Friday, September 15, 2017

अबकी बार इवेंट सरकार!

ये  इवेंट सरकार है. आपको इवेंट चाहिए इवेंट मिलेगा. किसी भी चीज़ को मेक इन इंडिया से जोड़ देने का फन सबमें आ गया जबकि मेक इन इंडिया के बाद भी मैन्यूफैक्चरिंग का अब तक का सबसे ख़राब रिकॉर्ड है.’

The Prime Minister, Shri Narendra Modi and the Prime Minister of Japan, Mr. Shinzo Abe at Ground Breaking ceremony of Mumbai-Ahmedabad High Speed Rail Project, at Ahmedabad, Gujarat on September 14, 2017. The Governor of Gujarat, Shri O.P. Kohli, the Union Minister for Railways and Coal, Shri Piyush Goyal, the Chief Minister of Gujarat, Shri Vijay Rupani and the Chief Minister of Maharashtra, Shri Devendra Fadnavis are also seen.
अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन शिलान्यास कार्यक्रम (फोटो: पीआईबी)
2022 में बुलेट ट्रेन के आगमन को लेकर आशावाद के संचार में बुराई नहीं है. नतीजा पता है फिर भी उम्मीद है तो यह अच्छी बात है. मोदी सरकार ने हमें अनगिनत इवेंट दिए हैं. जब तक कोई इवेंट याद आता है कि अरे हां, वो भी तो था,उसका क्या हुआ, तब तक नया इवेंट आ जाता है. सवाल पूछकर निराश होने का मौका ही नहीं मिलता.
जनता को आशा-आशा का खो-खो खेलने के लिए प्रेरित कर दिया जाता है. प्रेरणा की तलाश में वो प्रेरित हो भी जाती है. होनी भी चाहिए. फिर भी ईमानदारी से देखेंगे कि जितने भी इवेंट लांच हुए हैं, उनमें से ज़्यादातर फेल हुए हैं. बहुतों के पूरा होने का डेट 2019 की जगह 2022 कर दिया गया है. शायद किसी ज्योतिष ने बताया होगा कि 2022 कहने से शुभ होगा!
काश कोई इन तमाम इवेंट पर हुए खर्चे का हिसाब जोड़ देता. पता चलता कि इनके इवेंटबाज़ी से इवेंट कंपनियों का कारोबार कितना बढ़ा है. ठीक है कि विपक्ष नहीं है, 2019 में मोदी ही जीतेंगे, शुभकामनाएं, इन दो बातों को छोड़कर तमाम इवेंट का हिसाब करेंगे तो लगेगा कि मोदी सरकार अनेक असफल योजनाओं की सफल सरकार है.
इस लाइन को दो बार पढ़िये. एक बार में नहीं समझ आएगा.
2016-17 के रेल बजट में बड़ोदरा में भारत की पहली रेल यूनिवर्सिटी बनाने का प्रस्ताव था. उसके पहले दिसंबर 2015 में मनोज सिन्हा ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का ऐलान किया था. अक्टूबर 2016 में खुद प्रधानमंत्री ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का ऐलान किया. सुरेश प्रभु जैसे कथित रूप से काबिल मंत्री ने तीन साल रेल मंत्रालय चलाया लेकिन आप पता कर सकते हैं कि रेल यूनिवर्सिटी को लेकर कितनी प्रगति हुई है.
इसी तरह 2014 में देश भर से लोहा जमा किया गया कि सरदार पटेल की प्रतिमा बनेगी. सबसे ऊंची. 2014 से 17 आ गया. 17 भी बीत रहा है. लगता है इसे भी 2022 के खाते में शिफ्ट कर दिया गया है. इसके लिए तो बजट में कई सौ करोड़ का प्रस्ताव भी किया गया था.
2007 में गुजरात में गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (गिफ्ट) और केरल के कोच्चि में स्मार्ट सिटी की बुनियाद रखी गई. गुजरात के गिफ्ट को पूरा होने के लिए 70-80 हज़ार करोड़ का अनुमान बताया गया था. दस साल हो गए दोनों में से कोई तैयार नहीं हुआ. गिफ्ट में अभी तक करीब 2,000 करोड़ ही ख़र्च हुए हैं. दस साल में इतना तो बाकी पूरा होने में बीस साल लग जाएगा.
अब स्मार्ट सिटी का मतलब बदल दिया गया है. इसे डस्टबिन लगाने, बिजली का खंभा लगाने, वाई-फाई लगाने तक सीमित कर दिया गया. जिन शहरों को लाखों करोड़ों से स्मार्ट होना था वो तो हुए नहीं, अब सौ दो सौ करोड़ से स्मार्ट होंगे. गंगा नहीं नहा सके तो जल ही छिड़क लीजिए जजमान.
