Saturday, September 19, 2020

#HappyBirthday! To #MySon

 #HappyBirthday! To 

#MySonKeshav! 

Dear Keshav,

It was exactly 25 years ago , just sitting outside Jeevan nursing home  I had no idea how to react.there was an Innocent smile on my face.There were plenty of reasons but behind these plenty of reasons news related to you was the main this I was sure then and confirmed the same in coming days/years.month on month and year on year whenever i see my self in the mirror i find my inner sense more and more clear .

 More money or less money does not make a man perfect .it is the way of thinking it is way of living a life which segregates you from rest of the world .and,world is what, A noise   in which if you are sitting idle and peaceful.you are among the very few successful person of this world

.For me ,who has experience of zero universe and as I see --,sometimes we forget our identity and believe more on others but all this happens for a very short period . what you are, others don't know but I know your spiritual world is so much powerful that once it is on your front, for you success in any terminology will not matter at all .

I believe if Einstein  and Ramanujan were part of our history then  youth like you will be future icon of this world. And,with this my summation will be on this that simple mistakes are avoidable and big mistake creates blunders.

A wise man takes third route!.


“The soul is invisible. 

An angel is invisible.

The wind is invisible. 

 Thoughts are invisible.

And yet, with sensitivity 

you can see the soul, 

 you can guess the angel, 

you can feel the wind, 

you can change the world 

 with 

only a few thoughts.”

Wednesday, September 16, 2020

#नदी!

 सदियों पहले 

नदी ने कहा

जा रही हूँ...


पर्वत ने कहा – जाओ


नदी तबसे

जा ही रही है

उसका जाना

कभी ख़त्म नहीं हुआ


तुम जाना

तो ऐसे ही जाना


जितना जाना

उतना ही 

बाकी रह जाना।



Monday, July 13, 2020

#MondayVibes!

#Mondayvibes!
#Prayer is 
when
you talk to #God
 Sadhana/#Meditation is
when
you listen to #God!

Monday, June 22, 2020

#Icannot #remember my #father

#happyfathersday! #poem inspired by #Tagore
I cannot remember my Father
Only sometimes in the midst of my play
a tune seems to hover my playthings
the tune of some song that he used to hum while rocking my cradle
I cannot remember my father
but when in the early autumn morning
the smell of the jasminum flowers float in the air
the scent of the morning service in the temple
comes to me as scent of father
I cannot remember my father
only when from my bedroom window I send my eyes into the blue of distant sky,
I fell that the stillness of
my father's gaze on my face

Thursday, June 4, 2020

स्वर्ग की गोसिप : धरती की पीड़ा?

रेलवे स्टेशन पर एक माँ की मौत


दृश्य एक बार फिर से स्वर्ग का, जहाँ हमेशा की तरह अपना दिमाग भर बोर हो चुकीं, इतिहास की हमारी महान हस्तियाँ साथ टहलती दीखती हैं. क्यों न हों, आख़िर स्वर्ग में पूर्णकालिक तालाबंदी जो है, बगैर बाल कटवाने की कोई फ़िक्र. मोहनदास गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, भीमराव अंबेडकर, मुहम्मद अली जिन्ना, श्री अरबिंदो, सरोजिनी नायडू, जयप्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय सब आसपास घूम रहे हैं. नारद उन्हें उकसाने के लिए प्रकट होते हैं.

नारद: ओ जवाहर! तुम अभी तक स्वर्ग में कैसे हो? मुझे लगा वो तुम्हें नरक में भेज रहे हैं. तुम ने नहीं वो सब भारत का नाश-वाश किया है?

जवाहर: वे नरक के लिए रेल के थर्ड क्लास का टिकट निकलवाने की कोशिश कर रहे थे. तभी तालाबंदी हो गई. अब मैं फँसा हूँ.

मोहनदास (धिक्कारते हुए): प्रिय जवाहर, जबतक फँसे हुए हो, ध्यानपूर्वक हिन्द स्वराज पढ़ लो. याद है, उसमें मैंने ट्रेनों पर लिखा था कि “रेलवे अपने साथ प्लेग के कीटाणु भी ढोता है।“

जवाहर (दर्द भरे भाव से): लेकिन बापू, आपने रेल से भारत की खोज की थी.

