Tuesday, April 21, 2020

मौन!

मौन ख़ुद में एक कष्टसाध्य साधना है, जो अंतर्मुखता पैदा करती और भीतर की ओर झाँक देखने की सहूलियतें हमें देती है. कई मर्तबा तो वाचालता की अपेक्षा मौन का प्रभाव कहीं गहरे से पड़ते देखा गया है. मौन से दुरूह कार्य भी सहज बन जाते हैं जब कि वाचालता से बिगाड़ की संभावना अधिक रहती है. मौन से हमारी क्रियात्मकशक्ति भी बढ़ती है और अबाध रूप से हम इसके बल पर अनथक देर तक कार्यों में जुटे रह सकते हैं. गहन मौन से छनकर जो सृजन निकलता है, वह अपनेआपमें न सिर्फ़ नायाब बल्क़ि कालातीत भी होता है. अनूठा और बेजोड़. मानसिक स्वास्थ्य के लिये प्रतिदिन हमें मौन की साधना करनी ही चाहिए. रोज़ कुछ घंटे बिना बोले बितायें और तब मानसिक स्मरण करें.। 

Saturday, March 21, 2020

CORONA? कुछ - कुछ है जो हम सब में है!

A Thought - - - About Death and life!

"But in reality one could say, at this moment, in the middle of March , the CORONA have covered everything. There is no longer any individual destinies.
that is the CORONA is pandemic and feelings shared by all.
 these are feelings of separation and exile with all that
involved of fear and rebellion."

बीबीसी के सौतिक विश्वास की एक रिपोर्ट के अनुसार 1918 में भारत में फ्लू का संक्रमण हुआ था। करीब दो करोड़ लोग मारे गए थे।
2020 के साल में कोरोना वायरस के कारण मुल्क के मुल्क घरों में बंद किए जा रहे हैं। सामाजिक प्राणी को सामाजिक दूरी का पाठ पढ़ाया जा रहा है। मृत्यु के आंकड़ों के बीच उसके भयावह हो जाने की आशंका इतनी है कि संक्रमण के शिकार लोगों का आंकड़ा भी मरे हुए लोगों का आंकड़ा नज़र आ रहा है। जिसे कोरोना हो गया है।

अफरा-तफरी मची है और इसी के बीच लापरवाही या बेपरवाही का दौर भी उसी खुशनुमा हवा की तरह शहरों में चल रहा है।

कि कोरोना वायरस हमें आने वाले दिनों में किस तरह से उदासीन कर देगा। हम हर चीज़ से उदासीन हो जाएंगे। यहां तक कि उदास होने की प्रवृत्ति से भी। मरने वाले लोगों का आंकड़ा बड़ा होकर छोटा नज़र आने लगेगा। राष्ट्राध्यक्षों की शुरूआती बेपरवाही का कोई मतलब नहीं है

 एक शहर है। Corona से घिर जाता है। शुरू में लोगों का जीवन सामान्य रहता है। वे मरने वाले आंकड़ों से ख़ुद को महफूज़ समझते हैं। जैसे हीCorona महामारी का एलान होता है मुर्दों को दफ़नाने की रस्मी औपचारिकताएं छोड़ दी जाती हैं। सारी कोशिश होती है किसी तरह दफ़ना दिए जाएं। सूचना का कोई मतलब नहीं रह जाता है। एक शहर जो मरने वाला है, मर रहा है, उसके भीतर ज़िंदा लोगों की दास्तां हैंCorona । तब आप इटली के मिलान और चीन के वुहान के बंद होने के मर्म को समझ सकते हैं।


- सब जानते हैं कि दुनिया में बार-बार महामारियां फैलती रहती हैं। लेकिन जब नीले आसमान को फाड़कर कोई महामारी हमारे सिर पर आ टूटती है तब न जाने क्यों हमें उस पर विश्वास करने में कठिनाई होती है। इतिहास में जितने बार युद्ध लड़े गए हैं उतनी ही बार महामारी भी फैली है। फिर भी महामारी हो या युद्ध दोनों ही जैसे लोगों को बिना चेतावनी दिए आ पकड़ते हैं।