गिफ्ट सिटी की बुनियाद रखते हुए बताया जाता था कि दस लाख रोज़गार का सृजन होगा मगर कितना हुआ, किसी को पता नहीं. कुछ भी बोल दो. गिफ्ट सिटी तब एक बडा इवेंट था, अब ये इवेंट कबाड़ में बदल चुका है. एक दो टावर बने हैं, जिसमें एक अंतर्राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज का उदघाटन हुआ है.
The Prime Minister, Shri Narendra Modi inaugurating the India International Exchange (India’s first International Stock Exchange) by hitting the gong at GIFT City, Gandhinagar, Gujarat on January 09, 2017. The Minister of State for Finance and Corporate Affairs, Shri Arjun Ram Meghwal is also seen.
जनवरी 2017 को गांधीनगर, गुजरात में देश के पहले अंतरराष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज का उद्घाटन (फोटो: पीआईबी)
आप कोई भी बिजनेस चैनल खोलकर देख लीजिए कि इस एक्सचेंज का कोई नाम भी लेता है या नहीं. कोई 20-25 फाइनेंस कंपनियों ने अपना दफ्तर खोला है जिसे दो ढाई सौ लोग काम करते होंगे. हीरानंदानी के बनाए टावर में अधिकांश दफ्तर ख़ाली हैं.
लाल किले से सांसद आदर्श ग्राम योजना का ऐलान हुआ था. चंद अपवाद की गुंजाइश छोड़ दें तो इस योजना की धज्जियां उड़ चुकी हैं. आदर्श ग्राम को लेकर बातें बड़ी-बड़ी हुईं, आशा का संचार हुआ मगर कोई ग्राम आदर्श नहीं बना. लाल किले की घोषणा का भी कोई मोल नहीं रहा.
जयापुर और नागेपुर को प्रधानमंत्री ने आदर्श ग्राम के रूप में चुना है. यहां पर प्लास्टिक के शौचालय लगाए गए. क्यों लगाए गए? जब सारे देश में ईंट के शौचालय बन रहे हैं तो प्रदूषण का कारक प्लास्टिक के शौचालय क्यों लगाए गए? क्या इसके पीछ कोई खेल रहा होगा?
बनारस में क्योटो के नाम पर हेरिटेज पोल लगाया जा रहा है. ये हेरिटेज पोल क्या होता है. नक्काशीदार महंगे बिजली के पोल हेरिटेज पोल हो गए? ई नौका को कितने ज़ोर-शोर से लांच किया गया था. अब बंद हो चुका है. वो भी एक इवेंट था, आशा का संचार हुआ था. शिंजो आबे जब बनारस आए थे तब शहर के कई जगहों पर प्लास्टिक के शौचालय रख दिए गए. मल मूत्र की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं हुई. जब सड़ांध फैली तो नगर निगम ने प्लास्टिक के शौचालय उठाकर डंप कर दिया.
जिस साल स्वच्छता अभियान लांच हुआ था तब कई जगहों पर स्वच्छता के नवरत्न उग आए. सब नवरत्न चुनते थे. बनारस में ही स्वच्छता के नवरत्न चुने गए. क्या आप जानते हैं कि ये नवरत्न आज कल स्वच्छता को लेकर क्या कर रहे हैं.
बनारस में जिसे देखिए कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसबिलिटी का बजट लेकर चला आता है और अपनी मर्ज़ी का कुछ कर जाता है जो दिखे और लगे कि विकास है. घाट पर पत्थर की बेंच बना दी गई जबकि लकड़ी की चौकी रखे जाने की प्रथा है. बाढ़ के समय ये चौकियां हटा ली जाती थीं. पत्थर की बेंच ने घाट की सीढ़ियों का चेहरा बदल दिया है. सफेद रौशनी की फ्लड लाइट लगी तो लोगों ने विरोध किया. अब जाकर उस पर पीली पन्नी जैसी कोई चीज़ लगा दी गई है ताकि पीली रौशनी में घाट सुंदर दिखे.
प्रधानमंत्री के कारण बनारस को बहुत कुछ मिला भी है. बनारस के कई मोहल्लों में बिजली के तार ज़मीन के भीतर बिछा दिए गए हैं. सेना की ज़मीन लेकर पुलवरिया का रास्ता चौड़ा हो रहा है जिससे शहर को लाभ होगा. टाटा मेमोरियल यहां कैंसर अस्पताल बना रहा है. रिंग रोड बन रहा है. लालपुर में एक ट्रेड सेंटर भी है.
