वे घूमते -घूमते भालका तीर्थ पहुंचे। वे उस जगह की तलाश में थे , जहां बैठकर चैन की सांस ले सकें और ध्यानयोग करने के बाद गहरी नींद ले सकें।
वे ध्यान करने के लिए कुछ देर तक बैठे रहे , लेकिन कर नहीं सके। चित्त चंचल ही बना रहा। वे एक पैर पर दूसरा पैर चढ़ाकर लेट गए। पलकें नींद से बोझिल हो रही थी।
इसी वक्त उनके मुंह से एक 'आह ' निकली।
यह 'आह' किसी स्मृति की नहीं , उस तीर की थी , जो उनके तलवों को भेदता हुआ उस पार चला गया था।
'प्रणाम द्वारकाधीश ! क्षमा करें , अनजाने में ही अपराध कर बैठा मैं। मैं आपके पांव को उस हिरन का कान समझ बैठा ,जिसका शिकार कर रहा था। '
'कौन हो तुम ?' कृष्ण पीड़ा से लेट गए।
'यह तो मैं भी नहीं जानता। हां , मां यह जरूर बताती है कि पिता कोई वसुदेव हैं ,जो मथुरा नरेश कंस के कारागार में बंद थे। '
कृष्ण उसे देखते ही रहे और उसके चेहरे में स्वयं को ढूंढ़ते रहे। इतना देख लिया कि उसकी आंखो में उनकी आंखो जैसा तेज है।
रक्तस्त्राव तेज था। खून तलवे से भी बह रहा था और पांव के ऊपर से भी। उनकी लंगोटी खून से भीग गई थी। जांघों के दोनों ओर से खून टपकने लगा था , लेकिन बेकार।
'द्वारकाधीश ! एक विचित्र बात मैंने देखी। मैं हिरन को घायल करना चाहता था , मारना नहीं। और देखिए , तीर यही था , ऐसा ही सरपत का , सरकंडे का ,लेकिन जैसे ही इस धनुष की डोर पर चढ़ाया , वह वज्र जैसा भारी हो गया और इसकी नोक देखिए ,जहर बुझी जैसी। कैसे हो गया ऐसा ,मेरी समझ में नहीं आ रहा हैं। '
कृष्ण जैसे नशे में थे --कुछ चेतन , कुछ अवचेतन। बुदबुदाए --' जब मैं ही नहीं समझ सका इस जीवन और जगत के रहस्य को ,तो दूसरा कोई क्या समझेगा ?… क्या नाम बताया तुमने अपना ?'
'जरा , निषादों में सर्वश्रेष्ठ धनुधर्र जरा। '
कृष्ण के चेहरे पर हलकी मुसकान आई --' बुढ़ापे को भी जरा कहते हैं। '
'द्वारकाधीश , घातक तीर नहीं है ,घातक वह विष है जो उसकी नोक पर था। क्या करूं ?मेरी समझ में नहीं आ रहा है। '
कृष्ण का शरीर धीरे -धीरे बैंगनी पड़ता जा रहा था। सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। गोमती और कपिला के संगम में हलकोरो की 'चप -चप 'सुनाई पड़ रही थी। जैसे ही उधर से ठंडी हवा का झोंका आया , कृष्ण ने आंखें खोली --'मैंने तो यदुवंशियो का नाश ही कर दिया था जरा ,लेकिन अब संतोष और ख़ुशी है कि तुम बचे रह गए। '
कृष्ण का कष्ट जरा से छिपा नहीं रहा। उनकी देह अकड़ती जा रही थी। आंखें खोलना चाहते थे ,लेकिन खोल नहीं पा रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाएं फैलाई , जैसे उड़ना चाहते हों। जरा पैरों की तरफ से उठा और उनका सिर अपनी गोद में लेकर बैठ गया।
कृष्ण ने अंतिम बार आंखें खोल कर देखा। वे भावुक और द्रवित हो उठे। उनकी आंखों के कोर में आंसू छलक आये। उनके होठ काँप रहे थे ,वे कुछ कहना चाहते थे ,लेकिन आवाज बाहर नहीं आ रही थी। जरा ने झुक कर अपना कान उनके होठो के पास किया। वे कह रहे थे --'जरा मेरे भाई , द्वारका जाकर वसुदेव महाराज से कह दो मेरी प्रतीक्षा न करे। '
'अरे ,कैसी बात कर रहे हैं आप ? कहीं नहीं जाऊंगा इस हाल में आपको छोड़कर !' जरा बिगड़ कर बोला।
पता नहीं कृष्ण ने उसे सुना या नहीं सुना। उनकी आंखें बंद हुई और सिर उसकी गोद में लुढ़क गया। उसने आहिस्ता से सिर को उठाया और नीचे रख दिया। चांदनी छिटकी हुई थी और पीपल के पत्तों से छानकर उनके चेहरे पर आ रही थी। उसने उनकी भुजायें ठीक की ,पांव सीधे किये , और देर तक उस शांत ,प्रसंन और पूर्णकाम मुखमंडल को निहारता रहा ,जिसके बारे में बचपन से सुनता आया था।
जाने कहां से एक स्वर बराबर उसके कानों में गूंज रहा था ---' शव को बचाए रखो ,सुबहः तक के लिए। '
