Thursday, May 29, 2014

जाने भी दो यारो !

जाने भी दो यारो यहाँ सब चलता हैं
कोई फर्क नहीं पड़ता हैं।
यहाँ सब चलता हैं।

वक़्त ने हमे सिखाया हैं कि भारत की जनता न केवल अनपढ़ हैं अपने अधिकारो को लेकर बल्कि आलस की मारी भी हैं ऐसा कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

सचाई का ये रोना रोते हैं
झूठ के दर्शन पल -पल होते हैं।
बेचारा शब्द यहाँ बेमानी हैं
बईमानी में छुपी सारी कहानी हैं।
अरे नई खोजे अमेरीका ,जापान खोजे
हम करेंगे नक़ल करके मौजे।
जीवन -मरण ,सुख -दुःख
सब ऊपर वाले के हाथ हैं
अपने हाथ में बस आये माया
या
सुकोमल काया
मैं उसी में भरपाया।


Saturday, May 17, 2014

वक़्त ठहरा हैं ?

दर्द का ही सफर हैं
बिना दर्द कहाँ कुछ
 मुझे पता हैं
बस जीना हैं
मुझे
 कुछ दर्द साथ में
जीवन भर साथ लिए
वक़्त गुजरने का
 पता ही न चला
जब तक
मैंने दामन न थामा दर्द का
अब अहसास हैं
मुझे पल पल गुजरने का।
पागलों की दुनिया में
 एक पागल की तरह
जीने का कोई मतलब नहीं यारों
दामन थाम लो
साथी बना लो
इस दर्द को
वर्ना गुजर जायेगी जिंदगी    और
अहसास न कर पाओगे के
हम ठहरे हे यहां पर और     वक़्त गुजरता जा रहा हैं
या
वक़्त ठहरा हैं संदियों से
और हम गुजरते जा रहे हैं

Monday, April 14, 2014

बहुत चले

 बहुत चले फिर बहुत देर तक रुके
फिर चले कभी-कभी
 ऐसा लगताहै
थकान  होने को  है।
पर मन अभी भरा नहीं है  
दिल तो करता है  चलूँ
 चल कर यूहीं  गुज़ार  दूँ  पूरी उम्र को
तमन्ना कोई बाकि नहीं
सिवाय इसके
कि बहुत चलूँ पर थकान कभी न हो मुझे
रब की तलाश है  मुझे
ये कहने से मुझे लगता है  डर
कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं
ये कहने से मुझे लगता है  डर।
अलबत्ता हर शख्स मुझे डराता है
इस सहमी हुई दुनिया में।
चल-चल कर मैं उतारूंगा अपने अन्दर के
बोझ को
करूँगा अपने जिस्म को हल्का  और
फिर मैं शायद पा लूँगा अपने रब को।
शायद मुझे फिर होगा इस दुनिया के हर
शख्स से प्यार।
तम्मनाए फिर शायद जाग कर पूछेंगी सवाल
कहाँ चले।


Sunday, March 16, 2014

MAHATMA GANDHI & MEDIA

 जिन लोगों को लगता है कि मीडिया को लेकर आजकल गाली दी जा रही है उनके लिए अख़बारों के बारे में गांधी जी की राय  दे रहा हूँ । 


"कोई कितना भी चिल्लाता रहे अख़बार वाले सुधरते नहीं । लोगों को भड़काकर इस प्रकार अख़बार की बिक्री बढ़ाकर कमाई करना, यह पापी तरीक़ा अख़बार वालों का है । ऐसी झूठी बातों से पन्ना भरने की अपेक्षा अख़बार बंद हो जायें या संपादक ऐसे काम करने के बजाय पेट भरने का कोई और धंधा खोज लें तो अच्छा है । "
12.2.1947- महात्मा गांधी                                 
THE SOLE AIM OF JOURNALISM SHOULD BE SERVICE.

ONE OF THE OBJECTS OF A NEWSPAPER IS TO UNDERSTAND THE POPULAR FEELING &
GIVE EXPRESSION TO IT ; ANOTHER IS TO AROUSE AMONG THE PEOPLE CERTAIN 
DESIRABLE SENTIMENTS ; AND THE THIRD IS FEARLESSLY TO EXPOSE POPULAR DEFECTS.
REFERENCE TO ABUSES IN THE STATES IS UNDOUBTEDLY A NECESSARY PART OF 
JOURNALISM  & IT IS A MEANS OF CREATING PUBLIC OPINION.
                                                                            YOUNG INDIA   2.7.1925
UNFORTUNATELY, THE NEWSPAPERS HAD BECOME MORE IMPORTANT TO THE AVERAGE
MAN THAN THE SCRIPTURES.HE WOULD FAIN ADVICE THEM TO GIVE UP READING 
NEWSPAPERS.THEY WOULD LOSE NOTHING BY SO DOING WHERE AS REAL FOOD FOR 
THEIR MINDS AND SPIRITS LAY IN THE SCRIPTURES & OTHER GOOD LITERATURE.

