Tuesday, June 27, 2017

झूठ की ताकत से सभ्यताओं का विनाश !

सद्दाम हुसैन का इराक ताकतवर तो था ही, अरब दुनिया का सबसे प्रगतिशील देश था। महिलाओं की आजादी, शिक्षा और कामकाज में सबसे आगे। इतना सेक्युलर कि उनका विदेश मंत्री एक ईसाई था- तारिक अजीज। क्या अमेरिका में दम है कि किसी मुसलमान को विदेश मंत्री बना दे? हुसैन में दम था कि उन्होंने तेल के दाम डॉलर की जगह यूरो में तय करके अमेरिका को बौखला दिया था।  अमिट मेसोपोटामिया सभ्यता के वारिस इराक को हमारी आंखों के सामने मिटाया गया, दुनिया के सबसे खतरनाक बमों के जोर से। लाखों की संख्या में बच्चों और औरतों का कत्ल हुआ। लोग भूख और बीमारी से तड़प-तड़पकर मरे। तब जाकर उस देश में आईएसआईएस को पनपने की जमीन मिली, जिस देश से सद्दाम हुसैन ने मजहबी कट्टरता की जडें़ उखाड़ दी थीं। इराक के खिलाफ यह सब एक झूठ के सहारे हुआ। झूठ यह कि इराक महाविनाशक हथियार बना रहा है। सफेद झूठ था। बाद में साबित हो गया। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर पर जान-बूझकर झूठ बोल देश को युद्ध में घसीटने का मुकदमा चला, जिसमें आरोप सच पाए गए। यह सब ऐन हमारी आंखों के सामने हुआ। इसलिए झूठ की ताकत को हल्के में मत लीजिए। यह सभ्यताओं को सचमुच बर्बाद कर सकती है।

Thursday, February 23, 2017

पराकाष्ठा! समाज में



निरंतर चलते रहना, बिना रुके या थके,
यही संसार की प्रकृति या स्वभाव है.
यहाँ दुखसुख लाभहानि जयपराजय सब
साथसाथ गंधे से कंधा मिला चलते हैं.
अभी अलसुबह जहाँ किसी की अर्थी उठी,
वहीं शाम को पूरे जश्न के साथ शादी की शहनाई
भी बज सकती है, बिना किसी संवेदना के.
कई मर्तबा तो ऐसा भी घट जाता है कि
एक ही घर में किसी आप्त की मृत्यु घट जाने पर
उसके शव को कमरे में बंद कर
पहले पूर्वनियोजित मांगलिक कार्य निपटा लिया
जाता है, फिर मरणहार का दाहसंस्कार
श्मशान ले जाकर यंत्रवत् कर लिया जाता है.
संवेदना की कहीं छुअन महसूस नहीं होती.

यह किस तरह के संवेदनशून्य माहौल में
हम जीने के लिये अभिशप्त होते जा रहे हैं?
जहाँ मानवीय भावनाएँ निरंतर क्षरित होती
चली जा रही हैं.

Wednesday, February 22, 2017

आदमखोर हो चुका आदमी

आदमखोर हो चुका आदमी
खाने का बहुत शौकीन है?
पर अपनी आदत से मजबूर है
ये गुलिस्तां मेरा हिंदुस्तान था?
पर यहाँ जब से शौक आया
थोक के भाव आया
कभी लूटा करते थे महजब के नाम पर
अब लूट गए ऐ वतन तेरे नाम पर?
ये आदमी
कभी लूट करते थे जात के नाम पर
अब लूट गए विकास के नाम पर?
ये आदमी
आदमी की इस कौम में बड़ा दम है?
जीता आया ?
हर तूफ़ान से लड़ता आया
कभी 1857 लड़ा तो कभी
1947 जीता ?
कभी लड़कर 62 में हारा तो
कभी 71 में जीता ?
हारा या जीता ? पर लड़ते -लड़ते बन  गया आदमखोर
कभी जमीर बेच कर जमीन निगल गया
तो कभी दिमाग बेच कर अपने रिश्तो को पी गया
खाने का ये शौकीन आदमी ,नहीं मालूम इसे
हदों की लकीर पर खड़ा ये आदमी





Sunday, February 5, 2017

विश्व स्तर पर भारत ---- सुपर पावर और विश्व गुर ?????



