Saturday, August 3, 2013

मैं और सिर्फ मैं

मैं हूँ , या हम है
या मैं और तुम है
या सिर्फ फिर
मैं ही हूँ
बहुत कोशिश की है  तलाश करने की
पर मुझे कुछ समझ
 नहीं आ रहा है
और कुछ अर्थ निकलता भी दिखाई
नहीं दे रहा,
कि
'हम' है , तुम है या सिर्फ मैं हूँ
कारण -मैं और मैं  से लगता है कि
मैं व्यर्थ ही, अहं को बड़ा रहा हूँ
एक मैं को लाकर ,
 दूसरे  मैं को  भुला रहा हूँ
इसलिए बहुत कोशिश की है
लेकिन
कुछ समझ नहीं आ रहा है
कारण -'मैं' और 'तुम'    व्यर्थ  नहीं है
क्योंकि  इसमें  दूरी  शब्द का
बहुत व्यापक अर्थ है
और
इस शब्द से मुझे बहुत चिढ है
इसलिए तलाश कर रहा हूँ
मुझे मिला 'हम'
अब कारण -'हम ' बहुत सुंदर है
पर इसकी व्यापकता में
 मैं खो जाऊगा
तो सब व्यर्थ है
 और   दूरी फिर आएगी
और
नहीं ये सब गलत है
अब मैं तलाश नहीं करूँगा ,
'मैं'  को  पहचानने की कोशिश करूँगा
क्योंकि  मैं जब चाहूँ
इस 'मैं ' में  स्वाभिमान -अभिमान महूसस करूँगा
या फिर स्वाभिमान - अभिमान
  को मिटाकर
एक विरंचना करूँगा
इसलिए
मैं और तुम नहीं
'मैं' और हम नहीं
मैं और सिर्फ मैं

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