- लेकिन अगले चार दिनों में ही बुखार में चौंकाने वाले नगरवासी अब तक नुक्ताचीनी करके अपनी घबराहट को छिपाते आए थे लेकिन अब जैसे उनकी बोलती बंद हो गई थी और वे उदास चेहरे लिए अपने कामों पर जा रहे थे।

- फिर एकाएक मौतों की संख्या एकदम बढ़ गई “ तो अब लगता है कि लोग भी घबरा उठे हैं-आख़िरकार। महामारी फैलने की घोषणा कर दो। शहर के फाटक बंद कर दो।"

- कोई भी हमेशा के लिए प्यार नहीं करता। पर ऐसा वक्त आया जब मुझे ‘? 'को अपने साथ रखने के लिए कुछ शब्द कहने चाहिए थे। लेकिन मैं उन शब्दों को ढूंढ न सका।
- इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि Corona ने धीरे धीरे हम सबमें न सिर्फ प्यार की बल्कि दोस्ती की क्षमता ख़त्म कर दी थी। यह स्वाभाविक ही था क्योंकि प्यार भविष्य की मांग करता है और हमारे पास वर्तमान के क्षणों की पंक्ति के सिवा कुछ नहीं बच रहा था।

- - क्या सचमुच नकाब बांधने से कोई फायदा होगा? - “नहीं”, लेकिन दूसरों में विश्वास पैदा होता है।

- इस बात से इनकार न करते हुए भी डॉक्टर ने कहा कि भविष्य अनिश्चित है। इतिहास यह साबित करता है कि महामारियां अनायास ही फिर ज़ोर पकड़ लेती हैं जबकि उनके ज़ोर पकड़ने की कोई उम्मीद नहीं होती। 

Friday, January 24, 2020

सच में! शोर से!


समय के साथ ??
समय के साथ बदलती
धारणाएं
समय साक्षी है
स्वयं
  मौन सत्य के असत्य मे
परिवर्तन का
और
चिल्लाते शोर मे बोले गये
झूठ का सच मे बदल जाना
आँधियाँ चलने से
 आँखों में मिट्टी समा गयी
और
दृश्य अदृश्य हो गया।
खाली बैठने से कुछ न होगा
लड़ पड़ो झूझ जाना पड़ता है
ये सर्वविदित है।
परन्तु
आज समय बदल गया है
लड़कर मर कर  कभी कुछ
नहीं बदल सकता।
अभिमन्यु के मरने पर कुछ न बदला
हाँ , अर्जुन ने मारा निहथ्ये कर्ण को
तो सब कुछ बदल गया।
चिल्लाने से अगर झूठ मर जाये
 तो मारो।
 मारकर जीत सको तो
जीतो।
वरना चुपचाप बैठकर समय के निर्णय
से सहमति अनिवार्य है।

Wednesday, November 20, 2019

कहानी एक राजा की!



