Wednesday, May 30, 2018

स्वामी विवेकानंद और भगवान का दर्शन -II

दो प्रकार के लोग मुनष्य -रूप में उपासना नहीं करते। एक तो नरपशु , जिसे धर्म का ज्ञान नहीं और दूसरे परमहंस ,जो मानव जाति की सारी दुर्बलताओं से ऊपर उठ चुके हैं और जो अपनी मानवीय प्रकृति की सीमा के परे चले गए है। वे ही ईश्वर को उसके वास्तविक रूप में भज सकते हैं। अन्य विषयों के समान यहां भी दोनों चरम भाव एक से ही दिखते हैं। अतिशय अज्ञानी और परम ज्ञानी , दोनों ही उपासना नहीं करते। नरपशु अज्ञानवश उपासना नहीं करता ,और जीवन्मुक्त अपनी आत्मा में परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेने के कारण। इन दो चरम भावों के बीच में रहने वाला कोई मुनष्य यदि आकर तुमसे कहे कि वह भगवान को मुनष्य -रूप में भजने वाला नहीं है तो उस पर रहम करना। ईश्वर मुनष्य की दुर्बलताओं को समझता है और मानवता के कल्याण के लिए नर  देह धारण करता है। श्रीकृष्ण ने अवतार के संबंध में गीता में कहा है ,'जब -जब धर्म की ग्लानि होती है और अधर्म का अभ्युत्थान होता है ,तब -तब मैं अवतार लेता हूँ। साधुओं की रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए तथा धर्म -संस्थापनार्थ मैं  युग-युग में अवतीर्ण होता हूं। '
'मूर्ख लोग मुझ जगदीश्वर के यथार्थ स्वरूप को न जानने के कारण मूढ नरदेहधारी की अवहेलना करते हैं। ' श्री रामकृष्ण कहते थे , ' जब एक बहुत बड़ी लहर आती है तो छोटे -छोटे नाले और गड्डे अपने-आप लबालब भर जाते हैं। इसी प्रकार जब एक अवतार जन्म लेता है तो समस्त संसार में आध्यात्मिकता की एक बाढ़ आ जाती है और लोग वायु के कण -कण में धर्मभाव का अनुभव करने लगते हैं। '                   
                                                                                                                                                  समाप्त। 

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