Monday, December 25, 2017

Birth of Jesus : Merry Christmas!

The great self-publishing of divine power appears before Arjuna, who understands the true meaning of the world's process and devotion. Lord Krishna appeared in his presence in front of Duryodhana, when Duryodhana, Lord Krishna, who had come to make the last attempt of the treaty, tried to make him captive. 
This Divine Paradarshan is not a legend or mythological story, but it is a spiritual experience. In the history of religious experience, many such views are mentioned.The transit of Jesus, the philosophy of Saul on the road to Damascus, the philosophy of a cross by Constantine on which these words were written, "conquer this sign" and this kind of philosophy of John of Arc can be seen in the divine form of Arjuna There are only experiences.
This philosophy is not a mental imagination but it is the opening of a truth beyond a limited mind. Here is the spontaneous and straightforward experience of the experience

Merry Christmas!

MERRY CHRISTMAS  
भगवान के बेटे के जन्मदिन पर ये लिखना कि मेरे अनुभव ने जो मुझे दिया हैं --सत्य की जो जुड़ती हुयी छोटी-२  झांकियां मुझे हो पायी हैं , उनसे सत्य के उस अवर्णीय तेज की कल्पना नहीं हो सकती , जो हमारी आँखों से रोज दिखायी देने वाले सूरज के तेज से करोड़ गुना अधिक हैं। सच तो यह हैं कि जो मैंने देखा हैं वह उस अतुलनयी महान प्रकाश की हल्की सी झलकमात्र हैं।
जो अभेद्य अंधकार मेरे चोरो और छाया हुआ था, वह शाप नहीं वरदान निकला और देवीय प्रकाश मुझे कुछ समझा पाया और दिखा पाया और फिर मैं उस प्रकाश की  और बड़  चला।
उस प्रकाश की शक्ति ने मुझे शक्ति दी हालाँकि
कुछ ऐसा जादू नहीं हुआ था, मेरा पुनर्जन्म हुआ था। मैने धीरे-२ परिस्थिति का मूल्यांकन  करना शुरू किया।
इस भूमि पर मैंने ईश्वर जैसा कठोर मालिक नहीं देखा। वह आपकी परीक्षा बार -बार लेता ही रहता हैं। और
जब आपको ऐसा लगता हैं कि आपकी श्रद्धा या आपका शरीर आपका साथ नहीं दे रहा हैं और आपकी नॉव  डूब रही हैं , तब वह आपकी मदद को किसी न किसी तरह पुहंच जाता हैं और आपको विश्वास करा देता और आपका संकेत पाते ही आने को तैयार हैं , परन्तु आपकी शर्त पर नहीं , अपनी शर्त पर। और
ये सब मुझे इतना आसान नहीं लगता।  मुझे कई  ऐसे उदहारण स्वयं से खोजने पड़े ऐसा कहना शायद अतिश्योक्ति होगा।                                   

Wednesday, November 15, 2017

 कर्म और पूजा या सेवा !

