Thursday, July 25, 2019

#SwamiVivekananda!

#SwamiVivekananda!
धर्म का अर्थ है प्रत्यक्ष अनुभूति। इसलिए इस अपरोक्ष अनुभूति और थोथी बात के बीच जो विशेष भेद है ,उसे हमें अच्छी तरह पकड़ लेना चाहिए। इस  संबंध में सहज बुद्धि जितनी अ-सहज (दुर्लभ ) है ,उतनी और कोई वस्तु नहीं।
हम अपनी वर्तमान प्रकृति से सीमित हो ईश्वर  को केवल मुनष्य रूप में ही देख सकते हैं। मान लो , भैंसों की इच्छा भगवान की उपासना करने की हो- तो वे अपने स्वभाव के अनुसार भगवान को एक बड़े भैंसे के रूप में
देखेंगे। यदि एक मछली भगवान की उपासना करना चाहे तो उसे भगवान को एक बड़ी मछली के रूप में सोचना होगा। यह न सोचना कि ये सब विभिन्न धारणाएं केवल विकृत कल्पनाओं से उत्पनं हुई हैं। मुनष्य ,भैंसा ,मछली -ये सब मानों भिन्न -भिन्न बरतन हैं ; ये सब बरतन अपनी -अपनी आकृति और जल-धारण शक्ति के अनुसार ईश्वर रूपी समुद्र के पास अपने को भरने के लिए जाते हैं। पानी मुनष्य में मुनष्य का रूप ले लेता है , भैंसे में भैंसे का और मछली में मछली का। प्रत्येक बरतन में वही ईश्वररूपी समुद्र का जल है।

तो हे भगवन्! - - -

तो हे भगवन्! अब कब आओगे?

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

शब्दार्थ-
मै प्रकट होता हूं, मैं आता हूं, जब जब धर्म की हानि होती है, तब तब मैं आता हूं, जब जब अधर्म बढता है तब तब मैं आता हूं, सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मै आता हूं, दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूं, धर्म की स्थापना के लिए में आता हूं और युग युग में जन्म लेता हूं।

आदमी!


आदमी हँसता है, दुःख-दर्द सभी में आदमी हँसता है; जैसे हँसते-हँसते आदमी की  प्रसन्नता थक जाती है वैसे ही कभी-कभी रोते-रोते आदमी की उदासी थक जाती है, और आदमी करवट बदलता है; ताकि हँसी की छाह में कुछ विश्राम कर फिर वह आँसुओ की कड़ी धूप मे चल सके।