एक राजा के दरबार मे एक अजनबी इंसान नौकरी मांगने के लिए आया.
उससे उसकी क़ाबलियत पूछी गई,  तो वो बोला,  "मैं आदमी हो चाहे जानवर, शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ. राजा ने उसे अपने खास "घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज" बना दिया. चंद दिनों बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा,  उसने कहा, "नस्ली नही हैं."
राजा को हैरानी हुई, उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा... उसने बताया, घोड़ा नस्ली तो हैं, पर इसकी पैदायश पर इसकी मां मर गई थी, ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला है. राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा, "तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं ?"   उसने कहा, "जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता हैं. राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ, उसने नौकर के घर अनाज, घी, मुर्गे और अंडे बतौर इनाम भिजवा दिए.
और उसे रानी के महल में तैनात कर दिया. चंद दिनो बाद, राजा ने उस से रानी के बारे में राय मांगी, उसने कहा, "तौर तरीके तो रानी जैसे हैं लेकिन पैदाइशी नहीं हैं."
राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, उसने अपनी सास को बुलाया, मामला उसको बताया, सास ने कहा, "हक़ीक़त ये हैं, कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी 6 माह में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया."
राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा "तुम को कैसे पता चला ?" उसने कहा, "रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा हैं. एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता हैं, जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही."
राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ और बहुत से अनाज, भेड़ बकरियां बतौर इनाम दीं. साथ ही उसे अपने दरबार मे तैनात कर दिया. कुछ वक्त गुज़रा, राजा ने फिर नौकर को बुलाया, और अपने बारे में पूछा.
नौकर ने कहा "जान की सलामती हो तो कहूँ." राजा ने वादा किया.
उसने कहा, "न तो आप राजा के बेटे हो और न ही आपका चलन राजाओं वाला है." राजा को बहुत गुस्सा आया, मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था, राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा.
मां ने कहा, "ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हे गोद लेकर हम ने पाला." राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा, बता "तुझे कैसे पता चला ?"
उसने कहा, "जब राजा किसी को "इनाम दिया करते हैं, तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं....लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं. ये रवैया किसी राजाओं का नही,  किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है."
किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा हैं. इंसान की असलियत की पहचान उसके व्यवहार और उसकी नियत से होती हैं...
इसीलिए  "चाय" बेचने वाले की सोच, "पकौड़े" बेचने से ऊपर नही उठ सकती. हैसियत बदल जाती है, पर सोच नही.

Thursday, October 31, 2019

.#VIbes!

#ThursdayVibes!
A DAY END UP WITH
A DAY START UP WITH VERY INTERSTING MORNING & ENDS WITH A PROMISE

OF BRIGHT TOMORROW.SO,LIFE IS A BEAUTIFUL LIVE.

THINGS ARE HAPPENING AROUND US VERY FASTLY BUT WE MOVE SLOWLY.INFACT

SOMETIMES WE EVEN DON'T MOVE AT ALL.THIS IS TYPICAL INDIAN CULTURE

WHERE WE PROUD OF SO MANY NON SENSIBLE THINGS.BUT WE DON'T ALLOW OUR

MINDS TO STRUGGLE WITH BAD IDEAS & ALLOW GOOD IDEAS TO ENTER.WE BELIEVE

IN RELATIONS BUT WE DON'T RESPECT RELATIONS AT ALL.WE BELIEVE IN

SOCIALISM BUT WE DON'T LIKE GOOD SOCIAL THINGS.WE BELIEVE IN GOD BUT WE

WORSHIP MONEY.ABOVE ALL WE USE INTERNET,MOBILES,AEROPLANES & OTHER

HITECH THINGS BUT WE DON'T BELIEVE ON SCIENCE.WE DON'T BELIEVE ON

SCIENTIFIC ANALYSIS OF ANY DISEASE.

THAT'S WHY A DAY STARTS WITH GOODMORNING,THEN GOES THROUGH

STRANGEFUL EVENTS SOMETIMES DIFFICULT TO BELIEVE BUT ONE IS USED OF IT.

Sunday, October 6, 2019

आरे के पेड़ - रवीश कुमार - एनडीटीवी / Ravish Kumar - NDTV

रात भर पेड़ों की हत्या होती रही, रात भर जागने वाली मुंबई सोती रही

इलाक़े में धारा-144 लगी थी। मुंबई के आरे के जंगलों में जाने वाले तीन तरफ़ के रास्तों पर बैरिकेड लगा दिए गए थे। ठीक उसी तरह से जैसे रात के अंधेरे में किसी इनामी बदमाश या बेगुनाह को घेर कर पुलिस एनकाउंटर कर देती है, शुक्रवार की रात आरे के पेड़ घेर लिए गए थे। उन पेड़ों को भरोसा होगा कि भारत की परंपरा में शाम के बाद न फूल तोड़े जाते हैं और न फल। पत्तों को तोड़ना तक गुनाह है। वो भारत अब इन पेड़ों का नहीं है, विकास का है जिससे एक प्रतिशत लोगों के पास सत्तर प्रतिशत लोगों के बराबर की संपत्ति जमा होती है। पेड़ों को यह बात मालूम नहीं थी। उन्होंने देखा तक नहीं कि कब आरी चल गई और वे गिरा दिए गए। इसे पेड़ों को काटना नहीं पेड़ों की हत्या कहा जाना चाहिए।