क्या आपको जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट याद है? आप जुलाई 2014 के अख़बार उठाकर देखिए, जब मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में जलमार्ग के लिए 4,200 करोड़ का प्रावधान किया था तब इसे लेकर अखबारों में किस किस तरह के सब्ज़बाग़ दिखाए गए थे. रेलवे और सड़क की तुलना में माल ढुलाई की लागत 21 से 42 प्रतिशत कम हो जाएगा. हंसी नहीं आती आपको ऐसे आंकड़ों पर.
Published in March Financial Express clipping
26 मार्च 2017 को ‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ अख़बार में छपे आंकड़ें
जल मार्ग विकास को लेकर गूगल सर्च में दो प्रेस रिलीज़ मिली है. एक 10 जून 2016 को पीआईबी ने जारी की है और एक 16 मार्च 2017 को. 10 जून 2016 की प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि पहले चरण में इलाहाबाद से लेकर हल्दिया के बीच विकास चल रहा है. 16 मार्च 2017 की प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि वाराणसी से हल्दिया के बीच जलमार्ग बन रहा है. इलाहाबाद कब और कैसे ग़ायब हो गया, पता नहीं.
2016 की प्रेस रिलीज़ में लिखा है कि इलाहाबाद से वाराणसी के बीच यात्रियों के ले जाने की सेवा चलेगी ताकि इन शहरों में जाम की समस्या कम हो. इसके लिए 100 करोड़ के निवेश की सूचना दी गई है. न किसी को बनारस में पता है और न इलाहाबाद में कि दोनों शहरों के बीच 100 करोड़ के निवेश से क्या हुआ है.
यही नहीं 10 जून 2016 की प्रेस रिलीज़ में पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ सेवा शुरू होने का ज़िक्र है. क्या किसी ने इस साल पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ चलते देखा है? एक बार क्रूज़ आया था, फिर? वैसे बिना किसी प्रचार के कोलकाता में क्रूज़ सेवा है. काफी महंगा है.
जुलाई 2014 के बजट में 4,200 करोड़ का प्रावधान है. कोई नतीजा नज़र आता है? वाराणसी के रामनगर में टर्मिनल बन रहा है. 16 मार्च 2017 की प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि इस योजना पर 5,369 करोड़ ख़र्च होगा और छह साल में योजना पूरी होगी. 2014 से छह साल या मार्च 2017 से छह साल?
प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि राष्ट्रीय जलमार्ग की परिकल्पना 1986 में की गई थी. इस पर मार्च 2016 तक 1,871 करोड़ खर्च हो चुके हैं. अब यह साफ नहीं कि 1986 से मार्च 2016 तक या जुलाई 2014 से मार्च 2016 के बीच 1,871 करोड़ ख़र्च हुए हैं. जल परिवहन राज्य मंत्री ने लोकसभा में लिखित रूप में यह जवाब दिया था.
नमामि गंगे को लेकर कितने इवेंट रचे गए. गंगा साफ ही नहीं हुई. मंत्री बदल कर नए आ गए हैं. इस पर क्या लिखा जाए. आपको भी पता है कि एनजीटी ने नमामि गंगे के बारे में क्या क्या कहा है.
13 जुलाई 2017 के इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा है कि दो साल में गंगा की सफाई पर 7,000 करोड़ ख़र्च हो गए और गंगा साफ नहीं हुई. ये 7,000 करोड़ कहां ख़र्च हुए? कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगा था क्या? या सारा पैसा जागरूकता अभियान में ही फूंक दिया गया? आप उस आर्डर को पढ़ंगें तो शर्म आएगी. गंगा से भी कोई छल कर सकता है?
Make in india Modi Reuters
(फोटो: रॉयटर्स)
इसलिए ये इवेंट सरकार है. आपको इवेंट चाहिए इवेंट मिलेगा. किसी भी चीज़ को मेक इन इंडिया से जोड़ देने का फन सबमें आ गया जबकि मेक इन इंडिया के बाद भी मैन्यूफैक्चरिंग का अब तक का सबसे ख़राब रिकॉर्ड है।      रवीश कुमार  NDTV 