Thursday, July 18, 2019

लक्ष्मणझूला सेतु --------------------



हां, मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं! मैं अब बूढ़ा हो चला हूं।  लेकिन मैं इतना  कमजोर भी नहीं की  मृत्यु के आगे  नतमस्तक हो जाऊं...। मैं महाभारत के भीष्म की वह प्रतिज्ञा हूं, जो रणभूमि में बाणों की शैय्या पर लेटे हुए भी मृत्यु को अपने बस में कर सकता हूं। मैं महर्षि दधीचि हूं, जो अपनी प्राण शून्यता के बाद भी अपनी हड्डियों से बज्र का निर्माण कर सकता हूं। मैं हाड मांस का इंसान जैसा पुतला नहीं, जो छित, जल, पावक, गगन ओर समीर में विलय हो जाऊं। मैं फौलाद से गढ़ा गया हूं और कभी मिट भी गया तो फौलाद ही रहूंगा। भविष्य में मेरे कण-कण से भी फौलाद ही निर्मित होगा। मैं जड़ हूं लेकिन चेतनशून्य नहीं, मैं आदि भी हूं और अनंत भी। भौतिक रूप से मेरा ओर-छोर तुम भले ही देख पा रहे हों, लेकिन मेरी जड़ें भूतल में भी गहरी गढ़ी हैं, जो शायद किसी को नजर ना आए। मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों हूं। मैंने इस देश, प्रदेश और शहर के कई कालखंड जिए हैं। मैं एक भरपूर सदी हूं, जो अपने आप में एक संपूर्ण इतिहास है। मैं लक्ष्मण झूला सेतु हूं, जो अब बूढा हो चला हूं...।
एक बूढ़े और जर्जर हो चुके लक्ष्मणझूला सेतु को आपने पिछले खंड में कितनी संजीदगी के साथ पढ़ा और जिया...। मैं वास्तव में अब अपनी सार्थकता पर गर्व महसूस कर रहा हूं। मेरे पास शब्द नहीं है कि मैं किस रूप में आपका शुक्रिया अदा करूं। मैं बेशक बूढ़ा हो चला हूं, लेकिन आप लोगों के प्रेम और स्नेह ने मेरे अंदर फिर से एक अजीब सी स्फूर्ति और ताजगी ला दी है...। अब मुझे लग रहा है कि मैं यूं ही खामोशी के साथ विदाई नहीं लूंगा, बल्कि आपके साथ उस एक सदी का अनुभव साझा करके जाऊंगा जिसे मैंने जिया और महसूस किया है।
    जिस दिन से मुझे पता चला कि मेरे भीतर कई बीमारियां हैं, जो मुझे खोखला कर करती जा रही हैं और लोग मुझे असुरक्षित बताने लगे हैं। तबसे वास्तव में मैं भी यह महसूस करने लगा हूं कि अब मैं बूढा हो चला हूं...। दोस्तों जैसे आप लोगों की सेहत की देखभाल के लिए एम्स और पीजीआई जैसे चिकित्सा संस्थान बने हैं, ठीक वैसे ही मेरे सेहत की जांच के लिए भी आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थान हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आपको अपनी जांच के लिए इन संस्थानों का रुख करना पड़ता है और मैं इस बुढ़ापे में भी अपनी जगह अटल, बेफिक्र और निश्चिंत रहता हूं। जिसे मेरी जांच करनी होगी वह स्वयं चलकर मेरे पास आएगा। मुझे पता है मेरी तरह आप अपने डॉक्टर को यह कहने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाओगे की, डॉक्टर बेटे, तू आ और मेरे सेहत की जांच कर... एक बार नहीं कई बार कर...। यह सबसे बड़ा फर्क है जो मुझे आप जैसी आम जिंदगी से अलग लक्ष्मणझूला सेतु बनाता है। मैं यह सब इसलिए बेबाकी से कह रहा हूं कि अब कोई डॉक्टर, इंजीनियर मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन आपको बता रहा हूं कि अपने डॉक्टर के साथ ऐसा मजाक कभी मत करना। बूढ़ा बुजुर्ग हूं, इसलिए बता रहा हूं...। हां ऐसी दृढ़ता तुम में भी हो सकती है, बशर्ते तुम मेरी तरह सात्विक जीवन जिओ और प्रकृति के सापेक्ष आचरण करो।
खैर, छोड़ो मैं आज अपनी प्रवृति के विरुद्ध उपदेश दे रहा हूं.. जो मैंने अपने 90 साल की उम्र में नहीं दिया। लेकिन पता नहीं क्यों... अब मुझे लगता है, कि मुझे वास्तव में मेरा बुढ़ापा ऐसा करने को विवश कर रहा है। जो भी हो मैंने भी ठानी है कि आपको वह तमाम बातें बता कर दम लूंगा, जो एक नई पीढ़ी को बताने का फर्ज एक बुजुर्ग का होता है।
    आपको पता है मेरा नाम लक्ष्मण झूला क्यों पड़ा..? दुनिया में मेरे जैसे न जाने कितने सेतु हैं, लेकिन मुझे ही पूरी दुनिया ने क्यों इतना सम्मान और प्रेम दिया..?  आज में आपको बताता हूं।
मैं जिस स्थान पर विराजमान हूं, यह भूमि देवताओं और ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है। गोमुख से निकल कर गंगा अपने साथ छोटे बड़े हिमनद, नदी और नयारों को मिलाकर पहाड़ों के बीच सर्फिले रास्तों से कलकल निदान करते हुए यहां तक पहुंचती है। फिर यहीं से गंगा अपने उस चंचल और चपल स्वभाव को बदल कर शांत और गंभीर बहने लगती है। मानो वह इस तपोभूमि में तपस्यारत साधकों का ध्यान भंग नहीं करना चाहती हो। रामायण काल में भगवान राम के अनुज लक्ष्मण जी ने इसीलिए इस भूमि को तप के लिए चुना था। उन्होंने इसी भूमि पर आकर तप किया। तब से इस भूमि का नाम तपोवन हो गया। आपके यकीन के लिए मैं स्कंद पुराण के केदारखंड का ज़िक्र करना चाहूंगा। केदारखंड के अध्याय 123 के 25वें श्लोक में इस बात