यह न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है। मामला सुप्रीम कोर्ट में था तो कैसे पेड़ काटे गए। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में मामला था तो पेड़ कैसे काटे गए। क्या अब से फांसी की सज़ा हाईकोर्ट के बाद ही दे दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में अपील का कोई मतलब नहीं रहेगा? वहां चल रही सुनवाई का इंतज़ार नहीं होगा? आरे के पेड़ों को इस देश की सर्वोच्च अदालत का भी न्याय नहीं मिला। उसके पहले ही वे काट दिए गए। मार दिए गए।
 
हत्या का सबूत न बचे, मीडिया को जाने से रोक दिया गया। इन 2000 पेड़ों को बचाने निकले नौजवानों को जाने से रोक दिया गया। पूरी रात पेड़ काटे जाते रहे। पूरी रात मुंबई सोती रही। उसके लिए मुंबई नाम की फिल्म का नाइट शो ख़त्म हो चुका था। यह उस शहर का हाल है जो रात भर जागने की बात करता है। जो राजनीतिक दल के नेता पर्यावरण पर भाषण देकर जंगलों और खदानों के ठेके अपने यारों को देते हैं वो बचाने नहीं नहीं दौड़े। वे ट्विट कर नाटक कर रहे थे। बचाने के लिए निकले नौजवान। पढ़ाई करने वाले या छोटी मोटी नौकरियां करने वाले। पैसे वाले जिन्हें कभी मेट्रो से चलना नहीं है, वो ट्विटर पर मेट्रो के आगमन का  विकास की दीवाली की तरह स्वागत कर रहे थे।

यह नया नहीं है। 4 अक्तूबर के इंडियन एक्सप्रेस में वीरेंद्र भाटिया की रिपोर्ट आप ज़रूर पढ़ें। ऐसी रिपोर्ट किसी हिन्दी अख़बार में नहीं आ सकती। गुरुग्राम रेपिड मेट्रो के दो चरणों के लिए विकास के कैसे दावे किए गए होंगे ये आप 2007 के आस-पास के अखबारों को निकाल कर देख सकते हैं। फिर 4 सितंबर 2019 वाली ख़बर पढ़िए। आपसे क्या कहा जाता है, क्या होता है और इसके बीच कौन पैसे बनाता है, इसकी थोड़ी समझ बेहतर होगी।

आई ए एस अफसर अशोक खेमका ने हरियाणा के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है कि हरियाणा सहकारी विकास प्राधिकरण, जो बाद में हुडको बना, उसके अफसरों ने डीएलएफ और आई एल एफ एस कंपनी और बैंकों के साथ मिलीभगत कर झूठे दावे किए और सरकार से रियायतें लीं और बहुत मुनाफा कमाया। इसके लिए डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट में दावा किया गया कि हर दिन 6 लाख यात्री चलेंगे। जबकि 50,000 भी नहीं चल रहे हैं। मेट्रो आर रही है, मेट्रो आ रही है के नाम पर मेट्रो लाइन के किनारे रीयल स्टेट कंपनियों के भाव आसमान छूने लगे। बैंक से इस कंपनी को लोन दिलाए गए। अब मेट्रो बंद होने के कगार पर है और वापस हरियाणा सरकार उसे 3771 करोड़ में लेने जा रही है। जनता का पैसा कितना बर्बाद हुआ। धरती का पर्यावरण भी। ठीक है कि हर मेट्रो के साथ नहीं हुआ मगर एक के साथ हुआ है तो क्या गारंटी कि दूसरे के साथ ऐसा नहीं हुआ होगा। 