कस्तूरबा: और बापू, आपके आत्मज्ञान का क्षण थी एक ट्रेन. उससे अगर आपको फेंका नहीं गया होता, तो आप कभी नहीं जागते.

भीमराव: गाँधीजी, क्या आपने यह भी नहीं लिखा था, “हमारे मुख्य लोग पैदल या बैलगाड़ी में हिंदुस्तान का सफर करते थे, वे एक-दूसरे की भाषा सीखते थे और उनके बीच कोई अंतर नहीं था.” क्या आपने ही यह नहीं कहा था कि रेलवे के आने के बाद “हम अपने को अलग-अलग मानने लगे?” 

जिन्ना बीच में बोले: मैंने तुमसे कहा था, तुम्हारा ये नया बंदा, नरेंद्र रणछोड़दास मोदी बिलकुल मोहन की तरह है. लाखों हिन्दुस्तानियों को उसने देश भर में यहाँ से वहाँ पैदल यात्रा करा दी. ये तपस्या उनसब को मुख्य लोग बना देगी, और हिंदुस्तान में कोई अलग-अलग नहीं रहेगा. बिलकुल जैसा मोहन ने कहा. उसने सब को शंकराचार्य बना दिया (हँसते हुए).

सरोजिनी: अरे जिन्ना, तुम फिर इन्डियन फ़िल्में देखते हुए पकड़े गए. तुम्हारे कहने का अर्थ नरेंद्र दामोदरदास मोदी है. भारत के प्रधानमंत्री का तुम्हें सम्मान करना चाहिए. रणछोड़दास तो थ्री इडियट्स का किरदार है, जिसका डिग्री से पंगा था.

जिन्ना: माफ़ करना सरोजनी बहन, ये हिंदी के एक जैसे सुन पड़ते नाम. कई दफ़ा भर्मित करना आसान होता है.

भीमसेन जोशी: एक दास एक दास है (आसावरी तोड़ी में आलाप लेते हुए) “मैं तो तुम्हरो दास , जनम जनम से”.

के एम मुंशी: ओ जिन्ना, नरेंद्र भाई बुलेट ट्रेन बना रहे हैं.

 (साँसों में फुसफुसायीं): क्या पता वो बुलेट शब्द के फेरे में आ गया हो.

मोहनदास (विचलित): मेरे गुजराती भाई मुझे हमेशा ग़लत समझे हैं! तपस्या मैंने सदैव स्वयं की है, बेरहमी से कभी दूसरों पर नहीं थोपी.

भीमराव बीच में बोले: आइये वल्लभभाई. हम आपके प्रिय विषय पर बात कर रहे हैं, रेलवे. भारत को एकसाथ रखने वाला लोहे का असली फ्रेम. मोहन का भ्रम दूर कीजिये. 

वल्लभभाई: मेरी रेल की यादें बहुत मधुर हैं. सच तो यह है, उड़ीसा रियासत से प्रत्यर्पण संधि के मिलने का इंतज़ार मैंने एक रेल में बैठकर किया था. रेल, अच्छी चीज़ है.

वीपी मेनन बीच में बोले: सर, रियासत वाले राज्यों ने भले ही अपनी प्रत्यर्पण संधि रेल में दी होगी. कुछ राज्य रेल स्वीकार ही नहीं कर रहे. केंद्र राज्यों को दोष दे रहा है, राज्य केंद्र को दोष दे रहे हैं.

वल्लभभाई: क्या? केंद्र समन्वय नहीं बैठा पा रहा है? हमने भारत को एक मजबूत केंद्र दिया था.

जयप्रकाश: जब तालाबंदी लागू करनी हो तो केंद्र मजबूत है, और जब खोलनी हो तो कमज़ोर. जैसे की एमरजेंसी में था. 

नारद (रवीन्द्रनाथ की तरफ देखते हैं): आप क्यों चुप हैं? बाबू किछु बोलो? आपने रेलवे स्टेशन पर कवितायेँ लिखी हैं.