कलियुग में लोग शवान के मुँह वाले हो गए हैं। रिश्वत और बेईमानी से पैसे खाते हैं। राजा शेर के समान हिंसक और उसके कर्मचारी शवान के समान लालची हो गए हैं। आडंबरों और मिथ्याचारों का प्रचार करकें धन प्राप्त करना उनका लक्ष्य हो गया हैं।
मानव के आदर्श आचरण के लिए ईश्वर के प्रति समर्पित कर्म ये स्वामी विवेकानंद का एकमात्र  सूत्र हैं।
हम जो भी कार्य करते हैं उन सबका संबंध हमसे ही हैं और उसे अपने ही भले के लिए करते हैं।
भगवान किसी खंदक में नहीं गिर हैं ,जो उन्हें मेरी या किसीकी सहायता की आवश्यकता हैं कि हम अस्पताल बनवाकर या इसी तरह के अन्य कार्य करके उनकी सहायता कर  सकें। उन्ही की आज्ञा से हम कर्म कर  पाते हैं। संसार को  हमारी  तनिक भी आवश्यकता नहीं संसार चलता जाता हैं ,हम इस संसार में बिंदु समान हैं। जब कभी  ऐसी मूर्खतापूर्ण   बातें हो कि हमें भगवान की सेवा करनी चाहिए तो ये स्वार्थपूर्ण हैं। हम धन्य हैं ,जो हमें यह सौभाग्य प्राप्त हैं कि हम उनके लिए कर्म करे ,(समर्पित भावना )  उनको सहायता देने के लिए नहीं।
हम किसीकी सहायता नहीं कर सकते यह सोचना कि हम सहायता या सेवा कर सकते हैं धर्म नहीं हैं। हम स्वयं उनकी इच्छा से यहां पर हैं। हम सहायता या सेवा नहीं उनकी पूजा करते हैं। जब हम किसी प्राणी  को खाने के लिए एक ग्रास खाना देते हैं तब हम उस ईश्वर की पूजा करते हैं ,ईश्वर का बनाया प्राणी यानि ईश्वर उस प्राणी में प्रकट हुआ है तो क्या हम उसे खाना देकर उसकी सहायता कर रहे हैं ,नहीं हम उस ईश्वर की पूजा कर रहे हैं।
इस सहायता शब्द को मन से सदा के लिए निकाल देना चाहिए।
इस भाव से हमें  कर्म करना हैं यही उचित हैं।
हम सभी न्यूनाधिक मात्रा  में नास्तिक हैं। हम न तो ईश्वर को देखते हैं और न उस पर विश्वास करते हैं। हमारे लिए वह 'ई-शव-र' अक्षरों का समूह मात्र या शब्द मात्र हैं।
क्योंकि अज्ञान की दशा में ही कर्म का बंधन और ईश्वर की सेवा होती हैं। ईश्वर में सच्चा विश्वास रखने वाला सहायता शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता हैं।


Saturday, October 21, 2017

सवाल वही!


MONDAY, APRIL 14, 2014

बहुत चले

 बहुत चले फिर बहुत देर तक रुके
फिर चले कभी-कभी
 ऐसा लगताहै
थकान  होने को  है।
पर मन अभी भरा नहीं है  
दिल तो करता है  चलूँ
 चल कर यूहीं  गुज़ार  दूँ  पूरी उम्र को
तमन्ना कोई बाकि नहीं
सिवाय इसके
कि बहुत चलूँ पर थकान कभी न हो मुझे
रब की तलाश है  मुझे
ये कहने से मुझे लगता है  डर
कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं
ये कहने से मुझे लगता है  डर।
अलबत्ता हर शख्स मुझे डराता है
इस सहमी हुई दुनिया में।
चल-चल कर मैं उतारूंगा अपने अन्दर के
बोझ को
करूँगा अपने जिस्म को हल्का  और
फिर मैं शायद पा लूँगा अपने रब को।
शायद मुझे फिर होगा इस दुनिया के हर
शख्स से प्यार।
तम्मनाए फिर शायद जाग कर पूछेंगी सवाल
कहाँ चले।

Saturday, October 14, 2017

तुम जो मेरे चमन को लूटने आये हो

तुम जो आये हो सपने ले के बहारों

तुमने जो अपनी नेकदिली के किस्से सुनाए है

तुमने जो दरयादिली की बाते सुनाई है

मुझे कुछ -कुछ यकीं हो चला है कि

तुम जो मेरे चमन को लूटने आये हो

तुमसे पहले भी ऐसा यकीं था किसी और पर

और अब तुम हमे अपनी मोहब्बत के तराने
 
           सुनाने आये हो

तुम जो मेरे चमन को लूटने आये हो




Monday, October 2, 2017

सत्य ही ईश्वर है और ईश्वर ही सत्य है!

महात्मा गांधी के लिए -एक श्रद्धांजलि "सत्यमेव जयते "।

सत्य की जीत का हम कैसे वर्णन कर सकते हैं?

