जहाँ कहीं प्रभु का गुणगान होता हो , वही स्थान पवित्र है। तो फिर जो मुनष्य प्रभु का गुणगान करता है , वह कितना पवित्र होगा ! इसलिए जिनसे हमें आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त होती है ,उनके समीप हमें कितनी भक्ति के साथ जाना चाहिए ! यह सत्य है कि संसार में ऐसे धर्मगुरुओं की संख्या बहुत थोड़ी है , पर संसार ऐसे महापुरुषों से कभी शून्य नहीं हो जाता। वे मानव जीवन के सुंदरतम पुष्प है और 'अहैतुक दयासिन्धु ' है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं ,'मुझे ही आचार्य जानो। '
साधरण गुरुओं से श्रेष्ठ एक और श्रेणी के गुरु होते हैं ,और वे हैं -इस संसार में ईश्वर के अवतार। वे केवल स्पर्श
से , यहाँ तक कि इच्छा मात्र से ही आध्यत्मिकता प्रदान कर सकते हैं। वे गुरुओं के भी गुरु हैं -मुनष्य के माध्यम से ईश्वर की उच्तम अभिव्यक्ति हैं। इन मानवीय अभिव्यक्तियों के माध्यम बिना कोई मुनष्य ईश्वर -दर्शन नहीं कर सकता। जब हम अन्य किसी साधन द्वारा ईश्वर -दर्शन का यत्न करते हैं तो अपने मन में ईश्वर का एक भीषण व्यंग्य -रूप गढ़ लेते हैं और सोचते हैं कि यह व्यंग्य -रूप ईश्वर के स्वाभाविक स्वरूप से निम्नतर नहीं है। एक बार एक अनाड़ी आदमी से भगवान शिव की मूर्ति बनाने को कहा गया। कई दिनों के घोर परिश्रम के बाद उसने एक मूर्ति तैयार तो की ,पर वह बंदर की थी !इसी प्रकार जब हम ईश्वर को तत्वत:,उसके निर्गुण , पूर्ण स्वरुप में सोचने का यत्न करते हैं तो हम अनिवार्य रूप से उसमें बुरी तरह असफल होते हैं ; क्योंकि जबतक हम मुनष्य हैं ,तबतक मुनष्य से उच्चतर रूप में उसकी कल्पना नहीं कर सकते।
एक समय ऐसा आएगा ,जब हम प्रकृति के परे चले जाएंगे ,और तब हम उसे उसके असली स्वरूप में देख सकेंगे। पर जब तक हम मुनष्य हैं ,तबतक हमें उसकी उपासना मुनष्य में और मुनष्य के रूप में ही करनी
होगी।
धर्म का अर्थ है प्रत्यक्ष अनुभूति। इसलिए इस अपरोक्ष अनुभूति और थोथी बात के बीच जो विशेष भेद है ,उसे हमें अच्छी तरह पकड़ लेना चाहिए। इस संबंध में सहज बुद्धि जितनी अ-सहज (दुर्लभ ) है ,उतनी और कोई वस्तु नहीं।
हम अपनी वर्तमान प्रकृति से सीमित हो ईश्वर को केवल मुनष्य रूप में ही देख सकते हैं। मान लो , भैंसों की इच्छा भगवान की उपासना करने की हो- तो वे अपने स्वभाव के अनुसार भगवान को एक बड़े भैंसे के रूप में
देखेंगे। यदि एक मछली भगवान की उपासना करना चाहे तो उसे भगवान को एक बड़ी मछली के रूप में सोचना होगा। यह न सोचना कि ये सब विभिन्न धारणाएं केवल विकृत कल्पनाओं से उत्पनं हुई हैं। मुनष्य ,भैंसा ,मछली -ये सब मानों भिन्न -भिन्न बरतन हैं ; ये सब बरतन अपनी -अपनी आकृति और जल-धारण शक्ति के अनुसार ईश्वर रूपी समुद्र के पास अपने को भरने के लिए जाते हैं। पानी मुनष्य में मुनष्य का रूप ले लेता है , भैंसे में भैंसे का और मछली में मछली का। प्रत्येक बरतन में वही ईश्वररूपी समुद्र का जल है। क्रमश :
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