दीनदयाल (ख़ुशी से दोहराते हुए): मेरे नाम पर तो एक रेलवे स्टेशन है. 

रवीन्द्रनाथ (बेमन से) कविता सुनाते हैं: 
कुछ सवार हो गए
कुछ छूट गए; 
सफल होना सवार होना गिरना या रह जाना
कुछ नहीं बस दृश्य बाद दृश्य 
कुछ जो एक पल आँखों को बांधे मिट जाए अगले ही पल
ख़ुद को भूलने का एक अजबगजब खेल (रेलवे स्टेशन, विलियम रेडिस के अंग्रेज़ी अनुवाद से हिंदी में अनुदित: भरत एस तिवारी)

श्री अरबिंदो: ‘माया’ सरीखा सुनायी पड़ता है. या फिर शायद सोशल मीडिया से कहीं अधिक जुड़ी बात है – “कुछ जो एक पल आँखों को बांधे मिट जाए अगले ही पल”.

भीमराव (तड़ाक से बोले): माया और तपस्या के बीच फँसे भारत का काम हो गया. लोग रेल की पटरियों पर मर रहे हैं.

जवाहर (रविन्द्रनाथ से बोले): अरे छोड़िये ये ख़ुद को भूलने का अजबगजब खेल. आपने देखा नहीं मुज़फ्फरपुर स्टेशन पर क्या हुआ? एक नन्हा-सा बच्चा अपनी मृत माँ के ऊपर पड़ा कपड़ा खींच कर उससे उठने की मिन्नत कर रहा था। वास्तविकता क्या तुम्हें कभी नहीं घूरती? इस दृश्य को हटा कर मैं कभी किसी रेलवे स्टेशन के बारे में नहीं सोच सकता. शायद बापू सही हैं. रेलवे स्टेशन हमारी नैतिकता के पलायन की जगह है. यहाँ अच्छाई से कही तेज़ी से बुराई फैलती है.

मोहनदास: वे मेरे ताबीज को भूल गए हैं। मैं दोहराऊंगा नहीं। मैं भी इसे भूल गया हूं। गरीबों के बारे में था कुछ।

कोई (बहुत धीमे) फुसफुसाता है: लेकिन, क्या स्टेशन पर वाई-फाई था?

वल्लभभाई: जवाहर, तुम हमेशा भावुक हो जाते ही. तुम्हें याद नहीं हैं मौत की रेलें जिनका सामना हमें बँटवारे के समय करना पड़ा था? लाशों से भरी एक ट्रेन अप, एक ट्रेन डाउन. गोधरा और उसके बाद. हमारी रेलें वैसी ही हैं, जैसी हम उन्हें बनाते हैं. रोना बंद करो.

(सब नीचे देखने लगते हैं; कुछ लोग चुपके से जिन्ना को देखने की कोशिश करते हैं)

दीनदयाल: रेल पटरियों की बात हो रही है, आप सब लोग जानते ही हैं मेरी लाश ऐसी ही किसी पटरी पर मिली थी.

नारद: बेशक. तुम बड़े दिमाग वाले लोग चूंकि उपन्यास कभी नहीं पढ़ते हो, तुम असलियत पर ध्यान नहीं देते, मैं बता रहा हूँ तुम्हें, हिन्दुस्तानियों ने हमेशा रेल की पटरी पर मरने की शिकायत की है. एक रोहिंटन मिस्त्री हैं जिसने एक बेहतर संतुलन (अ फाइन बैलेंस) में एमरजेंसी के बारे में लिखा है, कई तरह से हमारे समय से मिलता जुलता. उसका एक पात्र, रेलयात्री लेट होती ट्रेन पर चिढ़कर कहता है, “मरने के लिए सबको रेल की पटरी ही क्यों मिलती है?” तो दूसरा बड़बड़ाया, “हमारी फ़िक्र किसे है. हत्या, आत्महत्या, नक्सली-आतंकवादी हत्या, पुलिस-हिरासत में मौत सब ट्रेन को लेट करती हैं. आख़िर ज़हर या ऊंची बिल्डिंग या चक्कू से क्या परेशानी है?”