सच और केवल एकदम सच
सच और सुन्दरता
सच और निडरता

सच और प्यार
सच और अहिंसा
सच और सहनशीलता

सच और चरित्र
सच और किसी वस्तु की इच्छा न होना
और सच ही इश्वर है

सच के लिए मरना
सच और जीवन
सच और तपस्या

सच की कीमत
सच को महसूस करना

तो यह थे सच्चाई के इतने विभिन्न रूप
परन्तु
लोग कहते हैं की :-
"मृत्यु ही सच है,यह जीवन झूठ है "
परन्तु मेरे विचार से जीवन ही सत्य है और शुरू से अंत तक हम अपनी-अपनी सच्चाईयों की लड़ाई लड़ते रहते हैं और अंत मे सच ही रहता है ,सच ही जीता है और अंततः सच जीतता है
इसीलिए कहा गया है:-
"सत्यमेव जयते "।   

Sunday, September 17, 2017

मोदी सर के जन्मदिन पर नर्मदा नदी का भविष्य?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार सरोवर बांध देश को समर्पित कर दिया लेकिन अभी तक यह योजना पूरी ही नहीं हुई है. नहर का इंफ्रास्ट्रकचर मुश्किल से 30 प्रतिशत कमांड एरिया के लिए ही बना है और रिजॉरवायर (जलाशय) भी नहीं भरा है.
इस परियोजना में अभी तक जितनी लागत लग चुकी है, उतनी ही अभी और लगने की संभावना है. समस्या यह है कि इस परियोजना की कुल लागत का हमें पता ही नहीं है. मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि इस परियोजना से नुकसान ही ज़्यादा हुआ है जबकि नफ़ा बहुत कम है.
किसके लिए बनी थी योजना?
यह योजना बनी थी कच्छ, सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात के लिए. ये गुजरात के सूखाग्रस्त इलाक़े हैं. यहां पानी देने के लिए एकमात्र विकल्प के रूप में यह योजना बनी थी. लेकिन आज तक इन इलाक़ों में पानी नहीं पहुंचा है.
Image copyrightAFP/GETTY IMAGESसरदार सरोवर बांध
ज़्यादतर पानी मध्य गुजरात जैसे अहमदाबाद, बड़ौदा, खेड़ा, बरूच जैसे जिलो में जा रहा है. अहमदाबाद में जो साबरमती नदी बह रही है उसमें भी नर्मदा का ही पानी है.
इसलिए अभी तक तो इस योजना को नफ़े के तौर पर नहीं देख सकते, क्योंकि जिन इलाक़ों को पानी की ज़रूरत थी वहां तो पानी नहीं पहुंचा और जहां पहुंचा है वहां पहले से ही पर्याप्त मात्रा में पानी था.

कितना नुकसान हुआ ?

इस योजना की वजह से कम से कम 50 हज़ार परिवार विस्थापित हुए हैं. नर्मदा नदी ख़त्म हो गई है. प्रधानमंत्री मोदी ने आज जो उत्सव मनाया वह एक तरह से नर्मदा नदी की मृत्यु का उत्सव था.
Image copyrightGETTY IMAGESसरदार सरोवर बांध से सूखाग्रस्त इलाका
क्योंकि बांध के नीचे जो 150 किमी तक नदी थी वह बहना बंद हो गई है. वहीं बांध के ऊपर जो 200 किमी से लंबा रिजॉरवायर एरिया बना है वहां भी नदी नहीं बह रही है.
नदी के निचले इलाक़ों में जो 10 हजार परिवार रह रहे थे, वे मछली पालन पर निर्भर थे. उनकी आजीविका पूरी तरह खत्म हो गई है.

योजना का उद्देश्य क्या था ?