विश्व स्तर पर भारत की दो बड़ी राजनीतिक चाहते हैं। सुपर पावर और विश्व गुरु बनना।वैसे इस वक्त विश्व गुरु कौन है,कौन संस्था यह सर्टिफिकेट देती है,यह सब ज्ञात नहीं है।विश्व गुरु बनने के बाद की भूमिका का कोई ब्लू प्रिंट या योजना हमारे सामने नहीं है।हम सुपर पावर बनने के लिए अमरीका का हथियार ख़रीद रहे हैं,हथियार बेचकर सुपर पावर बना जाता है या ख़रीदकर,कुछ साफ नहीं है। सुपर पावर बनकर हम भी इराक और सीरिया में जाकर युद्ध करेंगे या युद्ध के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायेंगे। ज़रा गूगल कीजिए,मौजूदा विश्व में चल रहे युद्ध का भारत ने कब कब विरोध किया है। कब नाम लेकर किसी की आलोचना की है।

भारत गांधी और बुद्ध की धरती होने का गौरव भी रखना चाहता है,शांति और अहिंसा का पुजारी भी कहलाना चाहता है लेकिन सुपर पावर भी बन कर रहेगा।विचित्र किस्म की टूटी फूटी राजनीतिक समझ वाले इस मुल्क में ग्लोबल लीडर बनने का ख़्वाब समझ नहीं आता है।क्या विश्व गुरु बनने का इतना ही मतलब है कि हम केवल योग का वीडियो सीडी बनाकर बेचेंगे? आप्रवासियों और शरणार्थियों को लेकर पूरी दुनिया में बहस हो रही है। क्या भारत के पक्ष-विपक्ष के नेता,कंपनी प्रमुख कुछ बोल रहे हैं? कोई ग्लोबल आवाज़ भारत से उठ रही है?

वसुधैव कुटुंबकम का नारा देते देते हम कई मुल्कों के कुटुंब बन गए।क्या आपने सुना है कि भारत का कोई राष्ट्र प्रमुख या विदेश मंत्री शरणार्थियों का स्वागत कर रहा हो?दुनिया भर में आप्रवासियों के ख़िलाफ हो रही राजनीति का विरोध कर रहा हो? आज पूरी दुनिया में दूसरे मुल्कों के लोग काम करने जाते हैं।इसका लाभ भारत को भी मिला है। केरल, पंजाब,गुजरात तो आप्रवासी भारतीयों के उत्पादक राज्य हैं।उन राज्यों इसे लेकर किस तरह की बहस हो रही है। इन राज्यों के लाखों लोगों को उन्मुक्त प्रवासी माहौल से लाभ मिला है।भारत की मीडिया में इसी की वाहवाही है कि ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से बात कर ली।


कनाडा के प्रधानमंत्री ट्वीट कर युद्ध और हिंसा के सताये लोगों का स्वागत करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की ट्रंप की नीतियों पर क्या राय है,कहीं कोई सवाल नहीं है।कम से कम प्रधानमंत्री यही कह दें कि वे ट्रंप के साथ हैं। ग्लोबल लीडरशिप चुप रहकर नहीं मिलती है।