भीमराव: और अब, भूख से भी पटरी पर मौत...,मरते कैसे हैं कि शिकायत हम अधिक करते हैं, न कि मरते क्यों हैं की.

हवा में सन्नाटा फ़ैल जाता है

सुभाष बोस बीच में बोलते हैं: ठीक समय पर नहीं चलने वाली ट्रेन की बात हो रही है, कभी मेरे ऐसे दोस्त थे जिन्होंने रेल को सही समय पर चला दिया था. मुसोलिनी समय पर ट्रेनें चलाता था. मैं इसकी वकालत नहीं कर रहा हूँ, लेकिन इस विषय में सोचो. अनुशासन की कड़ी खुराक मिले तो हो सकता है कि रेल गाड़ियाँ समय पर चलने लगें.

भीमराव: तानाशाह हिन्दुस्तान में रेल सही समय पर नहीं चला सकते. और अभी तो हमने देख लिया कि यह भी नहीं तय कर सकते कि रेल वहाँ पहुँच जाए जहाँ उसे जाना था. जीवित यात्रियों समेत.

जवाहर: लगता है कि मुझे नरक हवाई जहाज से जाना पड़ेगा. रेल छोड़ो. वहाँ बहुत मौत और अफरातफरी है.

 तुम तो भाग सकते हो, लेकिन गणतन्त्र का क्या होगा, जवाहर? रेल की गति से जायेगा या फिर उड़ेगा? क्या अपनी मंज़िल तक पैदल जायेगा? क्या बीच रास्ते में थककर ढह जायेगा? और हम, स्टेशन के उस बच्चे की तरह, उस माँ से उठने की मिन्नत कर रहे होंगे जिसकी अंतड़ियों से ज़िन्दगी बहुत पहले निकाली जा चुकी है.  

Sunday, May 24, 2020

समय की सीमा?

ज्ञानगंज_का_रहस्य (भाग-1)शांग्री_ला_घाटी_का_रहस्य
हिमालय की गोद में बसी घाटी ज्ञान गंज से जुड़े ऐसे अनसुलझे रहस्य जिन्हें आज तक कोई वैज्ञानिक भी नहीं सुलझा पाया...

क्या आपने कभी अमर दुनिया की कल्पनाओं के बारे में सुना है? क्या आपने कभी सोचा है कि इंसान के सदा अमर होने की कोई संभावना है?

खैर, आपको आश्चर्य होगा ये जानकर की हाँ ये संभव है|ऐसा सम्भव है हिमालय की गोद में बसी हुई एक जगह ज्ञान गंज में| ज्ञान गंज  को सिद्धश्रम, शांगरी ला या शम्बाला के नाम से भी जाना जाता है| इस जगह का उल्लेख रामायण, महाभारत आदि ग्रंथो में भी मिलता है|

ऐसा माना जाता है कि यह जगह किसी सिद्ध शक्ति के नियंत्रण में है और उनकी ईच्छा के बिना वहां से पत्ता भी नही हिलता है| कोई भी वहाँ न तो जा सकता है और ना ही वहाँ से वापस आ सकता है|वंहा वे ही लोग जाने में सफल हो पाते है जिनकी चेतना का स्तर उच्च हो|

इस जगह के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि यहाँ कोई मृत्यु नहीं होती। यहां रहने वाले संन्यासियों की उम्र रुक जाती है। इस मठ में समय को रोकने वाले महात्मा तपस्या लीन रहते हैं। आश्चर्य की बात है कि ये सैटेलाइट में भी नहीं दिखती। ये जगह किसी खास धर्म या कल्चर की नहीं है। न ही ईस्ट या वेस्ट से जुड़ी है।