हमें यह समझना होगा कि इस योजना को किस उद्देश्य के साथ शुरू किया गया था. इससे वास्तव में कितना फ़ायदा होगा. और अंत में यह भी देखना होगा इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए क्या यह योजना सबसे बेहतर विकल्प थी.
Image copyrightGETTY IMAGESनर्मदा बचाओ आंदोलन
जब हम इन तीन सवालों के जवाब खोजते हैं तो पाते हैं कि यह योजना गुजरात, वहां के सूखा पीड़ित इलाक़ों और देश के लिए सबसे बेहतर विकल्प नहीं थी.
कुछ दिन पहले मोदी के साथ बुलेट ट्रेन की शुरुआत करने वाला जापान ने ही सबसे पहले इस योजना से अपने हाथ खींचे थे. उन्हें जब पता चला कि इस योजना के कारण कई हज़ार लोगों का विस्थापन हो रहा है तो वह पीछे हट गए.
साल 1992 में विश्व बैंक ने अपनी स्वतंत्र जांच बैठाई थी और उसमें पाया था कि इस परियोजना से बहुत ज़्यादा नुकसान होगा, इसलिए विश्व बैंक ने भी इस योजना पर पैसे लगाने से इंकार कर दिया था.
साल 1993-94 में जब भारत सरकार ने अपनी एक स्वतंत्र जांच बैठाई थी, उसमें भी इस योजना को असफल बताया गया था.
सरकार तो सिर्फ अपने नेता की बात के आगे ठप्पा लगाने का काम करती है. देश का दुर्भाग्य है कि यहां के नौकरशाह स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकते.
Image copyrightSAM PANTHAKY/AFP/GETTY IMAGESसरदार सरोवर बांध

Friday, September 15, 2017

अबकी बार इवेंट सरकार!

ये  इवेंट सरकार है. आपको इवेंट चाहिए इवेंट मिलेगा. किसी भी चीज़ को मेक इन इंडिया से जोड़ देने का फन सबमें आ गया जबकि मेक इन इंडिया के बाद भी मैन्यूफैक्चरिंग का अब तक का सबसे ख़राब रिकॉर्ड है.’