मुंबई के बड़े लोग इसलिए चुप रहे। उन्हें पता है कि संसाधनों की लूट का मामल किस किस में बंटेगा। उस मुंबई में जुलाई 2005 की बारिश में 1000 से अधिक लोग सड़कों पर डूब कर मर गए थे। सबको पता है कि मैंग्रोव के जंगल साफ हो गए। मीठी नदी भर दी गई इसलिए लोग मरे हैं। मगर मुंबई 4 सितंबर की रात सोती रही।

29 लोग गिरप्तार हुए हैं। 23 पुरुष हैं और 6 लड़कियां हैं। इनके ख़िलाफ़ बेहद सख़्त धाराएं लगाई गईं हैं। जिनमें 5 साल तक की सज़ा हो सकती है। आरोप है कि इन लोगों ने बिना किसी प्रमाण और अनुमति के पेड़ों के काटने का विरोध किया। प्रदर्शन किया। इस तरह सरकारी कर्मचारी के कर्तव्य निर्वाहन में बाधा डाली। 28 साल की अनिता सुतार पर आरोप लगाया गया है कि उन पर कांस्टेबल इंगले को मारा है। इन पर 353, 332, 143, 141 लगा है। 181य19 लगा है। 353 ग़ैर ज़मानती अपराध है। किसी सरकारी कर्मचारी को कर्तव्य निर्वाहन से रोकने पर लगता है।

गिरफ्तार किए गए दो छात्र टाटा इंस्टिट्यूट आफ सोशल साइंस के हैं। दोनों एक्सेस टू जस्टिस में मास्टर्स कर रहे हैं। इनमें से एक आरे के जंगलों पर थीसीस लिख रहा था। इसलिए उसे मौके पर होना ही था। दोनों को अब पुलिस सुरक्षा में इम्तहान देना होगा। विश्व गुरु भारत में यह बात किसी नॉन रेज़िडेंट इंडियन को मत बताइयेगा। वह इस वक्त हर तरह के झूठ के गर्व में डूबा हुआ है। ऐसी जानकारियां उसके भीतर शर्म पैदा कर सकती हैं। भारत के लोगों को तो क्या ही फर्क पड़ेगा। जब जंगल के जंगल काट लिए गए तब कौन सा शहर रो रहा था।

29 लोग सिर्फ संख्या नहीं हैं। इनके नाम हैं। वे आज के सुंदर लाल बहुगुणा है। चंडीप्रसाद भट्ट हैं। मैं सबके नाम लिख रहा हूं। अनिता, मिंमांसा सिंह, स्वपना ए स्वर, श्रुति माधवन, सोनाली आर मिलने, प्रमिला भोयर।  कपिलदीप अग्रवाल, श्रीधर, संदीप परब, मनोज कुमार रेड्डी, विनीथ विचारे, दिव्यांग पोतदार, सिद्धार्थ सपकाले, विजयकुमार मनोहर कांबले, कमलेश सामंतलीला,नेल्सन लोपेश, आदित्य राहेंद्र पवार, द्वायने लसराडो, रुहान अलेक्जेंड्र, मयूर अगारे, सागर गावड़े, मनन देसाई, स्टिफन मिसल, स्वनिल पवार, विनेश घावसालकर, प्रशांत कांबले, शशिकांत सोनवाने, आकाश पाटनकर, सिद्धार्थ ए, सिद्धेश घोसलकर।

नाम इसलिए नहीं दे रहा कि इसे पढ़कर यूपी बिहार के नौजवान जाग जाएंगे या उनमें चेतना का संचार होगा। जब मुंबई नहीं जागी तो फिर किसकी बात की जाए। ये नाम मैंने इसलिए दिए क्योंकि पर्यावरण पर अक्सर परीक्षा में निबंध आते हैं, जिसमे आप झूठ लिखकर अफसर बन जाते हैं और फिर पर्यावरण को बचाने वाले पर केस करते हैं। तो खाली पन्ना भरने में अगर ये नाम काम आ सके तो ये भी बहुत है। हैं न।

