Wednesday, January 8, 2014

' मो सम कौन कुटिल खल कामी। '

मुझे यह वर्णन करना कुछ अजीब सा लगता हैं इन सब बातों से गुजर कर भी मैं क्योंकर विनम्र न हो पाया
ऐसा इसलिये मुझे महसूस हुआ क्योंकि आज मैं बिलकुल अकेला हूँ।  मैंने कहीं पड़ा हैं कि मनुष्य परीक्षाओं से
गुजरकर शुद्ध और नम्र बन जाता हैं। काफी कुछ गुजर चुका।  हम नफरत की ज्वाला में फंसे हुए असहाय प्राणी हैं।   यहाँ पर मुझे सूरदास की पंक्ति याद आ रही हैं -
       
                        '   मो सम कौन कुटिल खल कामी। '   ये आत्मग्लानि और निराशा के स्वर में उनकी पीड़ा थी जिसमे  हम  सबकी हामी हैं।

No comments:

Post a Comment