The Prime Minister, Shri Narendra Modi and the Prime Minister of Japan, Mr. Shinzo Abe at Ground Breaking ceremony of Mumbai-Ahmedabad High Speed Rail Project, at Ahmedabad, Gujarat on September 14, 2017. The Governor of Gujarat, Shri O.P. Kohli, the Union Minister for Railways and Coal, Shri Piyush Goyal, the Chief Minister of Gujarat, Shri Vijay Rupani and the Chief Minister of Maharashtra, Shri Devendra Fadnavis are also seen.
अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन शिलान्यास कार्यक्रम (फोटो: पीआईबी)
2022 में बुलेट ट्रेन के आगमन को लेकर आशावाद के संचार में बुराई नहीं है. नतीजा पता है फिर भी उम्मीद है तो यह अच्छी बात है. मोदी सरकार ने हमें अनगिनत इवेंट दिए हैं. जब तक कोई इवेंट याद आता है कि अरे हां, वो भी तो था,उसका क्या हुआ, तब तक नया इवेंट आ जाता है. सवाल पूछकर निराश होने का मौका ही नहीं मिलता.
जनता को आशा-आशा का खो-खो खेलने के लिए प्रेरित कर दिया जाता है. प्रेरणा की तलाश में वो प्रेरित हो भी जाती है. होनी भी चाहिए. फिर भी ईमानदारी से देखेंगे कि जितने भी इवेंट लांच हुए हैं, उनमें से ज़्यादातर फेल हुए हैं. बहुतों के पूरा होने का डेट 2019 की जगह 2022 कर दिया गया है. शायद किसी ज्योतिष ने बताया होगा कि 2022 कहने से शुभ होगा!
काश कोई इन तमाम इवेंट पर हुए खर्चे का हिसाब जोड़ देता. पता चलता कि इनके इवेंटबाज़ी से इवेंट कंपनियों का कारोबार कितना बढ़ा है. ठीक है कि विपक्ष नहीं है, 2019 में मोदी ही जीतेंगे, शुभकामनाएं, इन दो बातों को छोड़कर तमाम इवेंट का हिसाब करेंगे तो लगेगा कि मोदी सरकार अनेक असफल योजनाओं की सफल सरकार है.
इस लाइन को दो बार पढ़िये. एक बार में नहीं समझ आएगा.
2016-17 के रेल बजट में बड़ोदरा में भारत की पहली रेल यूनिवर्सिटी बनाने का प्रस्ताव था. उसके पहले दिसंबर 2015 में मनोज सिन्हा ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का ऐलान किया था. अक्टूबर 2016 में खुद प्रधानमंत्री ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का ऐलान किया. सुरेश प्रभु जैसे कथित रूप से काबिल मंत्री ने तीन साल रेल मंत्रालय चलाया लेकिन आप पता कर सकते हैं कि रेल यूनिवर्सिटी को लेकर कितनी प्रगति हुई है.
इसी तरह 2014 में देश भर से लोहा जमा किया गया कि सरदार पटेल की प्रतिमा बनेगी. सबसे ऊंची. 2014 से 17 आ गया. 17 भी बीत रहा है. लगता है इसे भी 2022 के खाते में शिफ्ट कर दिया गया है. इसके लिए तो बजट में कई सौ करोड़ का प्रस्ताव भी किया गया था.
2007 में गुजरात में गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (गिफ्ट) और केरल के कोच्चि में स्मार्ट सिटी की बुनियाद रखी गई. गुजरात के गिफ्ट को पूरा होने के लिए 70-80 हज़ार करोड़ का अनुमान बताया गया था. दस साल हो गए दोनों में से कोई तैयार नहीं हुआ. गिफ्ट में अभी तक करीब 2,000 करोड़ ही ख़र्च हुए हैं. दस साल में इतना तो बाकी पूरा होने में बीस साल लग जाएगा.
अब स्मार्ट सिटी का मतलब बदल दिया गया है. इसे डस्टबिन लगाने, बिजली का खंभा लगाने, वाई-फाई लगाने तक सीमित कर दिया गया. जिन शहरों को लाखों करोड़ों से स्मार्ट होना था वो तो हुए नहीं, अब सौ दो सौ करोड़ से स्मार्ट होंगे. गंगा नहीं नहा सके तो जल ही छिड़क लीजिए जजमान.
गिफ्ट सिटी की बुनियाद रखते हुए बताया जाता था कि दस लाख रोज़गार का सृजन होगा मगर कितना हुआ, किसी को पता नहीं. कुछ भी बोल दो. गिफ्ट सिटी तब एक बडा इवेंट था, अब ये इवेंट कबाड़ में बदल चुका है. एक दो टावर बने हैं, जिसमें एक अंतर्राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज का उदघाटन हुआ है.
