Saturday, March 21, 2020

CORONA? कुछ - कुछ है जो हम सब में है!

A Thought - - - About Death and life!

"But in reality one could say, at this moment, in the middle of March , the CORONA have covered everything. There is no longer any individual destinies.
that is the CORONA is pandemic and feelings shared by all.
 these are feelings of separation and exile with all that
involved of fear and rebellion."

बीबीसी के सौतिक विश्वास की एक रिपोर्ट के अनुसार 1918 में भारत में फ्लू का संक्रमण हुआ था। करीब दो करोड़ लोग मारे गए थे।
2020 के साल में कोरोना वायरस के कारण मुल्क के मुल्क घरों में बंद किए जा रहे हैं। सामाजिक प्राणी को सामाजिक दूरी का पाठ पढ़ाया जा रहा है। मृत्यु के आंकड़ों के बीच उसके भयावह हो जाने की आशंका इतनी है कि संक्रमण के शिकार लोगों का आंकड़ा भी मरे हुए लोगों का आंकड़ा नज़र आ रहा है। जिसे कोरोना हो गया है।

अफरा-तफरी मची है और इसी के बीच लापरवाही या बेपरवाही का दौर भी उसी खुशनुमा हवा की तरह शहरों में चल रहा है।

कि कोरोना वायरस हमें आने वाले दिनों में किस तरह से उदासीन कर देगा। हम हर चीज़ से उदासीन हो जाएंगे। यहां तक कि उदास होने की प्रवृत्ति से भी। मरने वाले लोगों का आंकड़ा बड़ा होकर छोटा नज़र आने लगेगा। राष्ट्राध्यक्षों की शुरूआती बेपरवाही का कोई मतलब नहीं है

 एक शहर है। Corona से घिर जाता है। शुरू में लोगों का जीवन सामान्य रहता है। वे मरने वाले आंकड़ों से ख़ुद को महफूज़ समझते हैं। जैसे हीCorona महामारी का एलान होता है मुर्दों को दफ़नाने की रस्मी औपचारिकताएं छोड़ दी जाती हैं। सारी कोशिश होती है किसी तरह दफ़ना दिए जाएं। सूचना का कोई मतलब नहीं रह जाता है। एक शहर जो मरने वाला है, मर रहा है, उसके भीतर ज़िंदा लोगों की दास्तां हैंCorona । तब आप इटली के मिलान और चीन के वुहान के बंद होने के मर्म को समझ सकते हैं।


- सब जानते हैं कि दुनिया में बार-बार महामारियां फैलती रहती हैं। लेकिन जब नीले आसमान को फाड़कर कोई महामारी हमारे सिर पर आ टूटती है तब न जाने क्यों हमें उस पर विश्वास करने में कठिनाई होती है। इतिहास में जितने बार युद्ध लड़े गए हैं उतनी ही बार महामारी भी फैली है। फिर भी महामारी हो या युद्ध दोनों ही जैसे लोगों को बिना चेतावनी दिए आ पकड़ते हैं।

- लेकिन अगले चार दिनों में ही बुखार में चौंकाने वाले नगरवासी अब तक नुक्ताचीनी करके अपनी घबराहट को छिपाते आए थे लेकिन अब जैसे उनकी बोलती बंद हो गई थी और वे उदास चेहरे लिए अपने कामों पर जा रहे थे।

- फिर एकाएक मौतों की संख्या एकदम बढ़ गई “ तो अब लगता है कि लोग भी घबरा उठे हैं-आख़िरकार। महामारी फैलने की घोषणा कर दो। शहर के फाटक बंद कर दो।"

- कोई भी हमेशा के लिए प्यार नहीं करता। पर ऐसा वक्त आया जब मुझे ‘? 'को अपने साथ रखने के लिए कुछ शब्द कहने चाहिए थे। लेकिन मैं उन शब्दों को ढूंढ न सका।
- इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि Corona ने धीरे धीरे हम सबमें न सिर्फ प्यार की बल्कि दोस्ती की क्षमता ख़त्म कर दी थी। यह स्वाभाविक ही था क्योंकि प्यार भविष्य की मांग करता है और हमारे पास वर्तमान के क्षणों की पंक्ति के सिवा कुछ नहीं बच रहा था।

- - क्या सचमुच नकाब बांधने से कोई फायदा होगा? - “नहीं”, लेकिन दूसरों में विश्वास पैदा होता है।

- इस बात से इनकार न करते हुए भी डॉक्टर ने कहा कि भविष्य अनिश्चित है। इतिहास यह साबित करता है कि महामारियां अनायास ही फिर ज़ोर पकड़ लेती हैं जबकि उनके ज़ोर पकड़ने की कोई उम्मीद नहीं होती। 

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