डॉक्टर साहब की जिंदगी के वैसे तो बहुत से पहलू अनुकरणयी है परन्तु जो बात सबसे ज्यादा उनके व्यक्तित्व में उभर कर आती है वो है उनका जिंदगी के प्रति सकारात्मक नजरिया व हमेशा संघर्ष करने की प्रवृति ।
डॉक्टर साहब का जन्म २९ सितम्बर १९४४ को अविभाजित भारत में हुआ था। माता पुष्पावती व पिता डॉक्टर हरिश्चंद्र भाटिया एक प्रमुख समाजसेवी और आर्यसमाज के प्रबल योद्धा थे। पिता डॉक्टर हरिश्चंद्र एक जानेमाने होम्योपैथ और त्रिनगर आर्यसमाज,दिल्ली के संस्थापक सदस्य थे।
१९७० में BFA करने के बाद आप ने२५ वर्षों तक IIT दिल्ली मे नौकरी की । २१ फरवरी १९७० में आपका विवाह चन्द्रकांता भाटिया से हुआ। शुरू से ही आप स्वामी दयानन्द के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित थे ऊपर से पिता के संसर्ग में आर्यसमाज व् जनसंघ से जो जुड़े तो फिर समाज की कुरीतियों को दूर करने की ठान ली व इन्ही कार्यों को पूरा करने में जीवनपर्यन्त लगे रहे।होम्योपैथी से उनका जुड़ाव जगजाहिर था। उनके मुताबिक बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज होम्योपैथी में है और यह सिर्फ कहने भर को नहीं आपने इसे सिद्ध करके दिखाया।
होम्योपैथी के निःशुल्क कैंप लगाना व समाज के गरीब व् पिछड़े वर्ग की सहायता करना ये आपका ऐसा कार्य है जिसे भूल पाना असंभव है। एक योगी की भांति सुबह ४ बजे उठकर नित्य योगक्रिया व् ततपश्चात हवन करना और फिर सामाजिक कार्यों में जुट जाना ,साथ-साथ अपने पुत्रों के व्यवसाय में अपना पूरा मार्गनिर्देशन देना ,निरंतर होम्योपैथी के द्वारा बीमारजनों की सेवा करना।इसके लिए उन्हें दिल्ली सरकार ने सन २००७ में 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड' प्रदान किया।
एक बड़ा दिलचस्प पहलू उनके जीवन का यायावर प्रवृति का होना था भारत यात्रा के अतिरिक्त दुनिया के कई देशों की यात्रा की। फोटोग्राफी में तो माहिर थे, कई पुरस्कार उन्हें इस विषय में भी प्राप्त हुए।
एक साथ इतने कार्यों में सहयोग देना एक विशाल व्यकितत्व का होना व सरल भाव होना, निश्चित तौर पर हमने एक ऐसे व्यकितत्व को खोया है(निर्वाण प्राप्ति -फरवरी ७,२०१९) जिसकी पूर्ति होना असम्भव है परंतु गीता का यह श्लोक हमे निश्चित प्रकार से उनके पदचिन्हों पर चलने की प्ररेणा देगा
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।।
डॉक्टर साहब का जन्म २९ सितम्बर १९४४ को अविभाजित भारत में हुआ था। माता पुष्पावती व पिता डॉक्टर हरिश्चंद्र भाटिया एक प्रमुख समाजसेवी और आर्यसमाज के प्रबल योद्धा थे। पिता डॉक्टर हरिश्चंद्र एक जानेमाने होम्योपैथ और त्रिनगर आर्यसमाज,दिल्ली के संस्थापक सदस्य थे।
१९७० में BFA करने के बाद आप ने२५ वर्षों तक IIT दिल्ली मे नौकरी की । २१ फरवरी १९७० में आपका विवाह चन्द्रकांता भाटिया से हुआ। शुरू से ही आप स्वामी दयानन्द के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित थे ऊपर से पिता के संसर्ग में आर्यसमाज व् जनसंघ से जो जुड़े तो फिर समाज की कुरीतियों को दूर करने की ठान ली व इन्ही कार्यों को पूरा करने में जीवनपर्यन्त लगे रहे।होम्योपैथी से उनका जुड़ाव जगजाहिर था। उनके मुताबिक बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज होम्योपैथी में है और यह सिर्फ कहने भर को नहीं आपने इसे सिद्ध करके दिखाया।
होम्योपैथी के निःशुल्क कैंप लगाना व समाज के गरीब व् पिछड़े वर्ग की सहायता करना ये आपका ऐसा कार्य है जिसे भूल पाना असंभव है। एक योगी की भांति सुबह ४ बजे उठकर नित्य योगक्रिया व् ततपश्चात हवन करना और फिर सामाजिक कार्यों में जुट जाना ,साथ-साथ अपने पुत्रों के व्यवसाय में अपना पूरा मार्गनिर्देशन देना ,निरंतर होम्योपैथी के द्वारा बीमारजनों की सेवा करना।इसके लिए उन्हें दिल्ली सरकार ने सन २००७ में 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड' प्रदान किया।
एक बड़ा दिलचस्प पहलू उनके जीवन का यायावर प्रवृति का होना था भारत यात्रा के अतिरिक्त दुनिया के कई देशों की यात्रा की। फोटोग्राफी में तो माहिर थे, कई पुरस्कार उन्हें इस विषय में भी प्राप्त हुए।
एक साथ इतने कार्यों में सहयोग देना एक विशाल व्यकितत्व का होना व सरल भाव होना, निश्चित तौर पर हमने एक ऐसे व्यकितत्व को खोया है(निर्वाण प्राप्ति -फरवरी ७,२०१९) जिसकी पूर्ति होना असम्भव है परंतु गीता का यह श्लोक हमे निश्चित प्रकार से उनके पदचिन्हों पर चलने की प्ररेणा देगा
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।।
श्रेष्ठ मनुष्य जोजो आचरण करता है दूसरे मनुष्य वैसावैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।
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