The Prime Minister, Shri Narendra Modi inaugurating the India International Exchange (India’s first International Stock Exchange) by hitting the gong at GIFT City, Gandhinagar, Gujarat on January 09, 2017. The Minister of State for Finance and Corporate Affairs, Shri Arjun Ram Meghwal is also seen.
जनवरी 2017 को गांधीनगर, गुजरात में देश के पहले अंतरराष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज का उद्घाटन (फोटो: पीआईबी)
आप कोई भी बिजनेस चैनल खोलकर देख लीजिए कि इस एक्सचेंज का कोई नाम भी लेता है या नहीं. कोई 20-25 फाइनेंस कंपनियों ने अपना दफ्तर खोला है जिसे दो ढाई सौ लोग काम करते होंगे. हीरानंदानी के बनाए टावर में अधिकांश दफ्तर ख़ाली हैं.
लाल किले से सांसद आदर्श ग्राम योजना का ऐलान हुआ था. चंद अपवाद की गुंजाइश छोड़ दें तो इस योजना की धज्जियां उड़ चुकी हैं. आदर्श ग्राम को लेकर बातें बड़ी-बड़ी हुईं, आशा का संचार हुआ मगर कोई ग्राम आदर्श नहीं बना. लाल किले की घोषणा का भी कोई मोल नहीं रहा.
जयापुर और नागेपुर को प्रधानमंत्री ने आदर्श ग्राम के रूप में चुना है. यहां पर प्लास्टिक के शौचालय लगाए गए. क्यों लगाए गए? जब सारे देश में ईंट के शौचालय बन रहे हैं तो प्रदूषण का कारक प्लास्टिक के शौचालय क्यों लगाए गए? क्या इसके पीछ कोई खेल रहा होगा?
बनारस में क्योटो के नाम पर हेरिटेज पोल लगाया जा रहा है. ये हेरिटेज पोल क्या होता है. नक्काशीदार महंगे बिजली के पोल हेरिटेज पोल हो गए? ई नौका को कितने ज़ोर-शोर से लांच किया गया था. अब बंद हो चुका है. वो भी एक इवेंट था, आशा का संचार हुआ था. शिंजो आबे जब बनारस आए थे तब शहर के कई जगहों पर प्लास्टिक के शौचालय रख दिए गए. मल मूत्र की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं हुई. जब सड़ांध फैली तो नगर निगम ने प्लास्टिक के शौचालय उठाकर डंप कर दिया.
जिस साल स्वच्छता अभियान लांच हुआ था तब कई जगहों पर स्वच्छता के नवरत्न उग आए. सब नवरत्न चुनते थे. बनारस में ही स्वच्छता के नवरत्न चुने गए. क्या आप जानते हैं कि ये नवरत्न आज कल स्वच्छता को लेकर क्या कर रहे हैं.
बनारस में जिसे देखिए कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसबिलिटी का बजट लेकर चला आता है और अपनी मर्ज़ी का कुछ कर जाता है जो दिखे और लगे कि विकास है. घाट पर पत्थर की बेंच बना दी गई जबकि लकड़ी की चौकी रखे जाने की प्रथा है. बाढ़ के समय ये चौकियां हटा ली जाती थीं. पत्थर की बेंच ने घाट की सीढ़ियों का चेहरा बदल दिया है. सफेद रौशनी की फ्लड लाइट लगी तो लोगों ने विरोध किया. अब जाकर उस पर पीली पन्नी जैसी कोई चीज़ लगा दी गई है ताकि पीली रौशनी में घाट सुंदर दिखे.
प्रधानमंत्री के कारण बनारस को बहुत कुछ मिला भी है. बनारस के कई मोहल्लों में बिजली के तार ज़मीन के भीतर बिछा दिए गए हैं. सेना की ज़मीन लेकर पुलवरिया का रास्ता चौड़ा हो रहा है जिससे शहर को लाभ होगा. टाटा मेमोरियल यहां कैंसर अस्पताल बना रहा है. रिंग रोड बन रहा है. लालपुर में एक ट्रेड सेंटर भी है.
क्या आपको जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट याद है? आप जुलाई 2014 के अख़बार उठाकर देखिए, जब मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में जलमार्ग के लिए 4,200 करोड़ का प्रावधान किया था तब इसे लेकर अखबारों में किस किस तरह के सब्ज़बाग़ दिखाए गए थे. रेलवे और सड़क की तुलना में माल ढुलाई की लागत 21 से 42 प्रतिशत कम हो जाएगा. हंसी नहीं आती आपको ऐसे आंकड़ों पर.
Published in March Financial Express clipping