लेखक जेम्स हिल्टन की किताब ‘Lost Horizon, about the lost kingdom of Shangri-La’ में भी इस जगह का जिक्र हुआ है।कहा जाता है कि जो भी इस जगह के लायक होता है, वह इसे ढूंढ सकता है। 1942 में एक अंग्रेज अफसर LP फरैल को इस जगह पर कुछ खास अनुभव हुए थे, जिसके बारे में उन्होंने 1959 में साप्ताहिक हिंदुस्तान में लेख प्रकाशित करवाए थे। तिब्बती बुद्धिस्ट्स का मानना है कि जब दुनिया में युद्ध होगा, शंभाला का 25वां शासक इस धरती को बचाने आएगा। योगी विशुद्धानंद ने भी इस आश्रम की शक्तियों को महसूस किया था।

इस घाटी के बारे में आप को अधिक जानकारी एक प्राचीन ग्रन्थ ‘काल विज्ञान’ जो की तिब्बत के तवांग मठ के एक पुस्तकालय में आज भी मौजूद है में मिल सकती है| इस किताब में वर्णन है की हम जिस संसार में रहते है वह तीन आयामी संसार है जहां हर वस्तू देश, समय, और नियती से बंधी हुई है| जब व्यक्ति ऐसे क्षेत्रो में प्रवेश कर जाता है जहां समय नगण्य है, तब वह समय के बन्धनों से परे चला जाता है. सरल शब्दों में हमारे यंहा के सेकड़ो वर्ष और वहां का एक पल बराबर होंगे| यानि कोई व्यक्ति ऐसे स्थानों पर यदि कुछ वर्ष बिता कर वापस आता है तो संभव है की उसके वापस आने तक हमारे संसार की सदियों गुजर चुकी हो. शंगरीला घाटी पर विचार, मन, और प्राण की शक्ति बहूत ही उच्च स्तर तक पहुँच जाती है|

जो लोग इस घाटी से परिचित है वो बताते है कि आज भी वहाँ ऐसे योगी और सिद्ध पुरुष मौजूद है जिनकी उम्र हजारो वर्ष है| एवं वे अपने दृश्य या अदृश्य रूप में यहां निवास करते है.

उनका दावा है कि प्रसिद्ध योगी श्यामाचरण लाहिड़ी के गुरु जिन्होंने शंकराचार्य को भी दीक्षा दी थी वे आज भी इन घाटियों (ज्ञानगंज, Gyanganj) के आश्रमों में निवास कर रहे है एवं समय समय पर आकाश मार्ग से आकर अपने शिष्यों को निर्देश भी देते है|

अनेको सैनिको, खोजकर्ताओ, पर्वतारोहियों, वैज्ञानिको आदि ने समय समय पर इस स्थान के बारे में अपने रोमांचकारी अनुभवों का विस्तार से वर्णन किया है| कई तरह के किस्से कहानियाँ भी इस जगह को लेकर प्रचलित है| लेकिन कभी भी यहाँ के रहस्यों को पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है।


Tuesday, April 21, 2020

मौन!

मौन ख़ुद में एक कष्टसाध्य साधना है, जो अंतर्मुखता पैदा करती और भीतर की ओर झाँक देखने की सहूलियतें हमें देती है. कई मर्तबा तो वाचालता की अपेक्षा मौन का प्रभाव कहीं गहरे से पड़ते देखा गया है. मौन से दुरूह कार्य भी सहज बन जाते हैं जब कि वाचालता से बिगाड़ की संभावना अधिक रहती है. मौन से हमारी क्रियात्मकशक्ति भी बढ़ती है और अबाध रूप से हम इसके बल पर अनथक देर तक कार्यों में जुटे रह सकते हैं. गहन मौन से छनकर जो सृजन निकलता है, वह अपनेआपमें न सिर्फ़ नायाब बल्क़ि कालातीत भी होता है. अनूठा और बेजोड़. मानसिक स्वास्थ्य के लिये प्रतिदिन हमें मौन की साधना करनी ही चाहिए. रोज़ कुछ घंटे बिना बोले बितायें और तब मानसिक स्मरण करें.। 

Saturday, March 21, 2020

CORONA? कुछ - कुछ है जो हम सब में है!

A Thought - - - About Death and life!