के प्रमाण काफी हद तक आपको मिल जाएंगे। गंगा की दाहिने छोर पर आज भी लक्ष्मण मंदिर स्थित है, जहां भगवान शिव लिंग रूप में विराजमान हैं। यहां आकर आप पुराने लोगों से उनके लक्ष्मण मंदिर से जुड़े अनुभव पूछ सकते हैं। इस मंदिर में स्थित शिवलिंग पर कभी अनगिनत सर्प लिपटे रहते थे, जो अब यदा-कदा ही सही मगर, यहां नजर आते हैं। लक्ष्मण जी को पुराणों में शेष नाग का अवतार माना गया है और सर्प भगवान शिव के आभूषण। शायद यह संयोग इन्हीं पौराणिक मान्यताओं को बल देते हैं। पुराणों में इसी स्थान पर 'इंद्र कुंड' जिसे कुछ लोग 'लक्ष्मण कुंड' भी कहते थे, कभी हुआ करता था। इस कुंड में स्नान करने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिल जाती थी। लक्ष्मण जी ने भी अपने कुष्ठ रोग के निवारण के लिए इस कुंड में स्नान किया था,   ऐसा पुराणों में उल्लेख है। इस पौराणिक मान्यता से इतना तय है कि यह भूमि लक्ष्मण जी की तपोभूमि रही है।
अब सवाल यह उठता है कि इस स्थान पर सेतु (पुल) की जरूरत क्यों पड़ी..? चलो मैं यह भी प्रमाणिक तौर पर बता देता हूं। दरअसल, उत्तराखंड हिमालय के प्रसिद्ध धाम श्री बद्रीनाथ व श्री केदारनाथ को पहुंचने का एकमात्र (पैदल) मार्ग यही था। पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्री राम के अनुज लक्ष्मण ने सबसे पहले इस स्थान पर गंगा को पार करने के लिए जूट की रस्सियों की मदद से पुल का निर्माण किया था। इसके बाद भी इंसानी सभ्यता में यहां पर जूट की रस्सियों के सहारे ही पुल का निर्माण होता रहा। तब जूट की रस्सियों पर छींके के सहारे यात्री इसी गंगा को पार करते थे और आगे की यात्रा करते थे। समृद्धि इंसानी सभ्यता के दौर में यह क्रम सन 1889 तक जारी रहा। इसी दौर में एक प्रसिद्ध संत जिन्हें बाबा काली कमली वाले के नाम से प्रसिद्धि मिली (स्वामी विशुद्धानंद) ने तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए ऋषिकेश से लेकर बद्रीनाथ, केदारनाथ व गंगोत्री-यमुनोत्री के पैदल यात्रा मार्ग पर कई पड़ाव विकसित किए, जिन्हें चट्टियों का नाम दिया गया। ऋषिकेश से बद्रीनाथ पैदल मार्ग पर सत्यनारायण मंदिर (रायवाला) के बाद ऋषिकेश, लक्ष्मण चट्टी, गरुड़ चट्टी, मोहन चट्टी, महादेव चट्टी, कांडी, व्यास चट्टी, देवप्रयाग.. और फिर आगे संपूर्ण यात्रा मार्ग पर इसी तरह के पड़ाव विकसित किए गए। यानि कि बद्रीनाथ-केदारनाथ यात्रा के लिए लक्ष्मण झूला से गंगा को पार करना होता था। जिसके लिए यहां पर पुल (सेतु) की आवश्यकता महसूस की गई होगी। सन 1889 में इन्हीं संत बाबा काली कमली वाले की प्रेरणा से कोलकाता के सेठ रायबहादुर सूरजमल झुनझुनवाला ने इस स्थान पर 50 हजार रुपये की लागत से लोहे की रस्सियों पर एक पुल का निर्माण कराया था, जो 1923 में गंगा में आई बाढ़ में बह गया और फिर मेरे निर्माण की कवायद, जैसा कि मैं पिछले खंड में बता चुका हूं। यह सेतु वास्तव में मेरा आदि पूर्वज था। मैं विशुद्ध रूप से विज्ञान की देन हूं, इसलिए धर्म और अध्यात्म के मामले में कमजोर हूं। यह सब तो प्रसंगवश मैंने आपको बता दिया। लेकिन इसमें जो इतिहास बताया गया है, वह सत्य की कसौटी पर खरा और प्रमाणिक है। मैं अब बूढा हो चला हूं..., इसलिए अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह इतिहास बताने की कोशिश कर रहा हूं।
जहां तक आस्था का सवाल है तो मैंने आप जैसे अनगिनत लोगों के दिलों में मेरे प्रति आस्था का वह भाव देखा। आपको याद हो या ना हो मगर मुझे खूब याद है कि जब तुमने पहली दफा मेरी हथेलियों में अपने पैर बढ़ाएं, उससे पहले एक अनजान आस्था ने तुम्हारा शीश मेरे सम्मान में झुका दिया था। तुमने मेरे ऊपर बेफिक्री से गंगा पार करने से पहले न जाने क्यों मुझे अपने अंतर मन से सम्मान देते हुए प्रणाम कहा था। हालांकि मैंने कभी किसी से भी ऐसी अपेक्षा नहीं की थी।
मैं अपने निर्माण से लेकर आज तक, जब मैं बूढ़ा हो चला हूं... मैंने कभी अपने स्वार्थ को नहीं जिया और ना ही अपने स्वभाव को कभी स्वार्थी होने दिया। हां यह अलग बात है कि मेरा अस्तित्व ना जाने कितने लोगों को स्वार्थी बना गया। मैंने तो हमेशा स्वयं को भूगोल के दो खंडों के बीच अखंड रखने का प्रयास किया। मेरी इस अखंडता ने मेरे आस-पास की सभ्यता को इतना सुदृढ़ बना दिया कि अब मुझे इस सभ्यता की चिंता भी सताने लगी है। चिंता इसलिए कि जो सभ्यता मेरे बलबूते सुदृढ़ हुई, संपन्न बनी, मेरे बाद ना जाने क्या परिणाम होगा। मैं कभी अंतर्मुखी और स्वपोषी नहीं रहा। इसलिए, क्योंकि मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..., मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं.., मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..,