26 मार्च 2017 को ‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ अख़बार में छपे आंकड़ें
जल मार्ग विकास को लेकर गूगल सर्च में दो प्रेस रिलीज़ मिली है. एक 10 जून 2016 को पीआईबी ने जारी की है और एक 16 मार्च 2017 को. 10 जून 2016 की प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि पहले चरण में इलाहाबाद से लेकर हल्दिया के बीच विकास चल रहा है. 16 मार्च 2017 की प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि वाराणसी से हल्दिया के बीच जलमार्ग बन रहा है. इलाहाबाद कब और कैसे ग़ायब हो गया, पता नहीं.
2016 की प्रेस रिलीज़ में लिखा है कि इलाहाबाद से वाराणसी के बीच यात्रियों के ले जाने की सेवा चलेगी ताकि इन शहरों में जाम की समस्या कम हो. इसके लिए 100 करोड़ के निवेश की सूचना दी गई है. न किसी को बनारस में पता है और न इलाहाबाद में कि दोनों शहरों के बीच 100 करोड़ के निवेश से क्या हुआ है.
यही नहीं 10 जून 2016 की प्रेस रिलीज़ में पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ सेवा शुरू होने का ज़िक्र है. क्या किसी ने इस साल पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ चलते देखा है? एक बार क्रूज़ आया था, फिर? वैसे बिना किसी प्रचार के कोलकाता में क्रूज़ सेवा है. काफी महंगा है.
जुलाई 2014 के बजट में 4,200 करोड़ का प्रावधान है. कोई नतीजा नज़र आता है? वाराणसी के रामनगर में टर्मिनल बन रहा है. 16 मार्च 2017 की प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि इस योजना पर 5,369 करोड़ ख़र्च होगा और छह साल में योजना पूरी होगी. 2014 से छह साल या मार्च 2017 से छह साल?
प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि राष्ट्रीय जलमार्ग की परिकल्पना 1986 में की गई थी. इस पर मार्च 2016 तक 1,871 करोड़ खर्च हो चुके हैं. अब यह साफ नहीं कि 1986 से मार्च 2016 तक या जुलाई 2014 से मार्च 2016 के बीच 1,871 करोड़ ख़र्च हुए हैं. जल परिवहन राज्य मंत्री ने लोकसभा में लिखित रूप में यह जवाब दिया था.
नमामि गंगे को लेकर कितने इवेंट रचे गए. गंगा साफ ही नहीं हुई. मंत्री बदल कर नए आ गए हैं. इस पर क्या लिखा जाए. आपको भी पता है कि एनजीटी ने नमामि गंगे के बारे में क्या क्या कहा है.
13 जुलाई 2017 के इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा है कि दो साल में गंगा की सफाई पर 7,000 करोड़ ख़र्च हो गए और गंगा साफ नहीं हुई. ये 7,000 करोड़ कहां ख़र्च हुए? कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगा था क्या? या सारा पैसा जागरूकता अभियान में ही फूंक दिया गया? आप उस आर्डर को पढ़ंगें तो शर्म आएगी. गंगा से भी कोई छल कर सकता है?
Make in india Modi Reuters
(फोटो: रॉयटर्स)
इसलिए ये इवेंट सरकार है. आपको इवेंट चाहिए इवेंट मिलेगा. किसी भी चीज़ को मेक इन इंडिया से जोड़ देने का फन सबमें आ गया जबकि मेक इन इंडिया के बाद भी मैन्यूफैक्चरिंग का अब तक का सबसे ख़राब रिकॉर्ड है।      रवीश कुमार  NDTV 

Thursday, September 14, 2017

हे हिंदी तू मेरी माँ सी प्यारी!

माँ सी प्यारी,
सबसे न्यारी

गर्व दिलाती, ईठलाती सी,
कोमल सी,
मेरी हिंदी मेरे भारत के माथे की बिंदी

बोलूँ  तो तू मुझे मेरी बहना सी लगे,
लिखूं तो बीवी का गहना

हिंदी तेरे रूप अनेक,
तू अरबों के प्राण स्वरूप
मैं क्या तेरा बखान करूँ
तेरे में समाए  प्रेमचंद और
मैेथिलीशरण जैसे महापुरुष अनेक

नमन हो सुमित्रा नंदन पंत को या
राष्ट्र कवि दिनकर को
 जिन्होंने
तेरा शृंगार किया वीर रस में या
 गौरव दिलाया कवि प्रदीप ने भक्ति रस में और
ह गौरव दिलाया मेरे भारत को अपने गीतों में


हे हिंदी तू मेरे हृदय में रहना,
मेरी माँ बन कर।
मेरी माँ बन कर।।