Tuesday, July 21, 2015

और मुझे गले लगाएगा।

खत्म या शुरू
मृत्यु या जीवन
झूठ या सच
कुछ पता नहीं
वक़्त पर मेरा
 कुछ बस नहीं
हर मोड़ पर
कुछ अजीब सा पर
बहुत पुराना सा
नजारा मैंने देखा
पुरानी बातें कुछ अच्छी
या बहुत बुरी
मुझे समझ नहीं आता
 कि
सोते हुए मैं क्यों जागता हूँ
जीवन मेरा
 पर अधिकार किसी और का
ओ ! ईश्वर तू मुझे मत बता
मत समझा
क्यूोंकि जब मैं गिरूंगा
 तो मुझे तू उठाएगा
और मुझे गले लगाएगा।

Thursday, June 25, 2015

भागते भागते ! जीने का अधिकार मुझे मिला !

मैं कौन ?
 भागते भागते मैंने
 खड़े वक़्त से  पूछा।
जीवन की आपा -धापी  में ?
खोने का डर हमेशा।
कुछ पा कर भी
बहुत खोया मैंने
ऐसा तो नहीं।
फिर क्यों मैं
डरा -डरा हूँ।
वक़्त के गुजरने का
अहसास मुझे
जीने के लिए  या
जीने का अधिकार मुझे
मिला
जैसे-जैसे वक़्त गुजरा।





Monday, June 22, 2015

सत्य की जीत


सत्य की जीत 

सत्य की जीत का हम कैसे वर्णन कर सकते हैं?

सच और केवल एकदम सच
सच और सुन्दरता
सच और निडरता

सच और प्यार
सच और अहिंसा
सच और सहनशीलता

सच और चरित्र
सच और किसी वस्तु की इच्छा न होना
और सच ही इश्वर है

सच के लिए मरना
सच और जीवन
सच और तपस्या

सच की कीमत
सच को महसूस करना

तो यह थे सच्चाई के इतने विभिन्न रूप
परन्तु
लोग कहते हैं की :-
"मृत्यु ही सच है,यह जीवन झूठ है "
परन्तु मेरे विचार से जीवन ही सत्य है और शुरू से अंत तक हम अपनी-अपनी सच्चाईयों की लड़ाई लड़ते रहते हैं और अंत मे सच ही रहता है ,सच ही जीता है और अंततः सच जीतता है
इसीलिए कहा गया है:-
"सत्यमेव जयते "।

Sunday, May 10, 2015

माँ! के लिए मेरी भावनाएँ

माँ! कुछ दिन तू और ना जाती ,
मैं ही नहीं बहु भी कहती ,                                          
कहते सारे पोते नाती ,
माँ! कुछ दिन तू और ना जाती ।         

रोज सवेरे मुझे जागना ,
बैठे पलंग पर भजन सुनाना ,
प्यारे कृष्ण के अनुपम किस्से,
तेरी दिनचर्या के हिस्से ,
पूजा के तू कमल बनाती ,
माँ ! तू कुछ दिन तू और ना जाती।

वृदावन तुझको ले जाता ,
यमुनाजी में स्नान कराता ,
धीरे-धीरे पाँव दबाता ,
तू जब भी थक कर सो जाती ।
माँ! कुछ दिन तू और ना जाती ।

कमरे का वो सूना कोना ,
चलना फिरना खाना सोना ,
रोज सुबह ठाकुरजी को नहलाना ,
बच्चो को तुझको टहलाना,
जिसको तू देती थी रोटी ,
गैया आकर रोज रंभाती ।
माँ! कुछ दिन तू और ना जाती।

सुबह देर तक सोता रहता ,
घुटता मन में रोता रहता ,
बच्चे तेरी बाते करते ,
तब आँखों से आंसू झरते ,
माँ अब तू क्यों न सहलाती ।
माँ! कुछ दिन तू और ना जाती ।

अब जब से तू चली गयी हैं ,
मुरझा मन की कली गयी हैं ,
थी ममत्व की सुन्दर मूरत,
तेरी वो भोली सी सूरत ,
दृढ़ निश्चय और वज्र इरादे ,
मन गुलाब की कोमल पाती।
माँ!कुछ दिन तू और ना जाती।





 












Wednesday, April 29, 2015

निरा आदमी ?

निरा आदमी  या
 निरा मूर्ख
कौन हूँ  मैं
 जो लड़ पड़ता हूँ
 हर छोटी -छोटी सच्चाई के लिए
मैं ही क्यों गले में
 फन्दा डाल कर लटकूँ
मुझे ही क्यूँ
 हमदर्दी से देखे ये सब !
वो सब !
मेरे सब्र का पैमाना
 क्यूँ नही झलकता
आग सी सीने में ,
दिल में भी आग सी
वक़्त ने भी मरहम लगाने
से मना कर दिया
जीने की अदा या खुदा तू मुझे भी कुछ बता !