जारी... (स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, अब्दुल कलाम ने मुझे कैसे जिया, मेरे जीते जी कितना और कैसे बदला ऋषिकेश )

Sunday, June 9, 2019

बर्बादी की तरफ बढ़ते हमारे कदम!

कुल्लू में तापमान 33℃ है , ऋषिकेश में तापमान 38℃ है ,

नैनीताल में 26℃ है , डलहौजी में भी 25 से 30 के बीच मे है ,
कुफरी में 23℃ है

शिमला में 25℃ है ,
मसूरी में भी 26 है ,

इन सभी हिल स्टेशन्स के तापमान लगातार बढ़ रहें , दिल्ली से शिमला के लिए रोज हजारों लोग निकलते हैं

कार उठाई चल दिये , और जो लंबा जाम लगता है वहाँ जिसकी कोई हद नही ,

शिमला को दिल्ली बनाने का प्रोसेस लगातार जारी है ,

हिल स्टेशन्स का जब ये हाल है तो भैया UP बिहार दिल्ली राजस्थान में 50+ तापमान पहुँचना नार्मल है ।

AC घर घर लग रही , AC पूरे मोहल्ले को गैस की भट्ठी में झोंक देती है , बिना AC आप रह भी नही सकते,

हम अपनी मौत अपने हाँथो लिख रहे , गंगा सूख गई है , ग्लेशियर में बर्फ ही नही है पिघलेगा कहाँ से ।

गर्मी पड़ती है हम झुंझलाते हैं , जिनका फील्ड वर्क है उनकी हालत खराब है , एक फेरी वाला जो 10 चक्कर लगाता था एक नही लगा पा रहा ,