Thursday, September 19, 2019

My son Keshav

Dear Keshav,
It was exactly 24 years ago , just sitting outside Jeevan nursing home  I had no idea how to react.there was an Innocent smile on my face.There were plenty of reasons but behind these plenty of reasons news related to you was the main this I was sure then and confirmed the same in coming days/years.month on month and year on year whenever i see my self in the mirror i find my inner sense more and more clear .
 More money or less money does not make a man perfect .it is the way of thinking it is way of living a life which segregates you from rest of the world .and,world is what, A noise   in which if you are sitting idle and peaceful.you are among the very few successful person of this world
.For me ,who has experience of zero universe and as I see --,sometimes we forget our identity and believe more on others but all this happens for a very short period . what you are, others don't know but I know your spiritual world is so much powerful that once it is on your front, for you success in any terminology will not matter at all .
I know now-a-days i have lost confidence on myself but believe me  these physical pains are my weaknesses which gives the wrong impression .I believe if Einstein  and Ramanujan were part of our history then  youth like you will be future icon of this world. And,with this my summation will be on this that simple mistakes are avoidable and big mistake creates blunders.
A wise man takes third route!.
#PauloCoelho
“The soul is invisible. 
An angel is invisible.
The wind is invisible. 
 Thoughts are invisible.
And yet, with sensitivity 
you can see the soul, 
 you can guess the angel, 
you can feel the wind, 
you can change the world 
 with 
only a few thoughts.”

Thursday, July 25, 2019

#SwamiVivekananda!

#SwamiVivekananda!
धर्म का अर्थ है प्रत्यक्ष अनुभूति। इसलिए इस अपरोक्ष अनुभूति और थोथी बात के बीच जो विशेष भेद है ,उसे हमें अच्छी तरह पकड़ लेना चाहिए। इस  संबंध में सहज बुद्धि जितनी अ-सहज (दुर्लभ ) है ,उतनी और कोई वस्तु नहीं।
हम अपनी वर्तमान प्रकृति से सीमित हो ईश्वर  को केवल मुनष्य रूप में ही देख सकते हैं। मान लो , भैंसों की इच्छा भगवान की उपासना करने की हो- तो वे अपने स्वभाव के अनुसार भगवान को एक बड़े भैंसे के रूप में
देखेंगे। यदि एक मछली भगवान की उपासना करना चाहे तो उसे भगवान को एक बड़ी मछली के रूप में सोचना होगा। यह न सोचना कि ये सब विभिन्न धारणाएं केवल विकृत कल्पनाओं से उत्पनं हुई हैं। मुनष्य ,भैंसा ,मछली -ये सब मानों भिन्न -भिन्न बरतन हैं ; ये सब बरतन अपनी -अपनी आकृति और जल-धारण शक्ति के अनुसार ईश्वर रूपी समुद्र के पास अपने को भरने के लिए जाते हैं। पानी मुनष्य में मुनष्य का रूप ले लेता है , भैंसे में भैंसे का और मछली में मछली का। प्रत्येक बरतन में वही ईश्वररूपी समुद्र का जल है।

तो हे भगवन्! - - -

तो हे भगवन्! अब कब आओगे?

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

शब्दार्थ-
मै प्रकट होता हूं, मैं आता हूं, जब जब धर्म की हानि होती है, तब तब मैं आता हूं, जब जब अधर्म बढता है तब तब मैं आता हूं, सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मै आता हूं, दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूं, धर्म की स्थापना के लिए में आता हूं और युग युग में जन्म लेता हूं।

आदमी!


आदमी हँसता है, दुःख-दर्द सभी में आदमी हँसता है; जैसे हँसते-हँसते आदमी की  प्रसन्नता थक जाती है वैसे ही कभी-कभी रोते-रोते आदमी की उदासी थक जाती है, और आदमी करवट बदलता है; ताकि हँसी की छाह में कुछ विश्राम कर फिर वह आँसुओ की कड़ी धूप मे चल सके।