भारत में दुनिया के स्तर पर शांति और अहिंसा का दुकान चलाने वालों की कोई कमी नहीं है। हमारे मुल्क का कोई नेता यह नहीं कहता कि युद्ध और हिंसा से विस्थापितों के लिए भारत के दरवाज़े खुले हैं। सिर्फ भारत के पास है विस्थापितों के दुखों को दूर करने की आध्यात्मिक शक्ति है। जर्मनी, ब्रिटेन और अमरीका में कितनी बहस चल रही है। विरोधी हैं तो समर्थक भी हैं। इन तमाम देशों में भारतीय हैं मगर भारत में इन मसलों पर कोई बहस नहीं है। हम ग्लोबल नागरिक होना चाहते हैं मगर इसके नाम पर नौकरी लेने से अलावा हमारा कोई बड़ा सपना नहीं है। हमारे लिए वसुधैव कुटुंबकम सिर्फ एक दिखावटी नारा है।  अगर हमारा इसमें यकीन है तो भारत अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के ख़िलाफ़ बोलता क्यों नहीं है। कम से कम बोलकर समर्थन ही कर दे कि ट्रंप की बात में दम है।

ईरान ने अमरीकी नागरिकों का वीज़ा ही रद्द कर दिया।ऐसा करते वक्त उसने चीन,रूस और पड़ोसी देशों के साथ सामरिक संबंधों का हिसाब किताब नहीं किया।बैन होने वाले बाकी के छह देश चुप हैं।ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मे  ने कहा है कि अमरीका का मामला है,वो जानें,हमारा मामला है,हम जान रहे हैं।फ्रांस के राष्ट्रपति ने खुलकर कहा है कि यूरोप को जवाब देने की ज़रूरत है। जर्मनी के विदेश मंत्री ने कहा है कि यह समय शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का है।मुल्कों के बीच दूरियां बनाने का वक्त नहीं है।अपनी ज़िंदगी की पनाह के लिए शरण मांगने वालों की मदद करना एक ऐसा मानवीय मूल्य है जिसे अमरीका और यूरोप दोनों ही साझा करते हैं।क्या ये बातें भारत के नेताओं को नहीं करनी चाहिए?सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ही चुप नहीं हैं,बाकी तमाम नेताओ को भी लगता है बोलना नहीं आता है। क्या प्रवासी बन कर दुनिया भर के अवसरों का लाभ उठा रहे भारतीयों को नहीं बोलना चाहिए?

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने एक्ज़िक्यटिव आर्डर से इराक़, ईरान,सूडान,सोमालिया,सीरिया,यमन और लिबिया से आने वालों पर रोक लगा दी है। फेसबुक के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग ने कहा है कि जिनसे वाक़ई ख़तरा है उनसे चौकस रहने की ज़रूरत है मगर हमें अपने दरवाज़े शरणार्थियों के लिए खुले रखने चाहिए। बिजनेस स्टैंडर्ड ने ज़ुकरबर्ग और सुंदर पिचाई के बयान को पहले पन्ने पर विस्तार से छापा है। ख़बर पढ़कर लगा कि गूगल के कोई सौ कर्मचारी प्रभावित हुए हैं, जो उन सात देशों से आते हैं जहां से शरणार्थियों के आने पर अस्थायी रोक लगाई गई है। इसके बाद भी भारतीय मूल के सुंदर पिचाई ने प्रवासियों और शरणार्थियों के आगमन पर रोक की नीति की आलोचना की है। ट्वीटर ने कहा है कि ट्वीटर को सभी धर्मों के इमिग्रेंट यानी प्रवासियों ने बनाया है। हम उनके साथ है। अगर भारत में ही कोई कंपनी ऐसी बात कह दे तो उसके उत्पादों के न ख़रीदने का अभियान चल पड़ेगा।