सरकार भी सस्ती AC बाँटने निकली है ,
दुबई जो की रेगिस्तान में बसा है वहाँ तापमान 42℃ है ,

और हमारे यहाँ 50 पहुँच रहा ,

सरकारों को इस ओर ध्यान देना चहिये , 50 के बाद तो AC भी काम नही करती 55 के बाद खून उबल जाएगा सब मर जाएँगे,

एक बार ऐसा हुआ भी है , तब AC का सहारा नही था , 80 के दशक में लोग गंगा में कूद के मर गए थे ।

इस बार ठंडी में कुहरा का दर्शन नही हुआ , वरना पूरे दिन कुहरा पड़ता था ,

सावन की झड़ी तो लोग भूल ही चुके हैं जब हफ़्तों महीनों लगातार बारिश होती थी रिमझिम रिमझिम ।

एक AC और लाइये
चलाइये
सो जाइये !!
😑

विज्ञान और प्रकृति की लड़ाई में विजेता सदैव प्रकृति होगी लिख के ले लीजिए ।

 Happy world environment day !!


Friday, March 29, 2019



मुझे मेरी खुशीयों के संग बर्बाद हो जाने दो
जिन्दा होने में इतना मजा नहीं
जिंदादिली के साथ मुझे मर जाने दो
सागर की लहरें गिनने में क्या रखा है
डूब कर गहरे पानी में गोता लगा इक
फिर तुझे जिंदगी से इश्क-मुश्क  होगा
बाहर -बाहर से रोजाना के
उस मौला के घर में सिर नवाने में क्या रखा है।
वक़्त मिनट दर मिनट घंटा दर घंटा तेरे साथ चलेगा।
दिन भी तेरे साथ , रातें भी तेरे साथ
फिर तन्हाई का गिलाफ़ भी  तेरे ऊपर
और किस बात का रंज है
जमाने के साथ न कोई जिया है न कोई मरा है।
ग़ालिब या मीर या कोई कबीर
देने को फ़लसफ़े जिंदगी के मिलेंगे बहुत अमीर।
 मेरी मौत से कोई रंजिश नहीं
पर जिंदगी से पुरानी जान पहचान है
मौत से मोहब्बतों की रस्म निभाने में क्या रखा है।





Wednesday, February 20, 2019

#IndiavsPak, एक बार फिर से!

#WednesdayWisdom! #IndiavsPak
खून -खराबे से कैसे आदमी......
खून -खराबे से कैसे आदमी / समाज /देश पिछड़ जाते हैं इसकी मिसाल मैंने अखबार में  पढ़ी। सीरिया में तीन साल से जारी खूनी लड़ाई के कारण यह देश कम से कम तीस साल पीछे चला गया हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार सिरिया की करीब 45 %आबादी गरीबी की रेखा के नीचे   तुलना में   सिर्फ 12 % आबादी  मार्च 2011  गरीबी की रेखा के नीचे थी। गृहयुद्ध शुरू होने से पहले करीब 8 % आबादी बेरोजगार थी और अब है : लगभग  आधी आबादी। लड़ाई शुरू होने से पहले सीरिया उन गिने -चुने अरब देशों में एक था जो विकास के लक्ष्यों को पीछे छोड़ देते थे। मगर तीन साल बाद सिर्फ सोमालिया से बेहतर ?
यह तो एक बानगी है अभी तस्वीर बाकी है इराक , तुर्की आदि की!

