
और प्रत्येक आकार
तथा प्रत्येक आत्मा में
तुम्हारा दर्शन करे। लिखित श्री अरविन्द
असली निवासी तुम हो ,
मैं तो मात्र गेह हूँ।
प्रभो , मैं तुम्हारा साधन और यन्त्र हूँ।
ऐसा करो कि मेरा मत्र्य अस्तित्व
तुम्हारी महिमा से मिलकर एकाकार हो जाए।
मैंने अपना मन तुम्हें दे दिया हैं
जिससे तुम्हारा मन इसमें नहर खोदे।
मैंने अपनी ईच्छा तुम्हारे चरणो पर धर दी हैं,
जिससे वह तुम्हारी ईच्छा बन जाए।
मेरे किसी भी अंश को पीछे मत छोड़ो ,
रहस्यपूर्ण और अनिवर्चनीय ढंग से
अपने साथ मुझे एक होने दो।
तम्हारा प्रेम , जो निखिल विश्व के प्राणों में
स्पन्दन भरता हैं,
उसके साथ मेरे हृदय को स्पन्दित होने दो।
पृथ्वी के उपयोग के लिए
तुम मेरे शरीर को इंजिन बनाना।
मेरी धमनियों और शिराअों में
तुम्हारे आनन्द की धारा बहेगी।
तुम्हारी शक्ति जब छूटेगी ,
मेरे विचार प्रकाश की सीमा बनेंगे।
ऐसा करो कि मेरी आत्मा
निरन्तर तुम्हारी पूजा में लीन रहे।
और प्रत्येक आकार
तथा प्रत्येक आत्मा में
तुम्हारा दर्शन करे। लिखित श्री अरविन्द
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