ये भी अमरीका की खूबी है। भारत में गूगल प्रमुख सुंदर पिचाई होते तो शरणार्थियों को बाहर निकालने की राजनीति का समर्थन कर रहे होते। वर्ना लफंगों की टोली उनके उत्पाद का बहिष्कार करने का एलान करने लगती। हम दबी ज़ुबान में चर्चा कर रहे हैं कि ट्रंप के संरक्षणवाद के कारण भारत के आईटी उद्योग पर क्या असर पड़ेगा। ख़तरे की आहट है मगर कहीं कोई बयान नहीं है। कोई प्रदर्शन नहीं है।
भारत की किसी साफ्टवेयर कंपनी या उसके सीईओ की आवाज़ मुखर नहीं है। क्या यही है उस भारत का आत्मविश्वास जो विश्व गुरु और सुपर पारव बनने के ज्वाइंट एंट्रेंस एग्ज़ाम की कोचिंग कर रहा है? हर चुनाव में कोई न कोई एलान कर देता है कि भारत को विश्व गुरु बनाना है। हमारी तैयारी पूरी हो गई है। पता चलता है कि भारत अभी तक वेटिंग लिस्ट में ही अपना नाम खोज रहा है। अमरीका के तमाम एयरपोर्ट पर इस ठंड में प्रदर्शन करने निकले हैं। अपना अपना बैनर पोस्टर लेकर गए हैं।

क्या आपने दुनिया भर के देशों में जाकर अपने सपनों को साकार करने वाले युवाओं को फेसबुक पर ही तिब्बती शरणार्थियों के समर्थन में लिखते बोलते देखा है? मुझे शरणार्थी नीति की कोई जानकारी नहीं है,मगर जब भी तिब्बती शरणार्थी प्रदर्शन करते है, उनका कोई साथ नहीं देता। कई बार लगता है कि स्वेटर और मोमो बेचना ही उनका एकमात्र ज़रिया है। हमें जानना चाहिए कि यहां की नौकरियों में उनकी क्या जगह है।  पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचार पर तमाम तरह की सांप्रदायिक राजनीति होती है मगर संवैधानिक पद पर बैठा नेता न तो कल बोलता था न आज बोलता है। ऐसे मुद्दे सभी के लिए दुर्भावना फैलाने के काम आते हैं।
 हम पूरी दुनिया में शरणार्थियों और आप्रवासियों को लेकर हो रही बहस से दूर हैं। चुप हैं।

आतंकवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में अमरीका की क्या भूमिका रही है? उसकी या तमाम मुल्कों की नीतियों और चुप्पियों ने आतंकवाद को पैदा किया या वाकई हम इतने मासूम हैं कि यही मानते चलेंगे कि आतंकवाद मज़हब की किताब से पैदा होता है। इराक में अमरीका और ब्रिटेन का क्या भूमिका थी? यह जानना हो तो ब्रिटेन की चिल्कॉट कमेटी की रिपोर्ट पढ़िये। यह रिपोर्ट बताती है कि सद्दाम के पास कुछ नहीं था,मगर मीडिया के ज़रिये एक प्रोपेगैंडा तैयार किया गया और एक मुल्क को झूठ की बुनियाद पर तबाह कर दिया गया। चिल्कॉट रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार की रिपोर्ट थी जो कई साल की जांच के बाद तैयार किया था।ब्रिटेन के दो तीन सौ सैनिक इराक युद्ध में मारे गए थे। इसी को लेकर जांच हुई थी। जब यह रिपोर्ट पेश हो रही थी तो शहीद सैनिकों के परिजन तब के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को आतंकवादी कह रहे थे।ब्रिटेन के अखबारों ने हेडलाइन छापा था कि ब्लेयर आतंकवादी है।

 रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी आरोप लगाया था कि कई देश आईसीस के साथ तेल का धंधा कर रहे हैं।ईरान के लोग पूछ रहे हैं कि 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले में शामिल 19 आतंकवादी लेबनॉन,ईजिप्ट, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से आए थे।इन देशों पर तो कोई बैन नहीं लगा है।क्या आपको यह बात विचित्र नहीं लगती,दुनिया के मसले पर बिना कुछ बोले ही भारत विश्व गुरु बन जाना चाहता है? क्या गुरु की यही भूमिका होनी चाहिए? क्या भारत ट्रंप की तरह इन सात देशों को आतंकवादी मानता है? अगर मानता है तो वो क्यों चुप है? क्यों नहीं कहता है कि हम इन मुल्कों के साथ कोई संबंध नहीं रखेंगे?

