Sunday, September 17, 2017

मोदी सर के जन्मदिन पर नर्मदा नदी का भविष्य?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार सरोवर बांध देश को समर्पित कर दिया लेकिन अभी तक यह योजना पूरी ही नहीं हुई है. नहर का इंफ्रास्ट्रकचर मुश्किल से 30 प्रतिशत कमांड एरिया के लिए ही बना है और रिजॉरवायर (जलाशय) भी नहीं भरा है.
इस परियोजना में अभी तक जितनी लागत लग चुकी है, उतनी ही अभी और लगने की संभावना है. समस्या यह है कि इस परियोजना की कुल लागत का हमें पता ही नहीं है. मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि इस परियोजना से नुकसान ही ज़्यादा हुआ है जबकि नफ़ा बहुत कम है.
किसके लिए बनी थी योजना?
यह योजना बनी थी कच्छ, सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात के लिए. ये गुजरात के सूखाग्रस्त इलाक़े हैं. यहां पानी देने के लिए एकमात्र विकल्प के रूप में यह योजना बनी थी. लेकिन आज तक इन इलाक़ों में पानी नहीं पहुंचा है.
Image copyrightAFP/GETTY IMAGESसरदार सरोवर बांध
ज़्यादतर पानी मध्य गुजरात जैसे अहमदाबाद, बड़ौदा, खेड़ा, बरूच जैसे जिलो में जा रहा है. अहमदाबाद में जो साबरमती नदी बह रही है उसमें भी नर्मदा का ही पानी है.
इसलिए अभी तक तो इस योजना को नफ़े के तौर पर नहीं देख सकते, क्योंकि जिन इलाक़ों को पानी की ज़रूरत थी वहां तो पानी नहीं पहुंचा और जहां पहुंचा है वहां पहले से ही पर्याप्त मात्रा में पानी था.

कितना नुकसान हुआ ?

इस योजना की वजह से कम से कम 50 हज़ार परिवार विस्थापित हुए हैं. नर्मदा नदी ख़त्म हो गई है. प्रधानमंत्री मोदी ने आज जो उत्सव मनाया वह एक तरह से नर्मदा नदी की मृत्यु का उत्सव था.
Image copyrightGETTY IMAGESसरदार सरोवर बांध से सूखाग्रस्त इलाका
क्योंकि बांध के नीचे जो 150 किमी तक नदी थी वह बहना बंद हो गई है. वहीं बांध के ऊपर जो 200 किमी से लंबा रिजॉरवायर एरिया बना है वहां भी नदी नहीं बह रही है.
नदी के निचले इलाक़ों में जो 10 हजार परिवार रह रहे थे, वे मछली पालन पर निर्भर थे. उनकी आजीविका पूरी तरह खत्म हो गई है.

योजना का उद्देश्य क्या था ?

हमें यह समझना होगा कि इस योजना को किस उद्देश्य के साथ शुरू किया गया था. इससे वास्तव में कितना फ़ायदा होगा. और अंत में यह भी देखना होगा इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए क्या यह योजना सबसे बेहतर विकल्प थी.
Image copyrightGETTY IMAGESनर्मदा बचाओ आंदोलन
जब हम इन तीन सवालों के जवाब खोजते हैं तो पाते हैं कि यह योजना गुजरात, वहां के सूखा पीड़ित इलाक़ों और देश के लिए सबसे बेहतर विकल्प नहीं थी.
कुछ दिन पहले मोदी के साथ बुलेट ट्रेन की शुरुआत करने वाला जापान ने ही सबसे पहले इस योजना से अपने हाथ खींचे थे. उन्हें जब पता चला कि इस योजना के कारण कई हज़ार लोगों का विस्थापन हो रहा है तो वह पीछे हट गए.
साल 1992 में विश्व बैंक ने अपनी स्वतंत्र जांच बैठाई थी और उसमें पाया था कि इस परियोजना से बहुत ज़्यादा नुकसान होगा, इसलिए विश्व बैंक ने भी इस योजना पर पैसे लगाने से इंकार कर दिया था.
साल 1993-94 में जब भारत सरकार ने अपनी एक स्वतंत्र जांच बैठाई थी, उसमें भी इस योजना को असफल बताया गया था.
सरकार तो सिर्फ अपने नेता की बात के आगे ठप्पा लगाने का काम करती है. देश का दुर्भाग्य है कि यहां के नौकरशाह स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकते.
Image copyrightSAM PANTHAKY/AFP/GETTY IMAGESसरदार सरोवर बांध

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