Thursday, February 20, 2014

यहाँ सुख से सौ गुनी पीर देखी

हमने जग की अजब तस्वीर देखी                              रचित ----      कवि प्रदीप
एक हँसता हैं दस रोते हैं
 ये प्रभु की अजब जागीर देखी
हमे हँसते मुखड़े  चार मिले
 दुखिया चेहरे हजार मिले
 यहाँ सुख से सौ गुनी पीर देखी 
एक हँसता हैं दस रोते हैं
ये इसलिए सच हैं कयोंकि इस दुनिया में जानवर जायदा रहते हैं वो भी इंसानो का वेश बना कर। कुछ लोग हैं मेरे भाई दीपक जैसे इंसानियत को शर्मिन्दा करने पर तुले हुए हैं। मैं सोचता हूँ अगर वो मुझसे ऐसा सलूक कर सकते हैं तो फिर किसी और से ---
फिर मैं चारो तरफ नजर दौड़ाता हूँ तो देखता हूँ ये दुनिया रहने लायक भी बची हैं या नहीं।
झूठ , बेशर्मी  और न जाने कैसी सोच। जिस यमुना को लोग गन्दा करते हैं वही सीवर युक्त पानी का वो मथुरा
में  आचमन करते हैं।
                                                                                  -----शेष फिर !     

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