Thursday, September 14, 2017

हे हिंदी तू मेरी माँ सी प्यारी!

माँ सी प्यारी,
सबसे न्यारी

गर्व दिलाती, ईठलाती सी,
कोमल सी,
मेरी हिंदी मेरे भारत के माथे की बिंदी

बोलूँ  तो तू मुझे मेरी बहना सी लगे,
लिखूं तो बीवी का गहना

हिंदी तेरे रूप अनेक,
तू अरबों के प्राण स्वरूप
मैं क्या तेरा बखान करूँ
तेरे में समाए  प्रेमचंद और
मैेथिलीशरण जैसे महापुरुष अनेक

नमन हो सुमित्रा नंदन पंत को या
राष्ट्र कवि दिनकर को
 जिन्होंने
तेरा शृंगार किया वीर रस में या
 गौरव दिलाया कवि प्रदीप ने भक्ति रस में और
ह गौरव दिलाया मेरे भारत को अपने गीतों में


हे हिंदी तू मेरे हृदय में रहना,
मेरी माँ बन कर।
मेरी माँ बन कर।। 

Thursday, August 31, 2017

हे ! मेघ मल्हार

तूने यह कौन से गीत गाए?


माँगी थी पानी की चँद बूँदे ,


तन को शीतल करने के लिए,


सोचा था तू आएगा खुशियाँ लाएगा ,हरियाली छाएगी।


तन मन की ऊष्मता भगाएगा


पर हे !
मेघ मल्हार तूने यह कौन से गीत गाए ?


सोचा था , पढ़ा था ,


शुक -शुकी के गीतों के बारे में ,


राधा -कृष्ण की लीला के बारे में ,

सुना भी था -कोयल की कूकू के बारे में ,
सुना भी था ,पढ़ा भी था ,और भी बहुत कुछ अच्छा-अच्छा


पर हे ! मेघ मल्हार तूने यह कैसे गीत सुनाये


मैं सह भी जाता , मैं रह भी जाता ,


अगर इसमें होती किसी राधा की व्याकुलता ,


अपनें कृष्ण से मिलने की ,


पर अब मैं अपने मन की वेदना को ,


कैसे छुपाऊँ , हे !मेघ मल्हार तेरे


गीतों की त्रासदी मैं किस निर्ममता


से किस -किस को बताऊँ ,


हे !मेघ मल्हार तू ही मेरा दर्द जान ले ,


मुझमें छिपे एक इंसान को तू पहचान ले ,

हे! मेघ मल्हार ,

हे!मेघ मल्हार ,

हे! मेघ मल्हार । 

Tuesday, August 29, 2017

तू पास हो इस दिल को गवारा नहीं

मुझे तुमसे मोहब्बत है ये मेरी दीवानगी है
हर लम्हा तन्हाई हो बस हर लम्हे में तेरी  याद
तू पास हो  इस दिल को गवारा नहीं
ख्याल हो खयालात हो
बात हो बात में फिर कोई बात हो
सूना दिन हो या  रात हो और रात में चाँद सितारों से बात हो
बस ये दीवानगी मेरे पास हो
तू पास हो इस दिल को गवारा नहीं
समंदर की लहरों में
          न ढूंढा करूँ
नदी के भंवर में
         न  तलाश करूँ
पर्वतों की चोटियों से
        न  पुकारा करूँ
 दीवानगी से अपनी मोहब्बत को
             न  निहारा करूँ
बस यादों में समेट कर तेरी यादें
मुझे ये ख्याल आये   कि तू  आयी
कयोंकि
 तू पास हो इस दिल को गवारा नहीं

Tuesday, August 15, 2017

मेरा भारत महान!