               THE PRESS WAS CALLED THE FOURTH ESTATE.IT WAS DEFINITELY A POWER BUT TO 
MISUSE THAT POWER WAS CRIMINAL.HE WAS A JOURNALIST HIMSELF & WOULD 
APPEAL TO FELLOW JOURNALISTS TO REALIZE THEIR RESPOSIBILITY AND TO CARRY 
ON THIER WORK WITH NO IDEA OTHER THAT OF UPHOLDING THE TRUTH.
                                                                             HARIJAN ,  27.4.47

Thursday, February 20, 2014

यहाँ सुख से सौ गुनी पीर देखी

हमने जग की अजब तस्वीर देखी                              रचित ----      कवि प्रदीप
एक हँसता हैं दस रोते हैं
 ये प्रभु की अजब जागीर देखी
हमे हँसते मुखड़े  चार मिले
 दुखिया चेहरे हजार मिले
 यहाँ सुख से सौ गुनी पीर देखी 
एक हँसता हैं दस रोते हैं
ये इसलिए सच हैं कयोंकि इस दुनिया में जानवर जायदा रहते हैं वो भी इंसानो का वेश बना कर। कुछ लोग हैं मेरे भाई दीपक जैसे इंसानियत को शर्मिन्दा करने पर तुले हुए हैं। मैं सोचता हूँ अगर वो मुझसे ऐसा सलूक कर सकते हैं तो फिर किसी और से ---
फिर मैं चारो तरफ नजर दौड़ाता हूँ तो देखता हूँ ये दुनिया रहने लायक भी बची हैं या नहीं।
झूठ , बेशर्मी  और न जाने कैसी सोच। जिस यमुना को लोग गन्दा करते हैं वही सीवर युक्त पानी का वो मथुरा
में  आचमन करते हैं।
                                                                                  -----शेष फिर !     

Saturday, February 15, 2014

एक श्रद्धांजलि अरविन्द केजरीवाल के इस्तीफ़े पर।

आज की ताजा खबर : देखिये दिल्ली विधानसभा में  बीजेपी MLA S  की अराजकता   और फिर कोसिए ,
कैसी व्वयस्था में - हमने किनको चुना था, जो लड़ते हैं  सच के खिलाफ। और जो झूठ हैं उसके साथ चुप-चाप बैठ  जाते हैं। और फिर बड़ी बेशर्मी से हँसते - हँसते टीवी के चैनल्स पर सच्चे बनने का ढोंग करते हैं। देशभक्ति के नारे लगाते हुए भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं। चाहे वो युददुरप्पा (बीजेपी) हो या राजा  हो या वीरप्पा मोइली हो
या कोई और।
आज अरविन्द केजरीवाल ने इस्तीफ़ा देकर सच की लड़ाई आगे बड़ाई हैं। बिना किसी डर के या बिना सत्ता के
लालच के  कुछ करना ये सब तो कुछ अजीब सा लगता हैं या स्वप्न लगता हैं। पर इस स्वप्न को सच कर दिखाया था अरविन्द ने।
हमे शायद आदत हो गयी हैं गन्दी व टूटी सड़को के बीच में  रहने की। रोज-रोज जाम सहने की। पुलिस की लाठी खाने की। गंदा पानी पीकर बीमार होने की। और तो और हम ये भी नहीं जानते कि जिस भ्रष्टाचार के फ्लाईओवर से रोज हम गुजरते हैं किसी दिन वो गिर जायेगा चाहे हम जितने मर्जी अमीर क्यों न हो।
जिस भ्रष्टाचार की A.C. रेल में  हम सफ़र करते हैं वो आये दिन आग में जल रही होती हैं।
इन हाई क्लास लोगो के ये नहीं मालूम कि यमुना को गन्दा रखकर वो कैंसर जैसी लाइलाज़ बिमारियों से आज घिरा हुआ हैं। और यमुना पर तो हजारों करोड़ रुपए खर्च करके भी  वो साफ़ न हो पायी। और बहुत कुछ हैं लिखने को
 पर आज इतना ही।
ये थी एक श्रद्धांजलि अरविन्द केजरीवाल के इस्तीफ़े पर।
 