वे ध्यान करने के लिए कुछ देर तक बैठे रहे , लेकिन कर नहीं सके। चित्त चंचल ही बना रहा। वे एक पैर पर दूसरा पैर चढ़ाकर लेट गए। पलकें नींद से बोझिल हो रही थी।
इसी वक्त उनके मुंह से एक 'आह ' निकली।
यह 'आह' किसी स्मृति की नहीं , उस तीर की थी , जो उनके तलवों को भेदता हुआ उस पार चला गया था।
'प्रणाम द्वारकाधीश ! क्षमा करें , अनजाने में ही अपराध कर बैठा मैं। मैं आपके पांव को उस हिरन का कान समझ बैठा ,जिसका शिकार कर रहा था। '
'कौन हो तुम ?' कृष्ण पीड़ा से लेट गए।
'यह तो मैं भी नहीं जानता। हां , मां यह जरूर बताती है कि पिता कोई वसुदेव हैं ,जो मथुरा नरेश कंस के कारागार में बंद थे। '
कृष्ण उसे देखते ही रहे और उसके चेहरे में स्वयं को ढूंढ़ते रहे। इतना देख लिया कि उसकी आंखो में उनकी आंखो जैसा तेज है।
रक्तस्त्राव तेज था। खून तलवे से भी बह रहा था और पांव के ऊपर से भी। उनकी लंगोटी खून से भीग गई थी। जांघों के दोनों ओर से खून टपकने लगा था , लेकिन बेकार।
'द्वारकाधीश ! एक विचित्र बात मैंने देखी। मैं हिरन को घायल करना चाहता था , मारना नहीं। और देखिए , तीर यही था , ऐसा ही सरपत का , सरकंडे का ,लेकिन जैसे ही इस धनुष की डोर पर चढ़ाया , वह वज्र जैसा भारी हो गया और इसकी नोक देखिए ,जहर बुझी जैसी। कैसे हो गया ऐसा ,मेरी समझ में नहीं आ रहा हैं। '
कृष्ण जैसे नशे में थे --कुछ चेतन , कुछ अवचेतन। बुदबुदाए --' जब मैं ही नहीं समझ सका इस जीवन और जगत के रहस्य को ,तो दूसरा कोई क्या समझेगा ?… क्या नाम बताया तुमने अपना ?'
'जरा , निषादों में सर्वश्रेष्ठ धनुधर्र जरा। '
कृष्ण के चेहरे पर हलकी मुसकान आई --' बुढ़ापे को भी जरा कहते हैं। '
'द्वारकाधीश , घातक तीर नहीं है ,घातक वह विष है जो उसकी नोक पर था। क्या करूं ?मेरी समझ में नहीं आ रहा है। '
कृष्ण का शरीर धीरे -धीरे बैंगनी पड़ता जा रहा था। सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। गोमती और कपिला के संगम में हलकोरो की 'चप -चप 'सुनाई पड़ रही थी। जैसे ही उधर से ठंडी हवा का झोंका आया , कृष्ण ने आंखें खोली --'मैंने तो यदुवंशियो का नाश ही कर दिया था जरा ,लेकिन अब संतोष और ख़ुशी है कि तुम बचे रह गए। '
कृष्ण का कष्ट जरा से छिपा नहीं रहा। उनकी देह अकड़ती जा रही थी। आंखें खोलना चाहते थे ,लेकिन खोल नहीं पा रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाएं फैलाई , जैसे उड़ना चाहते हों। जरा पैरों की तरफ से उठा और उनका सिर अपनी गोद में लेकर बैठ गया।
कृष्ण ने अंतिम बार आंखें खोल कर देखा। वे भावुक और द्रवित हो उठे। उनकी आंखों के कोर में आंसू छलक आये। उनके होठ काँप रहे थे ,वे कुछ कहना चाहते थे ,लेकिन आवाज बाहर नहीं आ रही थी। जरा ने झुक कर अपना कान उनके होठो के पास किया। वे कह रहे थे --'जरा मेरे भाई , द्वारका जाकर वसुदेव महाराज से कह दो मेरी प्रतीक्षा न करे। '
'अरे ,कैसी बात कर रहे हैं आप ? कहीं नहीं जाऊंगा इस हाल में आपको छोड़कर !' जरा बिगड़ कर बोला।
पता नहीं कृष्ण ने उसे सुना या नहीं सुना। उनकी आंखें बंद हुई और सिर उसकी गोद में लुढ़क गया। उसने आहिस्ता से सिर को उठाया और नीचे रख दिया। चांदनी छिटकी हुई थी और पीपल के पत्तों से छानकर उनके चेहरे पर आ रही थी। उसने उनकी भुजायें ठीक की ,पांव सीधे किये , और देर तक उस शांत ,प्रसंन और पूर्णकाम मुखमंडल को निहारता रहा ,जिसके बारे में बचपन से सुनता आया था।
जाने कहां से एक स्वर बराबर उसके कानों में गूंज रहा था ---' शव को बचाए रखो ,सुबहः तक के लिए। '
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