बिलकुल ठीक पड़ा आपने   
जान सस्ती ईमान सस्ता बिकता है
  पूरा हिन्दुस्तान
  हो यकीं  
तो पड़ लो  
आज का पेपर मेरी जान 
लड़ते- झगड़ते यहां के लोग 
  सड़के टूट  रही हैं   
पानी-बिजली  नहीं है दिल्ली जैसे शहरों में
पता नहीं मैं कहा रह रहा हूँ
 सब कुछ भगवान भरोसे हैं
और मोदीजी के अच्छे दिन तो दूर की 
कोड़ी है 
बुरे दिनों की बरसात हो रही है  
15 अगस्त 2017   आज़ादी की  71 वीं  वर्षगांठ 
बातें अच्छी हैं : जब मैं देखता हूं इराक 
जब मैं देखता हूं पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को 
बातें अच्छी हैं  :जब मैं देखता हूं सीरिया या यूक्रेन  को 
तो बस एक खबर अच्छी है: कि मैं अपने हिन्दुस्तान को 
मिलाऊँ तो इन्हीं देशों से। 
और अमेरिका या चीन  और जापान या ऑस्ट्रेलिया 
से मिलाना एक जुर्म हो गया।
प्रिय नरेश ,
आज १५ अगस्त हैं सुबह सात बजे टीवी पर लालकिले का  कार्यक्रम   चल रहा था।
पहले झंडा फहराने के वक़्त जनगण मन हुआ।   कुछ याद आया ,
फिर मन हुआ कि साथ-साथ गाऊँ। पर वक़्त गुजर गया और फिर एक बहुत ही कमजोर भाषण हुआ।
 पर अंत में फिर जनगण मन शुरू हुआ, इस बार मेरी  आँखों में आसूँ भर आये   और
मैं जनगण मन गाने लगा।
फिर मैंने 'हकीकत' मूवी देखी। उसके बाद
जाने 'मैं ' कहाँ  खो गया।
 सिर्फ १५ अगस्त की ही बात नहीं हैं,
 वो आदर्शवाद की बाते।
वो सपने।
शायद मैं अब जहाँ हूँ   वहाँ से मुड़कर कुछ कर पाना  शायद बहुत कठिन हैं
समाज को बदलना , नयी सोच लाना शायद सड़े गले शब्द हैं
क्योंकि
हम इस समाज के हिस्से- कायर हैं , डरपोक हैं।
गाँधी का नाम लेकर  प्रसन्न होते हैं।
और
भगवान् से डरते हैं
 प्यार करना शायद हमें  आता नहीं।
बाकी फिर लिखूँगा ।

 वैसे सच बात ये हैं कि
अब मौत बेवफा लगती हैं            और
जिंदगी का मत पूछ मेरे यार क्योंकि
संगदिल बातों पे यकीं मुझे कम हो चला हैं

कुछ तुम कहो।  एक बात रह गयी शायद --ये  गाना सुनना --मुकेश का (फिर सुबह होगी )
"आसमान पे है खुदा और ज़मीन पे हम
आजकल वो इस तरफ देखता है कम

Tuesday, June 27, 2017

झूठ की ताकत से सभ्यताओं का विनाश !

सद्दाम हुसैन का इराक ताकतवर तो था ही, अरब दुनिया का सबसे प्रगतिशील देश था। महिलाओं की आजादी, शिक्षा और कामकाज में सबसे आगे। इतना सेक्युलर कि उनका विदेश मंत्री एक ईसाई था- तारिक अजीज। क्या अमेरिका में दम है कि किसी मुसलमान को विदेश मंत्री बना दे? हुसैन में दम था कि उन्होंने तेल के दाम डॉलर की जगह यूरो में तय करके अमेरिका को बौखला दिया था।  अमिट मेसोपोटामिया सभ्यता के वारिस इराक को हमारी आंखों के सामने मिटाया गया, दुनिया के सबसे खतरनाक बमों के जोर से। लाखों की संख्या में बच्चों और औरतों का कत्ल हुआ। लोग भूख और बीमारी से तड़प-तड़पकर मरे। तब जाकर उस देश में आईएसआईएस को पनपने की जमीन मिली, जिस देश से सद्दाम हुसैन ने मजहबी कट्टरता की जडें़ उखाड़ दी थीं। इराक के खिलाफ यह सब एक झूठ के सहारे हुआ। झूठ यह कि इराक महाविनाशक हथियार बना रहा है। सफेद झूठ था। बाद में साबित हो गया। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर पर जान-बूझकर झूठ बोल देश को युद्ध में घसीटने का मुकदमा चला, जिसमें आरोप सच पाए गए। यह सब ऐन हमारी आंखों के सामने हुआ। इसलिए झूठ की ताकत को हल्के में मत लीजिए। यह सभ्यताओं को सचमुच बर्बाद कर सकती है।

Thursday, February 23, 2017

पराकाष्ठा! समाज में



निरंतर चलते रहना, बिना रुके या थके,
यही संसार की प्रकृति या स्वभाव है.
यहाँ दुखसुख लाभहानि जयपराजय सब
साथसाथ गंधे से कंधा मिला चलते हैं.
अभी अलसुबह जहाँ किसी की अर्थी उठी,
वहीं शाम को पूरे जश्न के साथ शादी की शहनाई
भी बज सकती है, बिना किसी संवेदना के.
कई मर्तबा तो ऐसा भी घट जाता है कि
एक ही घर में किसी आप्त की मृत्यु घट जाने पर
उसके शव को कमरे में बंद कर
पहले पूर्वनियोजित मांगलिक कार्य निपटा लिया
जाता है, फिर मरणहार का दाहसंस्कार
श्मशान ले जाकर यंत्रवत् कर लिया जाता है.
संवेदना की कहीं छुअन महसूस नहीं होती.