Wednesday, February 12, 2014

' नायक ' अरविन्द केजरीवाल

' नायक ' अरविन्द केजरीवाल  ने आज   फ़िल्मी हीरो वाला काम किया हैं।  मुकेश अंबानी , मुरली देवड़ा और वीरपा मोइली
के खिलाफ FIR  करना एक बहुत ही साहस  वाला कार्य हैं जो एक साधारण मानव के वश का नहीं हैं।  मैं चकित हूँ कि इस इंसान को किसी का डर नहीं हैं। यहाँ भारत में ये नेता बिजनेसमैन गठजोड़ देश को बेच रहा हैं।
महंगाई बेलगाम हो कर नाक में दम कर चुकी हैं।
बात बहुत साधारण हैं जिस गैस के लिए रिलायंस ने 2 . 5 $ का एग्रीमेंट 2004 में 17 साल  के लिए किया था। वो पहले 4 . 5  $ हुई।  अब 8  $ होगी जिसका कोई सपष्टीकरण नहीं हैं। और तो और बांग्लादेश को वही गैस 2 $ पर एक्सपोर्ट होगी।  
  जाने कब अच्छे लोग हमारी राजनीति में चुने जायेंगे और मेरे भारत का भविष्य सुरक्षित होगा। मैंने पहले अपने ब्लॉग में  लिखा हैं
सच के ठेकेदार नाम से  में ---
- कि   "विचार शून्य लोग मिलकर इस धरती का भविष्य तय कर रहे हैं और यह लोग चीख रहे हैं कि यह धरती खतरे में हैं सच खतरे में हैं 'सच' खतरे में हैं ? तो पढे कुछ जीवन के कडवे सच जो हम सब की जिंदगी में रोज होते हैं पर हम उन्हे नजरअंदाज कर देते हैं यह वो सच हैं जो किसकी भी जिंदगी से जुड़े हो सकते हैं "

Sunday, February 9, 2014

माँ ओ माँ तू किथे गयी !

किसी   दी रबा माँ न मरे।
किसी  दी रबा माँ न मरे।
माँ मरे ते रिश्ते मुक जांदे ने।
माँ मरे ते सब पीछे छूट जाणदे  ने।
माँ  ओ माँ तू किथे गयी     
ओ माँ तू किथे गयी।
मैंने माँ के दिल को दुखाया
  राज ये जाना जब
अपनी माँ की अर्थी को कांधा  लगाया।
किसी दी रबा माँ न मरे।
ओ वी दिन मैं देख्या सी    जद
माँ खुद भूखी रहन्दी सी  ते
मैनु अपणे हथां नल खावन्दी सी।
बेशक मंदिर मस्जिद छोडो       ओ मैं वे  ऐ  केहना
कदी  माँ दा दिल न तोड़ो -कदी  माँ दा  दिल न तोड़ो।
इस माँ दिल विच रब रहन्दा।

Friday, January 31, 2014

AAP ---आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी  एक ऐसी पार्टी हैं जो हिंदुस्तान के  इतिहास में पहली बार बगैर  जातिवाद,बिना  ऊंचनीच  या बगैर  धर्मवाद की बाते करके सत्ता में आयी हैं।
इसमें शामिल लोग , मेधापाटेकर (नर्मदा आंदोलन ), कैप्टैन गोपीनाथ (एयर डेक्कन ), मीरा नायर (R.B.S.)
पत्रकार आशुतोष , JNU  के प्रोफेसर जैसे आनंदकुमार और चिनॉय आदि।
अरविन्द केजरीवाल ( IIT  खडगपुर ) से हैं।  और  इनकम टैक्स कमिशनर  रह चुके हैं। सूचना  के अधिकार के लिए (RTI ) MAGSAYSAY अवार्ड मिला हैं।
प्रशांत भूषण  सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं। इनके  पिताजी श्री शांति भूषण लॉ मिनिस्टर रह चुके हैं।

हिस्ट्री पड़ने से बहुत कुछ पता चलता हैं जैसे कि फ्रैंच की   क्रान्ति के  स्वरुप , पोलैंड की क्रान्ति के स्वरुप कैसे
पुनर्जन्म हुआ एक नयी पार्टी और एक नए लीडर का।

तो क्या हिंदुस्तान बदलने वाला हैं.…………… देखते हैं  या देखते रहे।
न  धर्म की  बाते होंगी ,  न  जातिवाद की।
यानि कुछ नया ?????

Wednesday, January 8, 2014

' मो सम कौन कुटिल खल कामी। '

मुझे यह वर्णन करना कुछ अजीब सा लगता हैं इन सब बातों से गुजर कर भी मैं क्योंकर विनम्र न हो पाया
ऐसा इसलिये मुझे महसूस हुआ क्योंकि आज मैं बिलकुल अकेला हूँ।  मैंने कहीं पड़ा हैं कि मनुष्य परीक्षाओं से
गुजरकर शुद्ध और नम्र बन जाता हैं। काफी कुछ गुजर चुका।  हम नफरत की ज्वाला में फंसे हुए असहाय प्राणी हैं।   यहाँ पर मुझे सूरदास की पंक्ति याद आ रही हैं -
       
                        '   मो सम कौन कुटिल खल कामी। '   ये आत्मग्लानि और निराशा के स्वर में उनकी पीड़ा थी जिसमे  हम  सबकी हामी हैं।