मैं और सिर्फ मैं
मैं हूँ , या हम है
या मैं और तुम है
या सिर्फ फिर
मैं ही हूँ
बहुत कोशिश की है तलाश करने की
पर मुझे कुछ समझ
नहीं आ रहा है
और कुछ अर्थ निकलता भी दिखाई
नहीं दे रहा,
कि
'हम' है , तुम है या सिर्फ मैं हूँ
कारण -मैं और मैं से लगता है कि
मैं व्यर्थ ही, अहं को बड़ा रहा हूँ
एक मैं को लाकर ,
दूसरे मैं को भुला रहा हूँ
इसलिए बहुत कोशिश की है
लेकिन
कुछ समझ नहीं आ रहा है
कारण -'मैं' और 'तुम' व्यर्थ नहीं है
क्योंकि इसमें दूरी शब्द का
बहुत व्यापक अर्थ है
और
इस शब्द से मुझे बहुत चिढ है
इसलिए तलाश कर रहा हूँ
मुझे मिला 'हम'
अब कारण -'हम ' बहुत सुंदर है
पर इसकी व्यापकता में
मैं खो जाऊगा
तो सब व्यर्थ है
और दूरी फिर आएगी
और
नहीं ये सब गलत है
अब मैं तलाश नहीं करूँगा ,
'मैं' को पहचानने की कोशिश करूँगा
क्योंकि मैं जब चाहूँ
इस 'मैं ' में स्वाभिमान -अभिमान महूसस करूँगा
या फिर स्वाभिमान - अभिमान
को मिटाकर
एक विरंचना करूँगा
इसलिए
मैं और तुम नहीं
'मैं' और हम नहीं
मैं और सिर्फ मैं
या मैं और तुम है
या सिर्फ फिर
मैं ही हूँ
बहुत कोशिश की है तलाश करने की
पर मुझे कुछ समझ
नहीं आ रहा है
और कुछ अर्थ निकलता भी दिखाई
नहीं दे रहा,
कि
'हम' है , तुम है या सिर्फ मैं हूँ
कारण -मैं और मैं से लगता है कि
मैं व्यर्थ ही, अहं को बड़ा रहा हूँ
एक मैं को लाकर ,
दूसरे मैं को भुला रहा हूँ
इसलिए बहुत कोशिश की है
लेकिन
कुछ समझ नहीं आ रहा है
कारण -'मैं' और 'तुम' व्यर्थ नहीं है
क्योंकि इसमें दूरी शब्द का
बहुत व्यापक अर्थ है
और
इस शब्द से मुझे बहुत चिढ है
इसलिए तलाश कर रहा हूँ
मुझे मिला 'हम'
अब कारण -'हम ' बहुत सुंदर है
पर इसकी व्यापकता में
मैं खो जाऊगा
तो सब व्यर्थ है
और दूरी फिर आएगी
और
नहीं ये सब गलत है
अब मैं तलाश नहीं करूँगा ,
'मैं' को पहचानने की कोशिश करूँगा
क्योंकि मैं जब चाहूँ
इस 'मैं ' में स्वाभिमान -अभिमान महूसस करूँगा
या फिर स्वाभिमान - अभिमान
को मिटाकर
एक विरंचना करूँगा
इसलिए
मैं और तुम नहीं
'मैं' और हम नहीं
मैं और सिर्फ मैं
ये कविता मैंने शादी से पहले और सगाई के बाद 1994 में लिखी थी।
No comments:
Post a Comment