Monday, January 16, 2017

On a clueless path ! or ---My point of View /एक विचार


Thank you very much .Thanks once again.I love  all of you.After a long hours of thinking process I've lost my efficiency to speak loudly  And more importantly lost my intellectual processed mindset in the beginning of year.That's why I always prefer to speak in writing .As you know we all are second class citizen of this Indian society And of course we've to think about this seriously that who we are?
for example Delhi.Delhi represent India in a way.As most of the people are from outside Delhi like Bihar UP  J&;K etc And religion like Hindu Muslim ,Sikh ,Christianity  etc And if throw some of  them out City will not survive & THAN you will say Is today city is surviving I'm not sure about this as some will say HOPE is the ultimate Mantra of Survival .But what I saw in recent days has broken my all hopes
: This is exactly a moment when most powerful person of our country is laughing at handicapped person(here handicapped is used in terms of other meaningful terms).
And , from public platform when some powerful person insult or humiliate  weakest person of the Society then this marks a Great impression ? on our life because then everyone has the cause to do wrong things & others inspires .this is something like violence implies violence or disrespect gives you disrespect.Peace or Progress cannot be attained after cruelest joke on minorities 
.And when media gives unnecessary importance ,moreover instead of standing in favor of weakest section or media can be  neutral but today where media is ?
Actually , some time media forget its role because of fear or greed .
And , media is the only power which can enlighten this society.otherwise coming generations will only blame media for the all wrong doings.
But, one thing is clear either we are heading towards 'History repeats itself ' type Nation/Society or
On a clueless path !

Sunday, December 4, 2016

Modi Vs. India

We don't learn from history as this is evident from demonetization scheme
launched by Modi govt/ Modi. Most of the times we know that if we don't
know how to swim then we don't jump into deep water or else if we are
curious to test water we always take help of life jacket.Or in general if
you jump from high altitude result everyone knows.But if you consider

 all decisions taken by Modi Group All these types of decisions either
formation of govt. in J& K , Creating hurdles in the working of Delhi govt.,
Handling border situation with Pakistan,or Madhesi issue of Nepal or
foreign /international relations on individual basis .On each step
Indian Govt. has failed ,but  Modi has succeeded .Whenever
 personal ambitions of any King( in a democratic country India
Modi's behavior is like a King  ) goes beyond a limit that particular
Country has
 has to face challenges  which can in-turn change the future of the country .
THough   I'm dead sure in this digital age our country men are intelligent
enough to throw these types of King or King changes his stand very fast.
See, major portion of population of India dependent on Agriculture & this is high
time to sow  the crop & any one can think farmers need manure /seeds etc & farmers don't
have money to buy seeds etc infect they are standing in ques /lines in front of the bank
to exchange their rupees .I think either we are much stupid that we are not understanding
Modi's point of view .IF major chunk of the population is dependent on monsoon & agriculture
why this step has been taken in haste.what was pressure
Major chunk of the population is Hindu where it is the best Season & crores of people are
dependent on this marriage business then why? why? demonetization at this time
why  livelihood of  an average Indian thrown into danger ?? 
&
for Kashmir I can say only this that 2 years back Kashmir used to be peaceful loving place
                                                                                                   Contd.------

Thursday, November 3, 2016

माँ ,कभी नहीं भूला तुझे

 माँ ,कभी नहीं भूला तुझे
इसीलिए
माँ ! तेरी याद बहुत आती है
 कभी -कभी
अकेले में जब बैचेन होता हूँ तो
तू आकर मेरा माथा चूमती है और
 बाल सहलाती है। 
जख्म दिये है
घाव  भी दिये  है इस दुनिया ने
पर एक तू है जो
 इन सब पर मरहम लगाती है और
 मेरी पीठ थपथपाती है। 
माँ तेरी याद बहुत आती है
कभी -कभी
जब हताश सा परेशान सा
बिस्तर पर सोने की कोशिश
में
पलको को बंद कर लेता हूँ तो
सपनो में आकर मुझे समझाती है
और मुझे लोरी गाकर सुलाती है। 
ओ माँ!  तू कहाँ चली गयी है
 मुरझा
 मेरे मन की कली गयी है
बहुत अकेले में , मैं रोता

अपने सपने में खोता
बच्चों से तेरी यादों को संजोता
बालों को उनके सहलाता ,
पीठ उनकी थपथपाता
कभी माँ तेरी याद में हँसता कभी रोता।


Monday, August 1, 2016

आत्महत्या या आत्मज्ञान ?