यह किस तरह के संवेदनशून्य माहौल में
हम जीने के लिये अभिशप्त होते जा रहे हैं?
जहाँ मानवीय भावनाएँ निरंतर क्षरित होती
चली जा रही हैं.

Wednesday, February 22, 2017

आदमखोर हो चुका आदमी

आदमखोर हो चुका आदमी
खाने का बहुत शौकीन है?
पर अपनी आदत से मजबूर है
ये गुलिस्तां मेरा हिंदुस्तान था?
पर यहाँ जब से शौक आया
थोक के भाव आया
कभी लूटा करते थे महजब के नाम पर
अब लूट गए ऐ वतन तेरे नाम पर?
ये आदमी
कभी लूट करते थे जात के नाम पर
अब लूट गए विकास के नाम पर?
ये आदमी
आदमी की इस कौम में बड़ा दम है?
जीता आया ?
हर तूफ़ान से लड़ता आया
कभी 1857 लड़ा तो कभी
1947 जीता ?
कभी लड़कर 62 में हारा तो
कभी 71 में जीता ?
हारा या जीता ? पर लड़ते -लड़ते बन  गया आदमखोर
कभी जमीर बेच कर जमीन निगल गया
तो कभी दिमाग बेच कर अपने रिश्तो को पी गया
खाने का ये शौकीन आदमी ,नहीं मालूम इसे
हदों की लकीर पर खड़ा ये आदमी





Sunday, February 5, 2017

विश्व स्तर पर भारत ---- सुपर पावर और विश्व गुर ?????



विश्व स्तर पर भारत की दो बड़ी राजनीतिक चाहते हैं। सुपर पावर और विश्व गुरु बनना।वैसे इस वक्त विश्व गुरु कौन है,कौन संस्था यह सर्टिफिकेट देती है,यह सब ज्ञात नहीं है।विश्व गुरु बनने के बाद की भूमिका का कोई ब्लू प्रिंट या योजना हमारे सामने नहीं है।हम सुपर पावर बनने के लिए अमरीका का हथियार ख़रीद रहे हैं,हथियार बेचकर सुपर पावर बना जाता है या ख़रीदकर,कुछ साफ नहीं है। सुपर पावर बनकर हम भी इराक और सीरिया में जाकर युद्ध करेंगे या युद्ध के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायेंगे। ज़रा गूगल कीजिए,मौजूदा विश्व में चल रहे युद्ध का भारत ने कब कब विरोध किया है। कब नाम लेकर किसी की आलोचना की है।

भारत गांधी और बुद्ध की धरती होने का गौरव भी रखना चाहता है,शांति और अहिंसा का पुजारी भी कहलाना चाहता है लेकिन सुपर पावर भी बन कर रहेगा।विचित्र किस्म की टूटी फूटी राजनीतिक समझ वाले इस मुल्क में ग्लोबल लीडर बनने का ख़्वाब समझ नहीं आता है।क्या विश्व गुरु बनने का इतना ही मतलब है कि हम केवल योग का वीडियो सीडी बनाकर बेचेंगे? आप्रवासियों और शरणार्थियों को लेकर पूरी दुनिया में बहस हो रही है। क्या भारत के पक्ष-विपक्ष के नेता,कंपनी प्रमुख कुछ बोल रहे हैं? कोई ग्लोबल आवाज़ भारत से उठ रही है?

वसुधैव कुटुंबकम का नारा देते देते हम कई मुल्कों के कुटुंब बन गए।क्या आपने सुना है कि भारत का कोई राष्ट्र प्रमुख या विदेश मंत्री शरणार्थियों का स्वागत कर रहा हो?दुनिया भर में आप्रवासियों के ख़िलाफ हो रही राजनीति का विरोध कर रहा हो? आज पूरी दुनिया में दूसरे मुल्कों के लोग काम करने जाते हैं।इसका लाभ भारत को भी मिला है। केरल, पंजाब,गुजरात तो आप्रवासी भारतीयों के उत्पादक राज्य हैं।उन राज्यों इसे लेकर किस तरह की बहस हो रही है। इन राज्यों के लाखों लोगों को उन्मुक्त प्रवासी माहौल से लाभ मिला है।भारत की मीडिया में इसी की वाहवाही है कि ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से बात कर ली।


