कलियुग में लोग शवान के मुँह वाले हो गए हैं। रिश्वत और बेईमानी से पैसे खाते हैं। राजा शेर के समान हिंसक और उसके कर्मचारी शवान के समान लालची हो गए हैं। आडंबरों और मिथ्याचारों का प्रचार करकें धन प्राप्त करना उनका लक्ष्य हो गया हैं।
मानव के आदर्श आचरण के लिए ईश्वर के प्रति समर्पित कर्म ये स्वामी विवेकानंद का एकमात्र सूत्र हैं।
हम जो भी कार्य करते हैं उन सबका संबंध हमसे ही हैं और उसे अपने ही भले के लिए करते हैं।
भगवान किसी खंदक में नहीं गिर हैं ,जो उन्हें मेरी या किसीकी सहायता की आवश्यकता हैं कि हम अस्पताल बनवाकर या इसी तरह के अन्य कार्य करके उनकी सहायता कर सकें। उन्ही की आज्ञा से हम कर्म कर पाते हैं। संसार को हमारी तनिक भी आवश्यकता नहीं संसार चलता जाता हैं ,हम इस संसार में बिंदु समान हैं। जब कभी ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें हो कि हमें भगवान की सेवा करनी चाहिए तो ये स्वार्थपूर्ण हैं। हम धन्य हैं ,जो हमें यह सौभाग्य प्राप्त हैं कि हम उनके लिए कर्म करे ,(समर्पित भावना ) उनको सहायता देने के लिए नहीं।
हम किसीकी सहायता नहीं कर सकते यह सोचना कि हम सहायता या सेवा कर सकते हैं धर्म नहीं हैं। हम स्वयं उनकी इच्छा से यहां पर हैं। हम सहायता या सेवा नहीं उनकी पूजा करते हैं। जब हम किसी प्राणी को खाने के लिए एक ग्रास खाना देते हैं तब हम उस ईश्वर की पूजा करते हैं ,ईश्वर का बनाया प्राणी यानि ईश्वर उस प्राणी में प्रकट हुआ है तो क्या हम उसे खाना देकर उसकी सहायता कर रहे हैं ,नहीं हम उस ईश्वर की पूजा कर रहे हैं।
इस सहायता शब्द को मन से सदा के लिए निकाल देना चाहिए।
इस भाव से हमें कर्म करना हैं यही उचित हैं।
हम सभी न्यूनाधिक मात्रा में नास्तिक हैं। हम न तो ईश्वर को देखते हैं और न उस पर विश्वास करते हैं। हमारे लिए वह 'ई-शव-र' अक्षरों का समूह मात्र या शब्द मात्र हैं।
क्योंकि अज्ञान की दशा में ही कर्म का बंधन और ईश्वर की सेवा होती हैं। ईश्वर में सच्चा विश्वास रखने वाला सहायता शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता हैं।
मानव के आदर्श आचरण के लिए ईश्वर के प्रति समर्पित कर्म ये स्वामी विवेकानंद का एकमात्र सूत्र हैं।
हम जो भी कार्य करते हैं उन सबका संबंध हमसे ही हैं और उसे अपने ही भले के लिए करते हैं।
भगवान किसी खंदक में नहीं गिर हैं ,जो उन्हें मेरी या किसीकी सहायता की आवश्यकता हैं कि हम अस्पताल बनवाकर या इसी तरह के अन्य कार्य करके उनकी सहायता कर सकें। उन्ही की आज्ञा से हम कर्म कर पाते हैं। संसार को हमारी तनिक भी आवश्यकता नहीं संसार चलता जाता हैं ,हम इस संसार में बिंदु समान हैं। जब कभी ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें हो कि हमें भगवान की सेवा करनी चाहिए तो ये स्वार्थपूर्ण हैं। हम धन्य हैं ,जो हमें यह सौभाग्य प्राप्त हैं कि हम उनके लिए कर्म करे ,(समर्पित भावना ) उनको सहायता देने के लिए नहीं।
हम किसीकी सहायता नहीं कर सकते यह सोचना कि हम सहायता या सेवा कर सकते हैं धर्म नहीं हैं। हम स्वयं उनकी इच्छा से यहां पर हैं। हम सहायता या सेवा नहीं उनकी पूजा करते हैं। जब हम किसी प्राणी को खाने के लिए एक ग्रास खाना देते हैं तब हम उस ईश्वर की पूजा करते हैं ,ईश्वर का बनाया प्राणी यानि ईश्वर उस प्राणी में प्रकट हुआ है तो क्या हम उसे खाना देकर उसकी सहायता कर रहे हैं ,नहीं हम उस ईश्वर की पूजा कर रहे हैं।
इस सहायता शब्द को मन से सदा के लिए निकाल देना चाहिए।
इस भाव से हमें कर्म करना हैं यही उचित हैं।
हम सभी न्यूनाधिक मात्रा में नास्तिक हैं। हम न तो ईश्वर को देखते हैं और न उस पर विश्वास करते हैं। हमारे लिए वह 'ई-शव-र' अक्षरों का समूह मात्र या शब्द मात्र हैं।
क्योंकि अज्ञान की दशा में ही कर्म का बंधन और ईश्वर की सेवा होती हैं। ईश्वर में सच्चा विश्वास रखने वाला सहायता शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता हैं।
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