#SwamiVivekananda!
धर्म का अर्थ है प्रत्यक्ष अनुभूति। इसलिए इस अपरोक्ष अनुभूति और थोथी बात के बीच जो विशेष भेद है ,उसे हमें अच्छी तरह पकड़ लेना चाहिए। इस संबंध में सहज बुद्धि जितनी अ-सहज (दुर्लभ ) है ,उतनी और कोई वस्तु नहीं।
हम अपनी वर्तमान प्रकृति से सीमित हो ईश्वर को केवल मुनष्य रूप में ही देख सकते हैं। मान लो , भैंसों की इच्छा भगवान की उपासना करने की हो- तो वे अपने स्वभाव के अनुसार भगवान को एक बड़े भैंसे के रूप में
देखेंगे। यदि एक मछली भगवान की उपासना करना चाहे तो उसे भगवान को एक बड़ी मछली के रूप में सोचना होगा। यह न सोचना कि ये सब विभिन्न धारणाएं केवल विकृत कल्पनाओं से उत्पनं हुई हैं। मुनष्य ,भैंसा ,मछली -ये सब मानों भिन्न -भिन्न बरतन हैं ; ये सब बरतन अपनी -अपनी आकृति और जल-धारण शक्ति के अनुसार ईश्वर रूपी समुद्र के पास अपने को भरने के लिए जाते हैं। पानी मुनष्य में मुनष्य का रूप ले लेता है , भैंसे में भैंसे का और मछली में मछली का। प्रत्येक बरतन में वही ईश्वररूपी समुद्र का जल है।
धर्म का अर्थ है प्रत्यक्ष अनुभूति। इसलिए इस अपरोक्ष अनुभूति और थोथी बात के बीच जो विशेष भेद है ,उसे हमें अच्छी तरह पकड़ लेना चाहिए। इस संबंध में सहज बुद्धि जितनी अ-सहज (दुर्लभ ) है ,उतनी और कोई वस्तु नहीं।
हम अपनी वर्तमान प्रकृति से सीमित हो ईश्वर को केवल मुनष्य रूप में ही देख सकते हैं। मान लो , भैंसों की इच्छा भगवान की उपासना करने की हो- तो वे अपने स्वभाव के अनुसार भगवान को एक बड़े भैंसे के रूप में
देखेंगे। यदि एक मछली भगवान की उपासना करना चाहे तो उसे भगवान को एक बड़ी मछली के रूप में सोचना होगा। यह न सोचना कि ये सब विभिन्न धारणाएं केवल विकृत कल्पनाओं से उत्पनं हुई हैं। मुनष्य ,भैंसा ,मछली -ये सब मानों भिन्न -भिन्न बरतन हैं ; ये सब बरतन अपनी -अपनी आकृति और जल-धारण शक्ति के अनुसार ईश्वर रूपी समुद्र के पास अपने को भरने के लिए जाते हैं। पानी मुनष्य में मुनष्य का रूप ले लेता है , भैंसे में भैंसे का और मछली में मछली का। प्रत्येक बरतन में वही ईश्वररूपी समुद्र का जल है।
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