Friday, March 29, 2019



मुझे मेरी खुशीयों के संग बर्बाद हो जाने दो
जिन्दा होने में इतना मजा नहीं
जिंदादिली के साथ मुझे मर जाने दो
सागर की लहरें गिनने में क्या रखा है
डूब कर गहरे पानी में गोता लगा इक
फिर तुझे जिंदगी से इश्क-मुश्क  होगा
बाहर -बाहर से रोजाना के
उस मौला के घर में सिर नवाने में क्या रखा है।
वक़्त मिनट दर मिनट घंटा दर घंटा तेरे साथ चलेगा।
दिन भी तेरे साथ , रातें भी तेरे साथ
फिर तन्हाई का गिलाफ़ भी  तेरे ऊपर
और किस बात का रंज है
जमाने के साथ न कोई जिया है न कोई मरा है।
ग़ालिब या मीर या कोई कबीर
देने को फ़लसफ़े जिंदगी के मिलेंगे बहुत अमीर।
 मेरी मौत से कोई रंजिश नहीं
पर जिंदगी से पुरानी जान पहचान है
मौत से मोहब्बतों की रस्म निभाने में क्या रखा है।





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