कनाडा के प्रधानमंत्री ट्वीट कर युद्ध और हिंसा के सताये लोगों का स्वागत करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की ट्रंप की नीतियों पर क्या राय है,कहीं कोई सवाल नहीं है।कम से कम प्रधानमंत्री यही कह दें कि वे ट्रंप के साथ हैं। ग्लोबल लीडरशिप चुप रहकर नहीं मिलती है।

भारत में दुनिया के स्तर पर शांति और अहिंसा का दुकान चलाने वालों की कोई कमी नहीं है। हमारे मुल्क का कोई नेता यह नहीं कहता कि युद्ध और हिंसा से विस्थापितों के लिए भारत के दरवाज़े खुले हैं। सिर्फ भारत के पास है विस्थापितों के दुखों को दूर करने की आध्यात्मिक शक्ति है। जर्मनी, ब्रिटेन और अमरीका में कितनी बहस चल रही है। विरोधी हैं तो समर्थक भी हैं। इन तमाम देशों में भारतीय हैं मगर भारत में इन मसलों पर कोई बहस नहीं है। हम ग्लोबल नागरिक होना चाहते हैं मगर इसके नाम पर नौकरी लेने से अलावा हमारा कोई बड़ा सपना नहीं है। हमारे लिए वसुधैव कुटुंबकम सिर्फ एक दिखावटी नारा है।  अगर हमारा इसमें यकीन है तो भारत अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के ख़िलाफ़ बोलता क्यों नहीं है। कम से कम बोलकर समर्थन ही कर दे कि ट्रंप की बात में दम है।

ईरान ने अमरीकी नागरिकों का वीज़ा ही रद्द कर दिया।ऐसा करते वक्त उसने चीन,रूस और पड़ोसी देशों के साथ सामरिक संबंधों का हिसाब किताब नहीं किया।बैन होने वाले बाकी के छह देश चुप हैं।ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मे  ने कहा है कि अमरीका का मामला है,वो जानें,हमारा मामला है,हम जान रहे हैं।फ्रांस के राष्ट्रपति ने खुलकर कहा है कि यूरोप को जवाब देने की ज़रूरत है। जर्मनी के विदेश मंत्री ने कहा है कि यह समय शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का है।मुल्कों के बीच दूरियां बनाने का वक्त नहीं है।अपनी ज़िंदगी की पनाह के लिए शरण मांगने वालों की मदद करना एक ऐसा मानवीय मूल्य है जिसे अमरीका और यूरोप दोनों ही साझा करते हैं।क्या ये बातें भारत के नेताओं को नहीं करनी चाहिए?सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ही चुप नहीं हैं,बाकी तमाम नेताओ को भी लगता है बोलना नहीं आता है। क्या प्रवासी बन कर दुनिया भर के अवसरों का लाभ उठा रहे भारतीयों को नहीं बोलना चाहिए?

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने एक्ज़िक्यटिव आर्डर से इराक़, ईरान,सूडान,सोमालिया,सीरिया,यमन और लिबिया से आने वालों पर रोक लगा दी है। फेसबुक के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग ने कहा है कि जिनसे वाक़ई ख़तरा है उनसे चौकस रहने की ज़रूरत है मगर हमें अपने दरवाज़े शरणार्थियों के लिए खुले रखने चाहिए। बिजनेस स्टैंडर्ड ने ज़ुकरबर्ग और सुंदर पिचाई के बयान को पहले पन्ने पर विस्तार से छापा है। ख़बर पढ़कर लगा कि गूगल के कोई सौ कर्मचारी प्रभावित हुए हैं, जो उन सात देशों से आते हैं जहां से शरणार्थियों के आने पर अस्थायी रोक लगाई गई है। इसके बाद भी भारतीय मूल के सुंदर पिचाई ने प्रवासियों और शरणार्थियों के आगमन पर रोक की नीति की आलोचना की है। ट्वीटर ने कहा है कि ट्वीटर को सभी धर्मों के इमिग्रेंट यानी प्रवासियों ने बनाया है। हम उनके साथ है। अगर भारत में ही कोई कंपनी ऐसी बात कह दे तो उसके उत्पादों के न ख़रीदने का अभियान चल पड़ेगा।