"But in reality one could say, at this moment, in the middle of March , the CORONA have covered everything. There is no longer any individual destinies.
that is the CORONA is pandemic and feelings shared by all.
 these are feelings of separation and exile with all that
involved of fear and rebellion."

बीबीसी के सौतिक विश्वास की एक रिपोर्ट के अनुसार 1918 में भारत में फ्लू का संक्रमण हुआ था। करीब दो करोड़ लोग मारे गए थे।
2020 के साल में कोरोना वायरस के कारण मुल्क के मुल्क घरों में बंद किए जा रहे हैं। सामाजिक प्राणी को सामाजिक दूरी का पाठ पढ़ाया जा रहा है। मृत्यु के आंकड़ों के बीच उसके भयावह हो जाने की आशंका इतनी है कि संक्रमण के शिकार लोगों का आंकड़ा भी मरे हुए लोगों का आंकड़ा नज़र आ रहा है। जिसे कोरोना हो गया है।

अफरा-तफरी मची है और इसी के बीच लापरवाही या बेपरवाही का दौर भी उसी खुशनुमा हवा की तरह शहरों में चल रहा है।

कि कोरोना वायरस हमें आने वाले दिनों में किस तरह से उदासीन कर देगा। हम हर चीज़ से उदासीन हो जाएंगे। यहां तक कि उदास होने की प्रवृत्ति से भी। मरने वाले लोगों का आंकड़ा बड़ा होकर छोटा नज़र आने लगेगा। राष्ट्राध्यक्षों की शुरूआती बेपरवाही का कोई मतलब नहीं है

 एक शहर है। Corona से घिर जाता है। शुरू में लोगों का जीवन सामान्य रहता है। वे मरने वाले आंकड़ों से ख़ुद को महफूज़ समझते हैं। जैसे हीCorona महामारी का एलान होता है मुर्दों को दफ़नाने की रस्मी औपचारिकताएं छोड़ दी जाती हैं। सारी कोशिश होती है किसी तरह दफ़ना दिए जाएं। सूचना का कोई मतलब नहीं रह जाता है। एक शहर जो मरने वाला है, मर रहा है, उसके भीतर ज़िंदा लोगों की दास्तां हैंCorona । तब आप इटली के मिलान और चीन के वुहान के बंद होने के मर्म को समझ सकते हैं।


- सब जानते हैं कि दुनिया में बार-बार महामारियां फैलती रहती हैं। लेकिन जब नीले आसमान को फाड़कर कोई महामारी हमारे सिर पर आ टूटती है तब न जाने क्यों हमें उस पर विश्वास करने में कठिनाई होती है। इतिहास में जितने बार युद्ध लड़े गए हैं उतनी ही बार महामारी भी फैली है। फिर भी महामारी हो या युद्ध दोनों ही जैसे लोगों को बिना चेतावनी दिए आ पकड़ते हैं।

- लेकिन अगले चार दिनों में ही बुखार में चौंकाने वाले नगरवासी अब तक नुक्ताचीनी करके अपनी घबराहट को छिपाते आए थे लेकिन अब जैसे उनकी बोलती बंद हो गई थी और वे उदास चेहरे लिए अपने कामों पर जा रहे थे।

- फिर एकाएक मौतों की संख्या एकदम बढ़ गई “ तो अब लगता है कि लोग भी घबरा उठे हैं-आख़िरकार। महामारी फैलने की घोषणा कर दो। शहर के फाटक बंद कर दो।"

- कोई भी हमेशा के लिए प्यार नहीं करता। पर ऐसा वक्त आया जब मुझे ‘? 'को अपने साथ रखने के लिए कुछ शब्द कहने चाहिए थे। लेकिन मैं उन शब्दों को ढूंढ न सका।
- इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि Corona ने धीरे धीरे हम सबमें न सिर्फ प्यार की बल्कि दोस्ती की क्षमता ख़त्म कर दी थी। यह स्वाभाविक ही था क्योंकि प्यार भविष्य की मांग करता है और हमारे पास वर्तमान के क्षणों की पंक्ति के सिवा कुछ नहीं बच रहा था।

- - क्या सचमुच नकाब बांधने से कोई फायदा होगा? - “नहीं”, लेकिन दूसरों में विश्वास पैदा होता है।

- इस बात से इनकार न करते हुए भी डॉक्टर ने कहा कि भविष्य अनिश्चित है। इतिहास यह साबित करता है कि महामारियां अनायास ही फिर ज़ोर पकड़ लेती हैं जबकि उनके ज़ोर पकड़ने की कोई उम्मीद नहीं होती। 

Friday, January 24, 2020

सच में! शोर से!