आत्महत्या या आत्मज्ञान ?बहुत लोगों को देखा था
सुना था , पड़ा था सब कुछ गलत लगता था
कोई कैसे मरा ,ये कोई मतलब नहीं
मर गया बस इतना भी पता होना बहुत था
कोई हार्ट अटैक से मरा
याकोई दिमाग की नस फटने से
इससे मुझे पता चला
कि वो घुट -घुट के मरा
यानि उसे पता नहीं था
 और वो आत्महत्या कर रहा था
पर वो जो गले में फंदा डाल कर या 
जहर खा  कर मर गया था 
उसे आत्म ज्ञान था !

Tuesday, July 26, 2016

माँ ,कभी नहीं भूला तुझे

 माँ ,कभी नहीं भूला तुझे
इसीलिए
माँ ! तेरी याद बहुत आती है
 कभी -कभी
अकेले में जब बैचेन होता हूँ तो
तू आकर मेरा माथा चूमती है और
 बाल सहलाती है। 
जख्म दिये है
घाव  भी दिये  है इस दुनिया ने
पर एक तू है जो
 इन सब पर मरहम लगाती है और
 मेरी पीठ थपथपाती है। 
माँ तेरी याद बहुत आती है
कभी -कभी
जब हताश सा परेशान सा
बिस्तर पर सोने की कोशिश
में
पलको को बंद कर लेता हूँ तो
सपनो में आकर मुझे समझाती है
और मुझे लोरी गाकर सुलाती है। 
ओ माँ!  तू कहाँ चली गयी है
 मुरझा
 मेरे मन की कली गयी है
बहुत अकेले में , मैं रोता

अपने सपने में खोता
बच्चों से तेरी यादों को संजोता
बालों को उनके सहलाता ,
पीठ उनकी थपथपाता
कभी माँ तेरी याद में हँसता कभी रोता।


Tuesday, July 5, 2016

हे ! मेघ मल्हार


हे ! मेघ मल्हार

तूने यह कौन से गीत गाए?


माँगी थी पानी की चँद बूँदे ,


तन को शीतल करने के लिए,


सोचा था तू आएगा खुशियाँ लाएगा ,हरियाली छाएगी।


तन मन की ऊष्मता भगाएगा


पर हे !
मेघ मल्हार तूने यह कौन से गीत गाए ?


सोचा था , पढ़ा था ,


शुक -शुकी के गीतों के बारे में ,


राधा -कृष्ण की लीला के बारे में ,

सुना भी था -कोयल की कूकू के बारे में ,
सुना भी था ,पढ़ा भी था ,और भी बहुत कुछ अच्छा-अच्छा


पर हे ! मेघ मल्हार तूने यह कैसे गीत सुनाये


मैं सह भी जाता , मैं रह भी जाता ,


अगर इसमें होती किसी राधा की व्याकुलता ,


अपनें कृष्ण से मिलने की ,


पर अब मैं अपने मन की वेदना को ,


कैसे छुपाऊँ , हे !मेघ मल्हार तेरे


गीतों की त्रासदी मैं किस निर्ममता


से किस -किस को बताऊँ ,


हे !मेघ मल्हार तू ही मेरा दर्द जान ले ,


मुझमें छिपे एक इंसान को तू पहचान ले ,

हे! मेघ मल्हार ,

हे!मेघ मल्हार ,

हे! मेघ मल्हार । ।