ये भी अमरीका की खूबी है। भारत में गूगल प्रमुख सुंदर पिचाई होते तो शरणार्थियों को बाहर निकालने की राजनीति का समर्थन कर रहे होते। वर्ना लफंगों की टोली उनके उत्पाद का बहिष्कार करने का एलान करने लगती। हम दबी ज़ुबान में चर्चा कर रहे हैं कि ट्रंप के संरक्षणवाद के कारण भारत के आईटी उद्योग पर क्या असर पड़ेगा। ख़तरे की आहट है मगर कहीं कोई बयान नहीं है। कोई प्रदर्शन नहीं है।
भारत की किसी साफ्टवेयर कंपनी या उसके सीईओ की आवाज़ मुखर नहीं है। क्या यही है उस भारत का आत्मविश्वास जो विश्व गुरु और सुपर पारव बनने के ज्वाइंट एंट्रेंस एग्ज़ाम की कोचिंग कर रहा है? हर चुनाव में कोई न कोई एलान कर देता है कि भारत को विश्व गुरु बनाना है। हमारी तैयारी पूरी हो गई है। पता चलता है कि भारत अभी तक वेटिंग लिस्ट में ही अपना नाम खोज रहा है। अमरीका के तमाम एयरपोर्ट पर इस ठंड में प्रदर्शन करने निकले हैं। अपना अपना बैनर पोस्टर लेकर गए हैं।

क्या आपने दुनिया भर के देशों में जाकर अपने सपनों को साकार करने वाले युवाओं को फेसबुक पर ही तिब्बती शरणार्थियों के समर्थन में लिखते बोलते देखा है? मुझे शरणार्थी नीति की कोई जानकारी नहीं है,मगर जब भी तिब्बती शरणार्थी प्रदर्शन करते है, उनका कोई साथ नहीं देता। कई बार लगता है कि स्वेटर और मोमो बेचना ही उनका एकमात्र ज़रिया है। हमें जानना चाहिए कि यहां की नौकरियों में उनकी क्या जगह है।  पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचार पर तमाम तरह की सांप्रदायिक राजनीति होती है मगर संवैधानिक पद पर बैठा नेता न तो कल बोलता था न आज बोलता है। ऐसे मुद्दे सभी के लिए दुर्भावना फैलाने के काम आते हैं।
 हम पूरी दुनिया में शरणार्थियों और आप्रवासियों को लेकर हो रही बहस से दूर हैं। चुप हैं।

आतंकवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में अमरीका की क्या भूमिका रही है? उसकी या तमाम मुल्कों की नीतियों और चुप्पियों ने आतंकवाद को पैदा किया या वाकई हम इतने मासूम हैं कि यही मानते चलेंगे कि आतंकवाद मज़हब की किताब से पैदा होता है। इराक में अमरीका और ब्रिटेन का क्या भूमिका थी? यह जानना हो तो ब्रिटेन की चिल्कॉट कमेटी की रिपोर्ट पढ़िये। यह रिपोर्ट बताती है कि सद्दाम के पास कुछ नहीं था,मगर मीडिया के ज़रिये एक प्रोपेगैंडा तैयार किया गया और एक मुल्क को झूठ की बुनियाद पर तबाह कर दिया गया। चिल्कॉट रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार की रिपोर्ट थी जो कई साल की जांच के बाद तैयार किया था।ब्रिटेन के दो तीन सौ सैनिक इराक युद्ध में मारे गए थे। इसी को लेकर जांच हुई थी। जब यह रिपोर्ट पेश हो रही थी तो शहीद सैनिकों के परिजन तब के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को आतंकवादी कह रहे थे।ब्रिटेन के अखबारों ने हेडलाइन छापा था कि ब्लेयर आतंकवादी है।

 रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी आरोप लगाया था कि कई देश आईसीस के साथ तेल का धंधा कर रहे हैं।ईरान के लोग पूछ रहे हैं कि 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले में शामिल 19 आतंकवादी लेबनॉन,ईजिप्ट, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से आए थे।इन देशों पर तो कोई बैन नहीं लगा है।क्या आपको यह बात विचित्र नहीं लगती,दुनिया के मसले पर बिना कुछ बोले ही भारत विश्व गुरु बन जाना चाहता है? क्या गुरु की यही भूमिका होनी चाहिए? क्या भारत ट्रंप की तरह इन सात देशों को आतंकवादी मानता है? अगर मानता है तो वो क्यों चुप है? क्यों नहीं कहता है कि हम इन मुल्कों के साथ कोई संबंध नहीं रखेंगे?