Tuesday, April 7, 2015

बरबस निहारता सा !

वक़्त की नज़ाकत को समझकर
मैं भूल गया सब बातें
गैरों की हुकूमत ,
और अपनों की गुलामी
सब कुछ बेमानी है
कुछ उसूल ,कुछ सच्ची बातें
सब कुछ बेमानी है
मेरी यादें अब कुछ
धुंधली सी हो गयी हैं
नजर कुछ पथरा  सी गयी हैं
ज़माने की हवा ही कुछ ऐसी निकली
के आदमी बुत सा खड़ा
शैतान की हरकतों को बरबस  निहारता सा

अकेलापन

उदास दर्पण में थी कुछ जिंदगी ठहरी हुई
झांककर देखा तो कुछ उम्मीद
 और
नाउम्मीदगी के पलों की छाया
डर गया था में हैरान सा होकर
दबे पाँव पीछे हटा
मेरा साया भी मेरे साथ खड़ा था कुछ परेशान
 जो अब तक
नहीं नजर आ रहा था वो अब

Wednesday, March 25, 2015

मैं और सिर्फ मैं !

मैं और सिर्फ मैं

मैं हूँ , या हम है
या मैं और तुम है
या सिर्फ फिर
मैं ही हूँ
बहुत कोशिश की है  तलाश करने की
पर मुझे कुछ समझ
 नहीं आ रहा है
और कुछ अर्थ निकलता भी दिखाई
नहीं दे रहा,
कि
'हम' है , तुम है या सिर्फ मैं हूँ
कारण -मैं और मैं  से लगता है कि
मैं व्यर्थ ही, अहं को बड़ा रहा हूँ
एक मैं को लाकर ,
 दूसरे  मैं को  भुला रहा हूँ
इसलिए बहुत कोशिश की है
लेकिन
कुछ समझ नहीं आ रहा है
कारण -'मैं' और 'तुम'    व्यर्थ  नहीं है
क्योंकि  इसमें  दूरी  शब्द का
बहुत व्यापक अर्थ है
और
इस शब्द से मुझे बहुत चिढ है
इसलिए तलाश कर रहा हूँ
मुझे मिला 'हम'
अब कारण -'हम ' बहुत सुंदर है
पर इसकी व्यापकता में
 मैं खो जाऊगा
तो सब व्यर्थ है
 और   दूरी फिर आएगी
और
नहीं ये सब गलत है
अब मैं तलाश नहीं करूँगा ,
'मैं'  को  पहचानने की कोशिश करूँगा
क्योंकि  मैं जब चाहूँ
इस 'मैं ' में  स्वाभिमान -अभिमान महूसस करूँगा
या फिर स्वाभिमान - अभिमान
  को मिटाकर
एक विरंचना करूँगा
इसलिए
मैं और तुम नहीं
'मैं' और हम नहीं
मैं और सिर्फ मैं
                                                        ये कविता मैंने शादी से पहले  और सगाई के बाद 1994 में लिखी थी।

Saturday, January 31, 2015

SALUTE TO MAHATMA GANDHI ON JANUARY 30

ON THIS DAY WHERE AS AN ELEVEN YR OLD GIRL HAS SHOWN COURAGE OUR LEADERS ARE COWARDS
.LEADERS NOTHING HAS TO SAY ON THIS BUT ANY POLITICS CAN BE DONE IN THE NAME OF KASHMIR.
 AND , SHAME TO HURRIYAT CHIEF SYED GEELANI ON
 HIS THIRD CLASS STATEMENT.
THESE ARE OUR SOLDIERS ON WHOM WE CAN HAVE PROUD &
 SAY TILL THE TIME THESE SOLDIERS ARE FIGHTING WE ARE SAFE FROM ISIS OR TALIBAAN.
FRIENDS , FREEDOM IS THE MOST VALUABLE & DO NOT LET PLEDGE IN THE HANDS OF
WRONG LEADERS.

Tuesday, January 27, 2015

ऐ मौत तू मुझे समझती क्या है ??????

ऐ  मौत तू मुझे डराना  चाहती ही क्यू
कभी बीमारी या फिर टेररिस्ट अटैक
या फिर हार्ट अटैक
ऐ मौत तू मुझे समझती क्या है
आम का आचर या फिर शाही पनीर
या फिर राजमा चावल या फिर कड़ी चावल
मैं  इनमें से कुछ भी नहीं हूँ
मै वो बासी कड़ी हूँ
जिसे खाकर तू उलटी कर देगी
मैं वो घीये  का जूस हूँ
जिसे पीकर तुझे श्रीसासन याद आ जाएगा
ऐ मौत तू मेरी मेहबूबा है गाने गा ,
रोमांस कर , कल का वादा है बोल और चली जा