Tuesday, February 12, 2019

डॉक्टर सुभाष चंद्र भाटिया -एक अनुकरणीय जीवन

डॉक्टर साहब की जिंदगी  के वैसे तो बहुत से पहलू अनुकरणयी है परन्तु जो बात सबसे ज्यादा उनके व्यक्तित्व में उभर कर आती  है  वो है उनका जिंदगी के प्रति सकारात्मक नजरिया व  हमेशा संघर्ष करने की प्रवृति ।
डॉक्टर साहब का जन्म २९ सितम्बर १९४४ को अविभाजित भारत में हुआ था। माता पुष्पावती व  पिता डॉक्टर हरिश्चंद्र भाटिया एक प्रमुख समाजसेवी और आर्यसमाज के प्रबल योद्धा थे। पिता डॉक्टर हरिश्चंद्र एक जानेमाने होम्योपैथ और त्रिनगर आर्यसमाज,दिल्ली  के संस्थापक सदस्य थे।
१९७०  में BFA करने के बाद आप ने२५ वर्षों तक  IIT दिल्ली मे नौकरी की । २१ फरवरी १९७० में आपका विवाह चन्द्रकांता  भाटिया से हुआ। शुरू से ही आप   स्वामी दयानन्द के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित थे ऊपर से पिता के संसर्ग में आर्यसमाज व् जनसंघ से जो जुड़े तो फिर समाज की कुरीतियों  को दूर करने की ठान ली व  इन्ही  कार्यों को पूरा करने में जीवनपर्यन्त लगे  रहे।होम्योपैथी  से उनका जुड़ाव जगजाहिर था। उनके मुताबिक बड़ी से बड़ी बीमारी का  इलाज होम्योपैथी  में है और यह सिर्फ कहने भर को नहीं आपने इसे  सिद्ध  करके दिखाया।
होम्योपैथी  के निःशुल्क कैंप लगाना व  समाज के गरीब व् पिछड़े वर्ग की सहायता करना ये आपका ऐसा  कार्य है जिसे भूल पाना असंभव है। एक योगी की भांति  सुबह ४ बजे उठकर नित्य योगक्रिया व् ततपश्चात  हवन करना और फिर सामाजिक कार्यों में जुट जाना ,साथ-साथ अपने पुत्रों के व्यवसाय  में अपना पूरा मार्गनिर्देशन देना ,निरंतर होम्योपैथी  के द्वारा बीमारजनों  की सेवा करना।इसके लिए उन्हें दिल्ली सरकार ने सन २००७ में 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड' प्रदान किया।
 एक बड़ा दिलचस्प पहलू उनके जीवन का यायावर प्रवृति का होना था भारत यात्रा के अतिरिक्त दुनिया के कई देशों की यात्रा की। फोटोग्राफी में तो माहिर थे, कई पुरस्कार उन्हें इस विषय में भी प्राप्त हुए।
एक साथ इतने कार्यों में सहयोग देना एक विशाल व्यकितत्व का होना व  सरल भाव होना, निश्चित तौर  पर हमने एक ऐसे व्यकितत्व को खोया है(निर्वाण प्राप्ति -फरवरी ७,२०१९) जिसकी पूर्ति होना असम्भव है परंतु गीता का यह श्लोक हमे निश्चित प्रकार से उनके पदचिन्हों पर चलने की प्ररेणा देगा

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।।
श्रेष्ठ मनुष्य जोजो आचरण करता है दूसरे मनुष्य वैसावैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।



Thursday, January 24, 2019

मेरी तेरी जिंदगी !

जीने पे आया तो जी लिया
मरने पे आया तो घुट घुट के जी लिया
बात मेरी तेरी जिंदगी की नहीं है
 बात तेरे मेरे मरने की भी नहीं है
बाते बहुत है तेरे मेरे पास
 पर बात कोई भी करने की नहीं है
अहसासों में साँसे भर कर
 जिंदगी  जीने से जिंदगी  जी जाती है
मुकम्मल हुआ मेरा कहना
 के बात कोई भी कहने की नहीं है
वक़्त गुजरने के बाद
 इंसानों ने लकीरे पीटी है
और एक एक करके लम्हा
गुजारा  मैने तेरे साथ
 बस यही कुदरत का फ़लसफ़ा है जो मेरे पास
 वरना
मै भी वो इंसा हूँ
जिसने पानी के हर घूंट  को भी
जहर में तब्दील होते देखा है। 

Monday, December 3, 2018

A Little !

life is curious to know my detail which does not matter a little. A little is very strange word for me since my childhood. I'm not able to understand the meaning of this word to date. It looks very strange to someone but for me, I'm sure that I've to struggle to find out exactly what the meaning will come out.  Wow! one day when I was sitting in a spiritual discourse trying to understand so many clours of life At the end of the discourse what I understood was - a little.
There are so many scholars on this earth who teach Gita sholak by sholak . how is that possible?
leave aside Einestin or Newton but why there are so many things which I could not understand.
If someone knows this secret. please oblige me a little.