समय के साथ ??
समय के साथ बदलती
धारणाएं
समय साक्षी है
स्वयं
  मौन सत्य के असत्य मे
परिवर्तन का
और
चिल्लाते शोर मे बोले गये
झूठ का सच मे बदल जाना
आँधियाँ चलने से
 आँखों में मिट्टी समा गयी
और
दृश्य अदृश्य हो गया।
खाली बैठने से कुछ न होगा
लड़ पड़ो झूझ जाना पड़ता है
ये सर्वविदित है।
परन्तु
आज समय बदल गया है
लड़कर मर कर  कभी कुछ
नहीं बदल सकता।
अभिमन्यु के मरने पर कुछ न बदला
हाँ , अर्जुन ने मारा निहथ्ये कर्ण को
तो सब कुछ बदल गया।
चिल्लाने से अगर झूठ मर जाये
 तो मारो।
 मारकर जीत सको तो
जीतो।
वरना चुपचाप बैठकर समय के निर्णय
से सहमति अनिवार्य है।

Wednesday, November 20, 2019

कहानी एक राजा की!



एक राजा के दरबार मे एक अजनबी इंसान नौकरी मांगने के लिए आया.
उससे उसकी क़ाबलियत पूछी गई,  तो वो बोला,  "मैं आदमी हो चाहे जानवर, शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ. राजा ने उसे अपने खास "घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज" बना दिया. चंद दिनों बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा,  उसने कहा, "नस्ली नही हैं."
राजा को हैरानी हुई, उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा... उसने बताया, घोड़ा नस्ली तो हैं, पर इसकी पैदायश पर इसकी मां मर गई थी, ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला है. राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा, "तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं ?"   उसने कहा, "जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता हैं. राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ, उसने नौकर के घर अनाज, घी, मुर्गे और अंडे बतौर इनाम भिजवा दिए.
और उसे रानी के महल में तैनात कर दिया. चंद दिनो बाद, राजा ने उस से रानी के बारे में राय मांगी, उसने कहा, "तौर तरीके तो रानी जैसे हैं लेकिन पैदाइशी नहीं हैं."
राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, उसने अपनी सास को बुलाया, मामला उसको बताया, सास ने कहा, "हक़ीक़त ये हैं, कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी 6 माह में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया."
राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा "तुम को कैसे पता चला ?" उसने कहा, "रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा हैं. एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता हैं, जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही."
राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ और बहुत से अनाज, भेड़ बकरियां बतौर इनाम दीं. साथ ही उसे अपने दरबार मे तैनात कर दिया. कुछ वक्त गुज़रा, राजा ने फिर नौकर को बुलाया, और अपने बारे में पूछा.
नौकर ने कहा "जान की सलामती हो तो कहूँ." राजा ने वादा किया.
उसने कहा, "न तो आप राजा के बेटे हो और न ही आपका चलन राजाओं वाला है." राजा को बहुत गुस्सा आया, मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था, राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा.
मां ने कहा, "ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हे गोद लेकर हम ने पाला." राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा, बता "तुझे कैसे पता चला ?"
उसने कहा, "जब राजा किसी को "इनाम दिया करते हैं, तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं....लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं. ये रवैया किसी राजाओं का नही,  किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है."
किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा हैं. इंसान की असलियत की पहचान उसके व्यवहार और उसकी नियत से होती हैं...
इसीलिए  "चाय" बेचने वाले की सोच, "पकौड़े" बेचने से ऊपर नही उठ सकती. हैसियत बदल जाती है, पर सोच नही.